Saturday, Jul 24, 2021
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food wastage and its need aljwnt

एक ओर ‘भोजन बर्बाद हो रहा है’ दूसरी ओर ‘गरीब भूख से तड़प रहे हैं’

  • Updated on 3/9/2021

आज भोजन की बर्बादी एक विश्व व्यापी समस्या बन गई है। एक ओर करोड़ों लोग भूख से तड़प रहे हैं, तो दूसरी ओर कई देशों में लोग बड़ी मात्रा में खाद्यान्न नष्ट कर रहे हैं। इसी कारण विश्व में 70 करोड़ लोगों को दो समय का भोजन भी नसीब नहीं और वे भूखे पेट सोने को विवश हैं। 

भोजन की विश्व व्यापी समस्या के कारण प्रतिदिन 5 वर्ष की आयु से कम लगभग 24,000 बच्चे भूख से दम तोड़ रहे हैं और 87 करोड़ से अधिक लोग कुपोषण के शिकार हैं।

हाल ही में जारी संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2019 में विश्व भर में 93 करोड़ 10 लाख टन भोजन दुकानों, रेस्तराओं और खाने-पीने के अन्य स्थानों पर बर्बाद हुआ। 

नष्टï हुए खाद्यान्न की यह मात्रा विश्व भर में पैदा होने वाले खाद्यान्न का 17 प्रतिशत है। भोजन का 61 प्रतिशत हिस्सा घरोंं, 26 प्रतिशत हिस्सा होटलों तथा हास्पिटैलिटी उद्योग और 13 प्रतिशत अन्य क्षेत्रों में बर्बाद हुआ। 

भारतीय घरों में बर्बाद हुए भोजन की मात्रा 6 करोड़ 87 लाख टन थी अर्थात भारतीय घरों में प्रत्येक व्यक्ति ने वर्ष में औसतन कम से कम 50 किलो भोजन नष्टï किया।   

‘संयुक्त राष्टï्र पर्यावरण कार्यक्रम’ के कार्यकारी निर्देशक इंगर एंडरसन ने चेतावनी दी है कि ‘‘दुनिया के हर देश और हर व्यक्ति को समझना होगा कि अन्न का एक दाना भी बर्बाद न होने पाए।’’

‘‘यदि हमने जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक संसाधनों को पहुंचने वाला नुक्सान रोकने के संबंध में अपनी जिम्मेदारी न समझी तो एक दिन हमें ही इसकी कीमत चुकानी होगी।’’ 

महंगी शादियां और अन्य भव्य समारोह भी इसका बड़ा कारण हैं जहां लोग खाते कम और जूठन ज्यादा छोड़ते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार शादियों तथा अन्य समारोहों में अनुमानित आवश्यकता से 20 से 25 प्रतिशत तक अधिक भोजन पकाया जाता है इसलिए उसका काफी हिस्सा बच जाता है जिसे कैटरिंग वाले जरूरतमंदों तक पहुंचाने की बजाय नालियों आदि में बहा कर या कूड़े के रूप में फैंक कर नष्टï कर देते हैं। 

रिपोर्ट के अनुसार अन्न बर्बाद करने से  संबंधित देशों की आॢथक स्थिति और पर्यावरण पर भी बहुत बुरा असर पड़ता है। अन्न की यह बर्बादी प्राकृतिक संसाधनों को भी क्षति पहुंचाती है। 

फालतू समझ कर गड्ढों में फैंके गए भोजन से निकलने वाली हानिकारक मिथेन गैस ग्लोबल वाॄमग को बढ़ाती है। विश्व भर में होने वाले कुल ग्रीन हाऊस गैस उत्सर्जन का 8-10 प्रतिशत हिस्सा गड्ढïों में फैंक कर भोजन बर्बाद करने का ही परिणाम है। 

नैतिकता का तकाजा यह है कि हमें शादी-विवाहों तथा अन्य समारोहों में ही नहीं बल्कि अपने घरों में भी खाना खाते समय जूठन नहीं छोडऩी चाहिए और जितनी जरूरत हो उतना ही लेना चाहिए और भूख से कुछ कम ही खाना चाहिए जो स्वास्थ्य के लिए भी अच्छा है।

भोजन परोसने वालों के लिए भी उचित होगा कि वे एक बार में ही ज्यादा-ज्यादा न परोसें तथा जरूरत के अनुसार ही दें क्योंकि न सिर्फ जूठन लगे बर्तन साफ करने में परेशानी होती है बल्कि नालियों में जूठन फैंकने से गंदगी भी फैलती है। 

विश्व की लगातार बढ़ रही जनसंख्या भी भोजन की कमी का बड़ा कारण है। एक  अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि यदि समय रहते जनसंख्या वृद्धि पर रोक नहीं लगाई गई तो 2050 में पृथ्वी पर मौजूद लगभग 9 अरब जनसंख्या को भोजन और पोषण उपलब्ध करवाना कठिन हो जाएगा। 

 भारत में अन्न को भी देवता का दर्जा प्राप्त है तथा भारतीय धर्म दर्शन में भोजन का अनादर करना या जूठन छोड़ना अनुचित माना गया है। अत: जूठन न छोडऩे से जहां अनाज का सदुपयोग और इसके व्यर्थ में नष्टï होने से बचाव होगा, वहीं धन की बचत होने के साथ-साथ यह सेहत के लिए भी अच्छा होगा। 

यही नहीं, बचा हुआ भोजन जरूरतमंदों तक पहुंचा देने से न सिर्फ उनका पेट भरेगा बल्कि गंदगी और प्रदूषण से भी बचाव होगा और किसी भूखे का पेट भरने से जो पुण्य मिलेगा सो अलग!

—विजय कुमार

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