Thursday, Apr 02, 2020
love jihad and how much to love jihad

‘लव-जेहाद’ कितना सच और कितना फसाना

  • Updated on 1/24/2020

दिनों कैथोलिक बिशप की सर्वोच्च संस्था ‘‘द सायनॉड ऑफ साइरो-मालाबार चर्च’’ ने केरल में योजनाबद्ध तरीके से ईसाई युवतियों के धर्म परिवर्तन का मुद्दा उठाया। लगभग उसी कालांतर में पाकिस्तान स्थित सिंध में 3 और नाबालिग ङ्क्षहदू लड़कियों, जिसमें से एक का धर्म परिवर्तन करने के बाद जबरन निकाह कर दिया गया, का अपहरण कर लिया गया। धरातल पर कहने को दोनों मामले भारतीय उपमहाद्वीप के 2 अलग हिस्सों से सामने आए हैं, किंतु इनका आपस में बहुत ही गहरा संबंध है। इन दोनों घटनाओं के पीछे एक ही विषाक्त दर्शन है। 

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, 19 जनवरी (रविवार) को केरल स्थित साइरो-मालाबार चर्च के सामूहिक प्रार्थना के दौरान एक परिपत्र को पढ़ा गया। इसमें केरल सहित अन्य राज्यों की ईसाई युवतियों को प्रेमजाल में फंसाने और इस्लामिक स्टेट जैसे खूंखार आतंकवादी संगठनों में भेजे जाने के खिलाफ चेतावनी थी। इससे कुछ दिन पहले ही ‘‘द सायनॉड ऑफ साइरो-मालाबार चर्च’’ के काॢडनल जॉर्ज एलनचेरी की अध्यक्षता में हुई बैठक में भी राज्य पुलिस पर ‘‘लव-जेहाद’’ के मामलों पर ठोस कार्रवाई नहीं करने का आरोप लगाया गया था। जैसे ही ‘‘लव-जेहाद’’ का मामला पुन: विमर्श में आया, एकाएक केरल की वामपंथी सरकार ने आरोपों का खंडन कर दिया। केरल के वित्त मंत्री थॉमस ईसाक ने कहा, ‘‘बिशप के आरोपों का कोई आधार नहीं है। पूर्व में ऐसे कई आरोप लगाए गए थे लेकिन सरकारी जांच में इसका कोई आधार नहीं मिला।’’

क्या किसी ईसाई संगठन ने पहली बार ‘‘लव-जेहाद’’ का मुद्दा उठाया 
इस पृष्ठभूमि में यक्ष प्रश्न है कि क्या केरल में चर्च या किसी ईसाई संगठन ने पहली बार ‘‘लव-जेहाद’’ का मुद्दा उठाया है?-नहीं। लगभग एक दशक पहले 2009 में केरल कैथोलिक बिशप काऊंसिल ने कहा था ‘‘2006-09 के बीच 2,800 से अधिक ईसाई महिलाओं का इस्लाम में धर्म परिवर्तन किया गया था।’’ हालिया मामले को लेकर भी एक अंग्रेजी दैनिक से बात करते हुए केरल के इसी बिशप काऊंसिल के उप-महासचिव वर्गीस वलीक्कट ने कहा- ‘‘लव-जेहाद’’  को केवल प्रेम के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, इसका एक व्यापक दृष्टिकोण है। सैकुलर राजनीतिक दलों को कम से कम यह स्वीकार करना चाहिए कि लव-जेहाद एक सच है। राज्य का एक समूह कट्टरपंथी हो रहा है, जिसका संबंध वैश्विक इस्लाम से है। इनके नाम भले ही अलग-अलग हों, किंतु इनका नेतृत्व करने वालों के उद्देश्य समान हैं। यह एक बड़ी समस्या है, जिसका हम वर्षों से सामना कर रहे हैं किंतु केरल में पंथनिरपेक्ष राजनीतिक दल राजनीति के कारण इन मुद्दों पर चर्चा करने से बच रहे हैं।’’

