Wednesday, Oct 27, 2021
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चीन में लोगों की आय में बढ़ रही असमानता पर चिंता

  • Updated on 8/23/2021

अब तक चीन ने विकास के लिए आर्थिक विकास का जो रास्ता अपनाया, उससे वह एक गरीब देश से दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया और व्यापार तथा प्रौद्योगिकी में सबसे बड़ी ताकतों में से एक में बदल गया लेकिन वहां सम्पन्नता के साथ-साथ आर्थिक असमानता भी उसी तेजी के साथ बढ़ी है।

चीन में लोगों की आय में अंतर साफ नजर आता है। देश की औसत वार्षिक आय 32,189 युआन (3,56,000 रूपए) या प्रति माह लगभग 2,682 युआन है। राष्ट्रीय सांख्यिकी ब्यूरो के अनुसार पेइचिंग में दुनिया के किसी भी अन्य शहर की तुलना में अधिक अरबपति रहते हैं।

2019 में पहली बार चीन में अमीरों की संख्या अमरीका के अमीरों की संख्या से ज्यादा हो गई। वैल्थ ट्रैकर ‘हुरुन’ की रिपोर्ट के अनुसार चीन के अमीरों ने 2020 में रिकॉर्ड 1.5 ट्रिलियन डॉलर कमाए जो यू.के. के सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) का लगभग आधा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि आय असमानता की समस्या वाले अधिकांश देशों के लिए यह आम बात है लेकिन चीन एक अजीब स्थिति में है। लंबे समय से लोग इस सोच के साथ जी रहे थे कि सब एक समान रूप से समृद्ध होंगे। परंतु अब चीन की कम्युनिस्ट पार्टी तथा राष्ट्रपति शी जिनपिंग लोगों की आय में असमानता के कारण देश में पैदा हो रहे असंतोष को एक राजनीतिक मुद्दा बनाने जा रहे हैं। वे इसे अपनी महत्वपूर्ण चुनौतियों में से एक बनाने जा रहे हैं। अब अमीर-गरीब की खाई पाटना चीन की सरकार के लिए अहम मुद्दा बन गया है। 

शी को डर है कि अगर वह ऐसा नहीं कर पाए तो उनकी खुद की पार्टी की वैधता पर ही सवाल उठेंगे। ऐसे में लगता है कि एक बार फिर चीन समाजवाद का रुख करके माओ वाले दौर की नीतियां अपना सकता है। 

हालांकि, अभी तक यह नहीं पता चल सका है कि शी इन लक्ष्यों को कैसे प्राप्त करेंगे लेकिन माना जा रहा है कि सरकार टैक्स और अन्य विकल्पों के जरिए इसे पूरा करने का प्रयास करेगी।

शी ने 2049 तक चीन को पूरी तरह से विकसित, समृद्ध और शक्तिशाली राष्ट्र में बदलने का संकल्प लिया। गौरतलब है कि चीन 2049 में ही देश के गठन की 100वीं वर्षगांठ मनाएगा। 

चीन ने हाल के महीनों में अनेक निजी कम्पनियों पर नकेल कसी है जिसके परिणामस्वरूप वैश्विक निवेशकों को झटका भी लगा है। 

अरबपति कारोबारियों पर हो रही कार्रवाई का खमियाजा ‘एंट’ ग्रुप के जैक मा को भी भुगतना पड़ा है। तेज दिमाग और महत्वाकांक्षी जैक मा ने शुरू से ही चीन के सबसे बड़े व्यापारिक साम्राज्यों में से एक का निर्माण किया, अरबों डॉलर की संपत्ति बनाई और करोड़ों लोगों के लिए डिजिटल नवाचारों की शुरूआत की। वह चीन के जैफ बेजोस, एलन मस्क या बिल गेट्स नहीं थे बल्कि उनके पूर्ववर्ती थे। 

तकनीकी जगत में अभूतपूर्व तरक्की, जिसे कभी पश्चिम को पीछे छोडऩे के लिए चीन उपयोगी साधन के रूप में देखता था, सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी के लिए अब एक खतरा बन चुकी है। 

गत वर्ष अक्तूबर में जैक मा ने वित्तीय क्षेत्र में नवीन कार्य करने वालों को दबाने के लिए चीनी नियामकों की खुलेआम आलोचना की जिसके बाद अचानक वह सार्वजनिक जीवन से गायब हो गए। ‘वी चैट’ तथा ‘सीना कार्प’ जैसी कम्पनियों पर भी धावा बोला है। 

इसके कुछ ही दिन बाद राष्ट्रपति शी ने व्यक्तिगत रूप से हस्तक्षेप करते हुए जैक मा के ‘एंट’ ग्रुप की फाइनांशियल टैक कम्पनी के रिकॉर्ड 34 बिलियन डॉलर से अधिक के आई.पी.ओ. को रुकवा दिया। 

तब से जैक ‘एंट’ ग्रुप को अपने व्यवसाय का पुनर्गठन करने के लिए मजबूर किया गया है जिससे उसके कर्मचारी और निवेशक खुद को अधर में लटका महसूस कर रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि शी उन ‘प्लेटफार्म’ कम्पनियों के पीछे जाएंगे जो डाटा क्लैक्शन और बाजार की ‘शक्ति’ अथवा धन इकट्ठा करते-करते सरकार को चुनौती देने के स्तर पर जा पहुंची हैं। शी का प्रशासन विशेष रूप से हाई प्रोफाइल कम्पनियों का उदाहरण बनाना चाहता है। स्टार्टअप को भी वह रोकने का यत्न करेगा। 

गत दिनों चीन ने ऑनलाइन शिक्षा प्रदान करने वाली कम्पनियों के लिए भी नियमों में सख्ती की है जिससे उनके शेयरों में भी भारी गिरावट आई है। स्पष्ट है कि आने वाले समय में भी चीन इसी तरह की पाबंदियां कम्पनियों पर लगाता रहेगा। इससे भारत के लिए भी मौका बनता दिखने लगा है।

यदि भारत सही कदम उठाता है तो वह चीन की जगह लेते हुए दुनिया भर से निवेश तथा कारोबार को अपनी ओर आकर्षित कर सकता है। ध्यान रहे कि कोविड की पहली लहर के पश्चात ऐसा समय आया था परंतु वियतनाम, ब्राजील तथा बंगलादेश जैसे अनेक देशों ने जल्दी से निवेशकों को आकर्षित कर लिया था।

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