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प्रकृति की पुकार को अनसुना करके हम खुद अपनी बर्बादी बुला रहे

  • Updated on 10/24/2020

संयुक्त राष्ट्र (United States) द्वारा 12 अक्तूबर को जारी रिपोर्ट के अनुसार पिछले 20 वर्षों में विश्व भर में आने वाली प्राकृतिक आपदाओं में भारी वृद्धि के परिणामस्वरूप जान-माल की अत्यधिक हानि हो रही है। 

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार वर्ष 2000 से 2019 के बीच चीन और अमरीका में सर्वाधिक प्राकृतिक आपदाएं आईं और उसके बाद 321 आपदाओं के साथ भारत तीसरे स्थान पर पहुंच गया है। इस सूची में प्राकृतिक आपदा के सर्वाधिक शिकार 10 देशों में से 8 एशिया के हैं। 

सर्वाधिक हानि अत्यधिक तापमान, सूखा, भूकंप, बाढ़, सुनामी और जंगलों में आग लगने के कारण हुई। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि तापमान में लगातार वृद्धि होने के कारण अगले वर्षों में विश्व में लू और सूखा बड़े खतरे का रूप धारण कर जाएंगे।

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संयुक्त राष्ट्र की उक्त रिपोर्ट के अगले ही दिन 13 अक्तूबर को जेनेवा स्थित ‘विश्व मौसम विज्ञान एजैंसी’ ने आगाह किया है कि वर्ष 2030 तक अंतर्राष्ट्रीय मानवीय सहायता के जरूरतमंद लोगों की संख्या में 50 प्रतिशत वृद्धि हो सकती है।
इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन के कारण विश्व में प्रतिवर्ष अधिक संख्या में प्राकृतिक आपदाएं आ रही हैं, जबकि पिछले 50 वर्षों में आई इस तरह की 11,000 आपदाओं में 20 लाख लोगों की मौत भी हुई और 3.6 खरब डालर राशि की सम्पदा का नुक्सान भी हुआ।

विश्व में पिछले कुछ समय के दौरान बेमौसमी वर्षा, बाढ़, भूस्खलन, जंगलों की आग आदि आपदाओं से होने वाली भारी तबाही के बीच अमरीका स्थित ‘यूनिवॢसटी आफ नेवादा’ के एक अध्ययन में भविष्यवाणी की गई है कि राजधानी दिल्ली सहित पूर्वी भारत के अरुणाचल प्रदेश से लेकर पश्चिम में पाकिस्तान तक फैली हिमालय पर्वत माला एक बार फिर सिलसिलेवार भीषण भूकंपों का केंद्र बन सकती है।

इस रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि इन भूकंपों की तीव्रता रिक्टर पैमाने पर 8 या अधिक हो सकती है। इससे पहले भी यह क्षेत्र भूकंपों का केंद्र रह चुका है और चूंकि ये घनी आबादी वाले क्षेत्र हैं अत: इतनी अधिक तीव्रता के भूकंप से बहुत अधिक जान-माल का नुक्सान हो सकता है। 

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उक्त रिपोर्ट के अनुसार हिमालय क्षेत्र के दक्षिण में स्थित राजधानी दिल्ली में भी भारी झटके महसूस किए जा सकते हैं जबकि भारत और विश्व के अन्य देशों में कम तीव्रता के भूकंप लगातार बढ़ते जा रहे हैं। भूगर्भ वैज्ञानिकों के अनुसार ऐसे कई छोटे भूकंप भारी तबाही करेंगे। 

विश्व में भूकंप की आशंका वाले क्षेत्रों को 5 सीस्मिक जोन में बांटा गया है। इसमें लगभग 573 मील के दायरे में फैले दिल्ली-एन.सी.आर. के इलाके गुरुग्राम और फरीदाबाद आदि जोन 4 अर्थात रिक्टर पैमाने पर 8 तक की तीव्रता वाले भूकंप से जान-माल की होने वाली भारी तबाही के बड़े जोखिम वाले इलाकों में दूसरे स्थान पर आते हैं। 

अत्यधिक जनसंख्या वाले इस इलाके, जहां लाखों लोग रहते हैं, में इमारतों की सुरक्षा संबंधी निर्धारित नियमों और मापदंडों का पालन किए बगैर अंधाधुंध अवैध एवं असुरक्षित निर्माण किए गए हैं। दिल्ली की लगभग 80 प्रतिशत इमारतें असुरक्षित तथा भूकंप का औसत से बड़ा झटका झेल पाने में असमर्थ होने के कारण भारी विनाश कर सकती हैं।

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यह समस्त सृष्टि एक अदृश्य शक्ति द्वारा संचालित की जा रही है जिसे हम गॉड, भगवान, अल्लाह आदि नामों से पुकारते हैं और सभी धर्मों और संतों-महात्माओं ने प्रकृति और पर्यावरण की सुरक्षा की बात कही है परंतु हम अपने ही गलत कामों से प्रकृति से खिलवाड़ कर रहे हैं, जिसका परिणाम पर्यावरण बिगडऩे के कारण प्राकृतिक आपदाओं के रूप में निकल रहा है। न हम अपने प्रभु की सुनते हैं, न संतों-महात्माओं की।

आज प्रकृति हमें पुकार-पुकार कर कह रही है कि मेरी आवाज सुनो। पानी गंदा न करो, जमीन में अंधाधुंध रासायनिक खादों और कीटनाशकों का प्रयोग करके मुझे विषैला न बनाओ, पराली जला कर और दूसरे गलत कामों से हवा को दूषित न करो। जनसंख्या जो 200 करोड़ थी आज 700 करोड़ के आंकड़े से बढ़ रही है।

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हिन्दू धर्म ग्रंथों में प्रकृति और पर्यावरण के संरक्षण के लिए प्रकृति पूजन का नियम बताया गया है तथा पेड़-पौधों, नदी-पर्वत, ग्रह-नक्षत्र, अग्नि और वायु सहित प्रकृति के विभिन्न रूपों के साथ मानवीय रिश्ते जोड़े गए हैं। जहां पेड़ की तुलना संतान से की गई है तो वहीं नदी और पृथ्वी को मां तथा ग्रह-नक्षत्र, पहाड़ व वायु को देव रूप माना गया है। 

अत: प्रकृति के प्रकोप स्वरूप होने वाली आपदाओं से बचने के लिए जहां हमें हमारे धर्मग्रंथों में बताए गए प्रकृति से रिश्तों का सम्मान करने की आवश्यकता है, वहीं हमारे राजनीतिज्ञों को भी विधि के विधान का पालन करने और उसी के अनुरूप आचरण करने की भी आवश्यकता है ताकि देश का वातावरण और पर्यावरण शुद्ध हो सके।

 —विजय कुमार

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