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governments should provide small scale houses to migrants on rent or installments aljwnt

सरकारें प्रवासी मजदूरों को सस्ते-छोटे मकान बनाकर किराए या किस्तों पर दें

  • Updated on 6/11/2020

निरंतर फैल रहे शहरों और बढ़ रही जनसंख्या के कारण पंजाब हरियाणा और दिल्ली के शहरों में ही नहीं बल्कि देश के अनेक शहरों में मकानों की भारी कमी महसूस की जा रही है जिस कारण बड़ी संख्या में लोगों के सामने आवास की समस्या उत्पन्न हो गई है।

इसी को देखते हुए इम्प्रूवमैंट ट्रस्ट जालंधर आर्थिक रूप से कमजोर और बेघर लोगों के लिए सूर्या एन्क्लेव, एक्सटैंशन की खाली पड़ी 6 एकड़ भूमि पर एल.आई.जी. और एम.आई.जी. फ्लैट बनाने की नई योजना शुरू करने जा रहा है जिसके अंतर्गत 750 फ्लैट बनाए जाएंगे।

ट्रस्ट का इस परियोजना में प्रत्येक फ्लैट के लिए इच्छुक खरीदारों को 1.50 लाख रुपए की सबसिडी देने के अलावा बैंकों से ऋण प्राप्त करने में सहायता के लिए ‘ऋण मेले’ आयोजित करने का भी प्रस्ताव है।

प्रत्येक व्यक्ति का यह सपना होता है कि उसका भी अपना एक घर हो जिसमें वह बिना किसी चिंता के जीवन बिताते हुए अपने परिवार का पालन-पोषण कर सके परंतु आज के कठिन दौर में सरकार की सहायता के बिना  इस सपने को पूरा कर पाना संभव नहीं रहा।

इस लिहाज से इम्प्रूवमैंट ट्रस्ट जालंधर का यह प्रस्ताव अच्छा है जिसे जल्द से जल्द अमल में लाना चाहिए परंतु इसके साथ ही इसी समस्या से जुड़े एक अन्य पहलू की ओर भी ध्यान देना भी बहुत आवश्यक है। 

आज पंजाब के युवा हाथ से मेहनत करने से संकोच करने और 10+2 तक शिक्षा प्राप्त करने के बाद विदेशों की ओर रुख करने लगे हैं जिससे पंजाब के गांवों के गांव युवकों से खाली हो गए हैं, हालांकि विदेश में भी वे मेहनत-मजदूरी और हर छोटा-बड़ा काम करते हैं जो अपने देश में नहीं करना चाहते। अन्य राज्यों में भी लगभग ऐसी ही स्थिति है।

स्थानीय युवकों के यहां से चले जाने के कारण पंजाब तथा पड़ोसी राज्यों में श्रमिकों की भारी कमी पैदा हो गई जिसे न सिर्फ दूसरे राज्यों से आए प्रवासी श्रमिकों ने पूरा किया है बल्कि वे देश की अर्थव्यवस्था में 10 प्रतिशत से अधिक का योगदान दे रहे हैं। 

हालांकि देश के अनेक भागों में उद्योग-धंधे इन्हीं के दम पर चल रहे हैं परंतु अधिकांश स्थानों में इन प्रवासी मजूदरों को न पहचान मिली, न सुरक्षा और न ही सम्मान, यदि मिला तो सिर्फ शोषण।  

आज के देश में 10 करोड़ से अधिक लोग प्रवासी मजदूरों की तरह काम करते हैं और इसमें 70 प्रतिशत महिलाएं और बच्चे तथा मात्र 30 प्रतिशत पुरुष हैं। आज प्रत्येक 10 भारतीयों में से 3 लोग प्रवासी मजदूरों के रूप में अपने गृहराज्य से दूर जाकर काम करते हैं।

ये लोग कल-कारखानों और दुकानों में काम करने के अलावा नाई, धोबी, कपड़े इस्त्री करने वालों, रिक्शा चालक, मोची, कुली, हलवाई, सफाई कर्मचारी, कृषि मजदूर आदि के रूप में काम करके, सब्जी और फलों की रेहडिय़ां लगा कर या फड़ियों पर सामान बेच कर और कबाड़ आदि का धंधा करके 2-2 राज्यों की समृद्धि में अपना योगदान दे रहे हैं।

उद्योग-धंधों की जीवन रेखा समझे जाने वाले ये प्रवासी श्रमिक कोरोना संक्रमण के अभूतपूर्व संकट के दौर में उद्योग-धंधे ठप्प हो जाने के कारण अपनी झुग्गी-झोंपडिय़ों और रहने के अयोग्य मकानों के मालिकों द्वारा किराए के लिए तंग करने और भुखमरी से बचने के लिए अपने राज्यों को लौटने को विवश हो गए थे परंतु लॉकडाऊन खुलने के बाद ये वापस आने लगे हैं।

अत: आवश्यकता इस बात की है कि अन्य लोगों के साथ-साथ झोंपडिय़ों, टूटे-फूटे छोटे मकानों में रह कर और मेहनत-मजदूरी करके अपने परिवारों को पालने वाले इन बेघर लोगों के लिए भी छोटे-छोटे सस्ते मकान बना कर उन्हें किराए अथवा आसान किस्तों पर उपलब्ध करवाए जाएं।

इससे न सिर्फ उन्हें अपने सिर पर एक छत नसीब हो सकेगी बल्कि वे निशिं्चत होकर यहां रह कर अपने परिवारों का पालन-पोषण करने और अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाने के साथ-साथ राज्य की अर्थव्यवस्था मजबूत करने में भी भरपूर योगदान दे सकेंगे।

—विजय कुमार

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