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danger of human made virus covid19 on world aljwnt

...और अब दुनिया पर मानव निर्मित वायरस का खतरा

  • Updated on 9/14/2020

‘कोरोना’ वायरस (Coronavirus) ने जब अमेरिका में तबाही मचानी शुरू की तो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प (Donald Trump) ने इसे ‘चाइनीज वायरस’ पुकारते हुए आरोप लगाया था कि यह कुदरती नहीं मानव निर्मित वायरस है जिसे बीमारी फैलाने के लिए चीन में ‘जैनेटिक इंजीनियरिंग’ (आनुवांशिक इंजीनियरिंग) (Genetic Engineering) से जान-बूझ कर तैयार किया गया अथवा यह वुहान इंस्टीच्यूट ऑफ वायरोलॉजी की प्रयोगशाला से दुर्घटनावश फैला होगा। 

हालांकि, अब तक हुए शोधों में इसके मानव निर्मित वायरस होने से इंकार किया गया है लेकिन अगर इस महामारी के पीछे ‘जैनेटिक इंजीनियरिंग’ नहीं थी तो भविष्य में ऐसा होने से इंकार भी नहीं किया जा सकता है। 

कोरोना ने जिस तरह पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं को घुटनों पर ला दिया है, दुनिया भर के तानाशाह जान चुके हैं कि वायरस परमाणु मिसाइलों से भी अधिक विनाशकारी हो सकते हैं। इससे भी अधिक चिंता की बात यह है कि अब एक रोग को जन्म देने वाला वायरस तैयार करने के लिए किसी भारी-भरकम सरकारी प्रयोगशाला की जरूरत भी नहीं है। 

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जैनेटिक इंजीनियरिंग में हुई तकनीकी क्रांति के चलते वायरस बनाने के लिए आवश्यक सभी उपकरण इतने सस्ते, सरल और आसानी से उपलब्ध हैं कि कोई भी दुष्ट वैज्ञानिक या कॉलेज में पढऩे वाला ‘बायो हैकर’ उनका उपयोग करके कोरोना से भी बड़ा खतरा दुनिया में फैला सकता है। 

जो प्रयोग कभी सरकारी और कॉर्पोरेट प्रयोगशालाओं की सुरक्षित दीवारों के पीछे किए जा सकते थे, वे अब ऑनलाइन शॉपिंग वैबसाइट्स से खरीदे उपकरणों के साथ घर में ही किए जा सकते हैं। अच्छी और बुरी क्षमता के साथ जैनेटिक इंजीनियरिंग अब हर किसी की आसान पहुंच में है।

वायरस तैयार करने के लिए पहला कदम मौजूदा ‘रोग जनक’ वायरस की आनुवांशिक जानकारी प्राप्त करना है। उदाहरण के लिए जुकाम करने वाला कोरोना वर्ग का एक वायरस, जिसे अधिक खतरनाक बनाने के लिए बदला जा सकता है। 

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किसी समय वायरस की आनुवांशिक जानकारी प्राप्त करने पर करोड़ों रुपए और वर्षों का शोध करना पड़ता था वहीं अब इसे कुछ हजार रुपयों में ऑनलाइन हासिल किया जा सकता है।

अगला चरण मौजूदा वायरस के प्रभाव को बदलने के लिए इसके ‘जीनोम’ को बदलना है। एक तकनीक ने इसे लगभग उतना ही आसान बना दिया है जितना कम्प्यूटर पर किसी दस्तावेज का सम्पादन करना। 

कुछ वर्ष पूर्व विकसित की गई इस तकनीक का नाम ‘सी.आर.आई.एस.पी.आर. जीन एडिटिंग’ है। बैक्टीरिया ने खुद को वायरस से बचाने के लिए सहस्राब्दियों  के दौरान जो तरीका विकसित किया उसी को इस तकनीक ने किसी भी जीव के डी.एन.ए. को बदलने के लिए एक सस्ते, सरल और तेज तरीके में बदल दिया है।

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पहले जहां डी.एन.ए. के साथ प्रयोग करने के लिए वर्षों का अनुभव, अत्याधुनिक प्रयोगशालाएं और करोड़ों-अरबों रुपयों की जरूरत होती थी वहीं ‘सी.आर.आई.एस.पी.आर. जीन एडिटिंग’ ने इसे बेहद आसान बना दिया है। अब इंटरनैट पर कुछ हजार रुपयों में आर.एन.ए. का ऑर्डर देना और कुछ कैमिकल्स और एंजाइम खरीदने की जरूरत है। 

चूंकि यह सब इतना सस्ता और आसान है, दुनिया भर में हजारों वैज्ञानिक ‘सी.आर.आई.एस.पी.आर.’ आधारित परियोजनाओं का प्रयोग कर रहे हैं जिसमें से बहुत ही कम किसी जिम्मेदार संस्था के नियंत्रण में हैं क्योंकि नियामकों को अभी तक यह समझ में ही नहीं आया है कि अचानक से कैसे सब सम्भव हो गया है।

चाहिए तो यह था कि सभी देश अपने यहां इस तकनीक के खुले प्रयोग तथा आर.एन.ए. सीक्वेंस को बेचे जाने पर रोक लगाते तथा इस संबंध में मिल कर नीति तय करते परंतु अभी तक ऐसा नहीं हुआ है। 

बेहतर यही होगा कि कोरोना महामारी को वायरस के खतरों के प्रति सभी की आंखें खोलने की एक चेतावनी मानते हुए समय रहते ‘वायरस जैनेटिक इंजीनियरिंग’ को नियंत्रित किया जाए।

- विजय कुमार

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