Thursday, Apr 02, 2020
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संगीन अपराधों के लिए किशोरों को ट्रेनिंग देने लगे हैं गैंगस्टर

  • Updated on 2/3/2020

आज हमारी आपराधिक न्याय प्रणाली में किशोर अपराध को लेकर बहस जारी है। यह इस महत्वपूर्ण पहलू पर प्रकाश डालती है कि आज हमें किशोर अपराधों से निपटने के लिए किस नजरिए तथा किस कानूनी प्रक्रिया का उपयोग करना चाहिए। वर्तमान न्यायिक प्रणाली इस समझ के साथ काम करती है कि एक किशोर की हरकतें वयस्क के समान नहीं हो सकतीं। इसी वजह से किशोर अपराध कानून के तहत उन्हें विशेष छूट दी जाती है और सजा भी ऐसी होती है कि वह उनके सुधार पर केन्द्रित हो। 

यह भी एक तथ्य है कि हमारे कानून में किशोर तथा उनकी गतिविधियों को परिभाषित करने में स्पष्टता का अभाव है। किशोरों को सही दिशा दिखाने तथा उनके बचपन के नष्ट हो जाने की महीन रेखा के बीच संतुलन बैठाने को लेकर हमारी न्याय प्रणाली का संघर्ष कोई नया नहीं है। हालांकि, बदलते हालात में इस कानून पर और भी गहनता के साथ विचार करने की जरूरत है कि हमें किशोर कानून में किस तरह के बदलाव करने चाहिएं। वह भी इस स्थिति में जब लगभग स्पष्ट हो चुका है कि अनेक गैंगस्टर किशोर अपराध कानून का खुल कर दुरुपयोग करते हैं। 

हाल के दिनों में ऐसे अनेक मामले सामने आए हैं जहां आपराधिक गिरोह संगीन अपराधों के लिए किशोरों को बाकायदा ट्रेनिंग देते हैं। छोटे-मोटे अपराधों में लिप्त किशोरों को उनके दुश्मनों अथवा गिरफ्तारी से सुरक्षा प्रदान करने का भरोसा देकर उन्हें बड़े अपराधों के लिए तैयार किया जाता है। गत मई में दिल्ली के टिकटॉक स्टार मोहित मोरे तथा जून में पश्चिम विहार के प्रॉपर्टी डीलर अमित कोचर की हत्या के लिए गिरोहों ने किशोरों का ही इस्तेमाल किया था। किशोरों द्वारा हत्याएं करवाने की ये घटनाएं कोई अपवाद नहीं हैं बल्कि उस रुझान का हिस्सा हैं जिनके तहत किशोर अपराध कानून का दुरुपयोग हो रहा है। 

कोई आश्चर्य नहीं कि दिल्ली के अपराधों में किशोरों की भरमार है। गत दो वर्षों में ही 5 हजार किशोरों को विभिन्न अपराधों में गिरफ्तार किया गया है। 2019 में अक्तूबर तक ही दिल्ली पुलिस ने 2050 किशोरों को गिरफ्तार किया था। 2018 में उनकी संख्या 2930 थी। यह बात और भी ङ्क्षचताजनक है कि अपराध करने वालों में शिक्षित किशोरों की संख्या अशिक्षित किशोरों से अधिक थी। किशोर हत्या से लेकर हथियारों की तस्करी जैसे संगीन अपराधों में भी लिप्त हो चुके हैं। गत नवम्बर में पुलिस ने एक किशोर को गिरफ्तार किया था जो मथुरा के एक गिरोह से हथियारों की आपूॢत दिल्ली में किया करता था।

अपराधियों में लोकप्रिय बाहरी दिल्ली, रोहिणी तथा द्वारका जैसे इलाकों के गैंगस्टर्स से उसके अच्छे सम्पर्क थे।
पुलिस अधिकारियों की मानें तो अपराधों के लिए किशोरों का उपयोग करने के चलन की शुरूआत दक्षिण दिल्ली के कुख्यात गैंगस्टर देवा ने 2002 के आसपास की थी। वह उन्हें चुन कर संगीन अपराधों के लिए ट्रेनिंग दिया करता था क्योंकि उसे पता था कि कानूनी प्रावधानों की वजह से किशोरों को न तो कठोर सजा होगी और न ही पूछताछ के दौरान उन पर ‘थर्ड डिग्री’ इस्तेमाल होगी। हत्या के मामलों में भी किशोरों को अधिकतम 3 वर्ष की कैद होती है। वक्त के साथ अन्य गिरोह भी यही हथकंडा अपनाने लगे। 

स्थिति इसलिए भी अत्यधिक ङ्क्षचतित है क्योंकि हाल के सालों में ऐसी घटनाओं की बहुतायत देखने को मिली है जिनसे पता चलता है कि अब किशोर आए दिन गम्भीर अपराधों में संलिप्त रहने लगे हैं। ऐसे हालात में इस मुद्दे पर गहनता के साथ विचार करने की आवश्यकता है कि विभिन्न प्रकार के अपराध के मामलों में किशोर अपराध कानून को किन मापदंडों के आधार पर परिभाषित तथा लागू किया जाए ताकि इस खतरनाक चलन को रोका जा सके।

साथ ही इस बात पर भी हमें गहनता के साथ विचार करना होगा कि किन कारणों से हमारे बच्चे गलत राह पर आगे बढऩे लगे हैं? क्या बढ़ते किशोर अपराधों के लिए केवल वही जिम्मेदार हैं अथवा इसकी एक वजह हमारा पालन-पोषण और सामाजिक हालात तो नहीं हैं?

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