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खेतों में नाड़ (पराली) जलाने से बढ़ेगा लोगों के फेफड़ों के लिए खतरा

  • Updated on 5/2/2020

इस समय समूचा विश्व ‘कोरोना’ वायरस के संक्रमण से जूझ रहा है और लगातार बढ़ रहे इसके मामले भारत सहित सारे विश्व के लिए भारी चिंता का विषय बने हुए हैं। ‘यूनिवॢसटी ऑफ मैरीलैंड स्कूल ऑफ मैडीसिन’ के एसोसिएट प्रोफैसर  मैथ्यू बी. फ्रीमैन तथा अन्य पाश्चात्य विशेषज्ञों के अनुसार ‘कोरोना’ वायरस रोगी की छोटी-बड़ी आंतों, किडनी, लिवर और रक्त वाहिकाओं के साथ-साथ फेफड़ों को क्षतिग्रस्त करता है।

इस बारे खास बात यह है कि इसकी शुरूआत और अंत दोनों ही फेफड़ों  में होते हैं। इस वायरस के हमले से होने वाली सांस की बीमारी सबसे पहले व्यक्ति के फेफड़ों को ही खराब करना शुरू करती है जिस कारण फेफड़ों की कोशिशाएं क्षतिग्रस्त हो जाने से रोगी को सांस लेने में कठिनाई होने लगती है और उसका दम घुटने लगता है।

इन दिनों ‘कोरोना’ के हॉट बैड बने पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, आदि में गेहूं की कटाई के बाद किसानों द्वारा खेतों में ‘नाड़’ (पराली) को आग लगा कर जलाने की दुष्प्रवृत्ति के कारण यह खतरा बढ़ गया हैै। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार जिस प्रकार कोरोना वायरस के आक्रमण से फेफड़ों को पहुंचने वाली क्षति व्यक्ति की मौत का कारण बन सकती है उसी प्रकार खेतों में ‘नाड़’ जलाने से जहां मिट्टी में मौजूद पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं वहीं इसे जलाने से उठने वाला धुआं फेफड़ों को हानि पहुंचाता है अत: खेतों में ‘नाड़’ जलाने से उठने वाले धुएं से फेफड़ों के क्षतिग्रस्त होने का खतरा बढ़ जाएगा।

एक ओर तो ‘कोरोना’ संक्रमण से बचाव के लिए ‘शारीरिक दूरी’ के नियमों का पालन करवाते हुए गेहूं और सरसों आदि की फसल की कटाई करवाई गई है तो दूसरी ओर ‘नैशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल’ द्वारा प्रदूषण पर काबू पाने के लिए खेतों में ‘नाड़’ जलाने पर लगाए गए प्रतिबंध के बावजूद किसान अगली फसल के लिए खेत तैयार करने की जल्दबाजी में फसल की कटाई के बाद खेतों में बची ‘नाड़’ को आग लगाने से नहीं रुक रहे।

मध्यप्रदेश में तो कुछ स्थानों पर तो इसी कारण प्रदूषण बढ़ने से पक्षियों तक को उड़ने में परेशानी होने लगी है। उनमें बेचैनी बढ़ गई है और वे तुलनात्मक दृष्टि से प्रदूषणमुक्त स्थानों पर शरण ले रहे हैं। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में हाल ही में ‘नाड़’ जलाने से गहरे धुएं की इतनी गहरी परत छा गई कि लोगों में दहशत जैसा माहौल बन गया। केंद्रीय अन्न भंडार में सर्वाधिक योगदान करने वाले पंजाब और हरियाणा में भी किसान बड़े पैमाने पर खेतों में ‘नाड़’ जलाकर जनता के स्वास्थ्य से खिलवाड़ करने के साथ-साथ भूमि की उर्वरता को भी नष्ट कर रहे हैं।

इसी सिलसिले में हरियाणा में 15 अप्रैल के बाद से अभी तक 228 स्थानों पर खेतों में ‘नाड़’ जलाने  के मामले सामने आ चुके हैं। सिरसा, झज्जर, पलवल, हिसार, फतेहाबाद, सोनीपत, भिवानी, गुड़गांव, करनाल, रोहतक, जींद, चरखी दादरी, पानीपत, नूह, यमुनानगर, अम्बाला, फरीदाबाद, रिवाड़ी व कैथल में ‘नाड़’ जलाने वाले किसानों को भारी जुर्माने किए गए।  
इसी प्रकार पंजाब में 29 और 30 अप्रैल को मात्र 2 ही दिनों में बठिंडा, कपूरथला, मानसा, मुक्तसर, बरनाला, फरीदकोट, फिरोजपुर, गुरदासपुर, होशियारपुर, जालन्धर, लुधियाना और मोगा में दर्जनों किसानों के विरुद्ध ‘नाड़’ जलाने के आरोप में केस दर्ज किए गए हैं।

अत: खेतों में ‘नाड़’ जलाने से पैदा सेहत के लिए खतरे के दृष्टिïगत अधिकारियों को इस लानत पर रोक लगाने के लिए तुरंत हरकत में आने की जरूरत है ताकि पहले से ही मौजूद कोरोना के खतरे में ‘नाड़’ जलाने से पर्यावरण को होने वाली क्षति के कारण और वृद्धि न हो।

हालांकि पंजाब सरकार ने किसानों को ऐसा करने पर कड़ी कार्रवाई करने की चेतावनी दी है परंतु आवश्यकता इस बात की भी है कि इस चेतावनी पर प्रभावी ढंग से अमल भी किया जाए।

—विजय कुमार

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