सभी ‘‘काफिर’’ युवतियों को भी  निशाना बनाया जा रहा
ऐसा नहीं कि ‘‘लव-जेहाद’’ की शिकार केवल ईसाई युवतियां ही हो रही हैं। वास्तव में, सभी ‘‘काफिर’’ युवतियों को भी योजनाबद्ध तरीके से निशाना बनाया जा रहा है। विडम्बना देखिए कि केरल की वर्तमान वामपंथी सरकार जिस ‘‘लव-जेहाद’’ को आधारहीन बता रही है, उसी के वरिष्ठ नेता वी.एस. अच्युतानंदन ने जुलाई 2010 में बतौर केरल के मुख्यमंत्री दिल्ली में प्रैसवार्ता करते हुए कहा था- ‘‘समूचे केरल के इस्लामीकरण की साजिश चल रही है। वहां सुनियोजित तरीके से ङ्क्षहदू लड़कियों के साथ मुस्लिम लड़कों के निकाह करने का षड्यंत्र चलाया जा रहा है।’’ 

केवल भारत या उसके किसी एक क्षेत्र तक ‘‘लव-जेहाद’’ सीमित नहीं है। विश्व का सबसे सम्पन्न, विकसित और प्रगतिशील देश- ब्रिटेन भी इससे अछूता नहीं है। वर्ष 2018 में ब्रिटेन स्थित एक सिख संगठन ने दावा किया था कि पाकिस्तानी मूल के मुस्लिम, गत 50 वर्षों से भारतीय मूल की सिख युवतियों का यौन-शोषण कर रहे है। इनमें कई युवतियों को अपने प्यार के जाल में फंसाकर पहले उनका बलात्कार किया गया और फिर उन्हें परिवार के अन्य सदस्यों के समक्ष भी परोस दिया। 
वहां ईसाई युवतियां भी दशकों से जेहादियों के निशाने पर हैं। रॉकडैल और रॉदरहैम में युवतियों (नाबालिग सहित) का यौन उत्पीडऩ- इसका उदाहरण है, जिसमें पाकिस्तानी और अफगानी मूल के मुस्लिम दोषी पाए गए थे। ब्रिटेन में लेबर पार्टी की नेता और पूर्व सांसद सारहा चैम्पियन इन मामलों को राष्ट्रीय स्तर पर उठा चुकी हैं। 

क्या है लव-जेहाद की पृष्ठभूमि?
‘‘लव-जेहाद’’ की पृष्ठभूमि उस विषैले दर्शन में निहित है, जिसमें विश्व को ‘‘मोमिन’’ और ‘‘काफिर’’ के बीच बांटा गया है। इस जहरीले ङ्क्षचतन के अनुसार, प्रत्येक सच्चे अनुयायी का यह मजहबी कत्र्तव्य है कि वह काफिरों की झूठी पूजा-पद्धति को नष्ट कर तलवार, छल, फरेब और प्रलोभन के माध्यम से उन्हें धर्म परिवर्तन के लिए प्रेरित करे या फिर मौत के घाट उतार दे- चाहे इसके लिए अपनी जान की बाजी ही क्यों न लगानी पड़े। इसी मानसिकता ने मोहम्मद बिन कासिम, महमूद गजनवी, गौरी, तैमूर, बाबर, अलाऊद्दीन खिलजी आदि कई विदेशी आक्रांताओं को भारत पर आक्रमण के लिए प्रेरित किया। 

सच तो यह है कि 1,400 वर्ष पहले जन्मे इस्लाम का वर्तमान स्वरूप आज हम देख रहे हैं, जिसमें विश्व की कुल आबादी 750 करोड़ में से इस्लाम अनुयायियों की जनसंख्या 180 करोड़ है और दुनिया में पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बंगलादेश, अरब, ईरान सहित 50 से अधिक घोषित इस्लामी राष्ट्र या मुस्लिम बहुल देश हैं- वह लगभग जेहाद के कारण ही संभव हुआ है।

