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अम्फान तूफान को लेकर मोदी और ममता द्वारा हवाई सर्वेक्षण

  • Updated on 5/23/2020

देश के अनेक भागों को अपनी लपेट में लेने वाले ‘अम्फान चक्रवाती’ तूफान ने 21 साल पहले 1999 में आए भीषण चक्रवाती तूफान की याद दिला दी है जिसके परिणामस्वरूप पश्चिम बंगाल में जानमाल का भारी नुक्सान  हुआ तथा 80 लोग मारे गए थे। 
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के अनुसार, 'अम्फान तूफान से एक लाख करोड़ रुपए की सम्पत्ति की क्षति हुई है। मैंने ऐसी बर्बादी जीवन में पहले कभी नहीं देखी, जिसने सब कुछ तबाह कर दिया है।'

'अम्फान' के चलते जहां अभी तक पश्चिम बंगाल, ओडिशा व असम आदि के प्रभावित क्षेत्रों में बाढ़ की स्थिति बनी हुई है, वहीं अकेले पश्चिम बंगाल में ही हजारों की संख्या में मोबाइल टावर तथा बिजली के पोल टूटने से संचार व्यवस्था के साथ-साथ बिजली और पानी की सप्लाई राज्य के बड़े हिस्से में ठप्प हो गई है। यही नहीं, राज्य में कम से कम 55,000 मकान तबाह हो गए और बड़ी संख्या में दूसरे निर्माणों को भी क्षति पहुंची है।

इसी को देखते हुए ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ 36 का आंकड़ा होने के बावजूद स्वयं उनसे यहां आकर तबाही का हाल देखने की गुहार लगाई जिस पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 83 दिनों के बाद पहली बार दिल्ली से बाहर निकले और पश्चिम बंगाल तथा ओडिशा में हुई तबाही का हवाई सर्वेक्षण किया जिसमें ममता बनर्जी उनके साथ रहीं।

पश्चिम बंगाल और ओडिशा के दौरे के बाद प्रधानमंत्री ने पश्चिम बंगाल को 1000 करोड़ और ओडिशा को 500 करोड़ रुपए की ‘तत्काल’ राहत देने की घोषणा तो की हैै परंतु इसके साथ ही यह भी कहा कि इस बाबत सर्वे करने के लिए केन्द्र से एक टीम वहां जाएगी। 

जाहिर है कि इस सबमें कुछ समय लगेगा जबकि लोगों को तो फौरी सहायता की जरूरत है जिसके अभाव में वे किसी न किसी तरह गुजारा करने को मजबूर होंगे। लिहाजा समय की मांग है कि जो भी और जितनी भी सहायता दी जानी है, फौरी तौर पर उपलब्ध करवा दी जाए ताकि तूफान से प्रभावित लोगों को उसका वास्तव में कुछ लाभ मिल सके। 

जहां प्रधानमंत्री ने पश्चिम बंगाल और ओडिशा सरकारों की सहायता करके अपना ‘राष्ट्र धर्म’ निभाया है तो दूसरी ओर ममता भी अपने समर्थकों और विरोधियों को यह संदेश दे सकती हैं कि संकट की इस बेला में उन्होंने अपने धुर विरोधी सत्तारूढ़ दल से सहायता की गुहार लगा कर ‘राज्य धर्म’ निभाया है। 

लिहाजा इस तरह की स्थिति में यह कह पाना मुश्किल ही प्रतीत होता है कि अगले वर्ष पश्चिम बंगाल विधान सभा के होने वाले चुनावों में इसका लाभ भाजपा को मिलेगा या तृणमूल कांग्रेस को?

—विजय कुमार

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