इसी जेहाद ने 70 वर्षों में पाकिस्तान की जनसंख्या को शत-प्रतिशत इस्लाम बहुल कर दिया है। क्या यह सत्य नहीं कि विभाजन के समय जिस पाकिस्तान की कुल जनसंख्या में 15-16 प्रतिशत आबादी ङ्क्षहदू, सिख और जैन आदि अनुयायियों की थी, वे आज एक प्रतिशत रह गए हैं? यही शेष गैर-मुस्लिम अब भी जेहाद का शिकार हो रहे हैं। ताजा मामला सिंध के जैकोबाबाद का है, जहां महक कुमारी नाम की एक ङ्क्षहदू नाबालिग 15 जनवरी को एकाएक गायब हो गई। 3 दिन बाद एक वीडियो के माध्यम से खुलासा हुआ कि महक का इस्लाम में धर्म परिवर्तन के बाद अली रजा से निकाह करा दिया गया। बकौल मीडिया रिपोर्ट, इस युवक की पहले से 2 पत्नियां और 4 बच्चे हैं। महक के अपहरण से एक दिन पहले ही 2 ङ्क्षहदू लड़कियों को भी सिंध स्थित थारपारकर के उमर गांव से अगवा कर लिया गया था। इस तरह की दर्जनों घटनाओं से परेशान होकर स्थानीय ङ्क्षहदुओं ने पाकिस्तान सरकार को चेतावनी दी है कि यदि उनकी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की गई, तो वे पाकिस्तान छोडऩे को विवश हो जाएंगे। 1990 के दशक में इसी प्रकार की रुग्ण परिस्थितियों के बीच कश्मीर से 4-5 लाख हिंदू पलायन के लिए मजबूर हुए थे।

पाकिस्तान में गैर-मुस्लिमों के प्रति जेहाद आसान है
पाकिस्तान में गैर-मुस्लिमों के प्रति जेहाद आसान है, क्योंकि उसका वैचारिक अधिष्ठान, व्यवस्था और इको-सिस्टम ‘‘काफिर’’ विरोधी दर्शन पर आधारित है। इसलिए ऐसे मामलों में स्थानीय लोगों और प्रशासन का भी समर्थन मिलता रहता है। अब चूंकि हमारा देश ङ्क्षहदू बहुल है, जहां 79 प्रतिशत आबादी ङ्क्षहदुओं की है,  इसलिए यहां पाकिस्तान की भांति तौर-तरीके अपनाकर गैर-मुस्लिमों का धर्म परिवर्तन करना कठिन है। इसी कारण यहां जेहाद के लिए तथाकथित प्रेम का प्रयोग किया जा रहा है। यह कोई दो वयस्कों के बीच प्यार का मामला नहीं है, केवल मजहबी दायित्व की पूॢत है, जिसके निर्वहन से ‘सच्चे’ मुसलमान को जन्नत में स्थान मिलने का दर्शन है। 

फिर भी भारत में कई पक्षों द्वारा उठाए जा रहे ‘‘लव-जेहाद’’ को देश के स्वघोषित राजनीतिक दल और वामपंथियों का समूह साम्प्रदायिक चश्मे से देखकर मिथक या काल्पनिक बताते हैं। क्या यह सत्य नहीं कि न्यायालयों ने भी राष्ट्रीय सुरक्षा की खातिर इसका संज्ञान समय-समय पर लिया है? वर्ष 2006 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ और दिसम्बर 2009 में केरल उच्च न्यायालय की टिप्पणियां- इसका प्रमाण है। 

‘‘लव-जेहाद’’  न ही काल्पनिक है और न ही यह केरल में ङ्क्षहदुओं तक सीमित। यह ठीक है कि इस समस्या की ओर ध्यान दिलाने का काम अभी तक कुछ हिंदू और ईसाई संगठनों ने किया है। वास्तव में, ‘‘लव-जेहाद’’ देश की बहुलतावादी और पंथनिरपेक्षता के लिए बड़ा खतरा है। 2 वयस्क प्रेमियों के बीच मजहब की दीवार कभी नहीं बननी चाहिए परंतु यदि तथाकथित ‘‘प्यार’’ के माध्यम से एक वयस्क मजहबी कारणों से दूसरे को अपने प्रेम के प्रपंच में फंसाए, तो उसे धोखा ही कहा जाएगा। क्या इस प्रकार के धोखे को स्वीकार करने से सभ्य समाज स्वस्थ रह सकता है?

बलबीर पुंज

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