Monday, Jan 24, 2022
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mahashay gokul chand ji of batala a selfless social activist aljwnt

प्रेरणास्रोत नि:स्वार्थ समाजसेवी बटाला के महाशय गोकुल चंद जी

  • Updated on 5/26/2021

बटाला के प्रसिद्ध समाज सेवी महाशय गोकुल चंद का 15 मई को 99 वर्ष की आयु में निधन हो गया। अपना पूरा जीवन समाज सेवा में लगाने वाले महाशय गोकुल चंद का जन्म 10 जून, 1922 को बटाला के आर्यसमाजी परिवार में हुआ और इन्होंने आजीवन अविवाहित रह कर जनसेवा की। 

13 वर्ष की आयु में ही इन्होंने ‘बालसभा’ बनाकर बच्चों में देशभक्ति और समाज के प्रति समर्पण का भाव जगाना शुरू कर दिया और बाद में अपने कुछ साथियों के साथ मिल कर ‘दैनिक प्रार्थना सभा’ का गठन किया।

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महाशय जी ने संतानों द्वारा ठुकराए बुजुर्गों (Elderly) आश्रय देने के लिए वृद्ध आश्रम शुरू किया, ज्ञान के प्रसार के लिए पुस्तकालय खोला जो समय बीतने के साथ-साथ नगर का सबसे बड़ा पुस्तकालय बन गया। 

शिक्षा के प्रसार के लिए उन्होंने बटाला में लड़कियों और लड़कों के अलग-अलग कालेज और रोगियों के इलाज के लिए कौशल्या देवी सानन आई हॉस्पिटल, मोहरी लाल चानन देई मैटर्निटी हॉस्पिटल, जनरल हॉस्पिटल, लैबोरेटरी व एक्स-रे सेंटर सहित आदि कायम किए। 

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मुझे महाशय जी ने ‘दैनिक प्रार्थना सभा’ के कार्य देखने के लिए बटाला आमंत्रित किया और इसी के अनुसार मैं बटाला गया और ‘दैनिक प्रार्थना सभा’ द्वारा संचालित वृद्ध आश्रम, सती लक्ष्मी देवी गौशाला, पुस्तकालय, धर्मवीर बाल हकीकत राय की पत्नी लक्ष्मी देवी की याद में निर्मित समाधि स्थल देखने के अलावा शाम को आयोजित समारोह में शामिल हुआ। 

इस अवसर पर उन्होंने मुझे बोलने के लिए कहा तो मैंने कहा कि मैं आपसे कुछ मांगना चाहता हूं। तब तक सितम्बर, 1997 में लुधियाना स्थित ज्ञानस्थल मंदिर में स्व. जगदीश बजाज की देखरेख में राशन वितरण का काम शुरू हो चुका था। 
अत: मैंने उनसे कहा कि आप भी जरूरतमंद बहनों को मासिक राशन देने की घोषणा करें तो उन्होंने कहा कि ऐसा हो जाएगा और अगले माह से ही विधवा बहनों के लिए प्रति मास राशन देने की सेवा शुरू कर दी। 

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महाशय जी ने पंजाब में बटाला के अलावा उत्तराखंड के हरिद्वार, उत्तर प्रदेश के वृंदावन व हिमाचल प्रदेश के चिन्तपूर्णी धाम में धर्मशालाओं और गौशालाओं आदि का निर्माण करवाया। 

नवम्बर, 2009 में महाशय जी के आमंत्रण पर मैं वृंदावन गया। मैंने यह क्षेत्र पहले नहीं देखा था। हम मथुरा पहुंचे तो टूटी-फूटी सड़कें, धूल-मिट्टी तथा गंदगी के ढेर देख मन में भारी पीड़ा हुई।

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जब हम वहां हाथ-मुंह धो रहे थे तो पानी कुछ खारा-सा लगा। पूछने पर बताया गया कि यहां की नगरपालिका द्वारा पानी की आपूर्ति का कोई प्रबंध नहीं है तथा लोगों को पीने के लिए पानी बाहर से मंगवाना पड़ता है। 

बहरहाल, वृंदावन पहुंच कर मैंने महाशय जी द्वारा संचालित ‘श्री राधा ब्रज रमण लाल मंदिर’ में बनाए ‘साधक निवास’ का उद्घाटन किया। मंदिर के पुराने प्रबंधकों ने महाशय जी के काम से प्रभावित होकर उन्हें यह मंदिर सौंपा था। महाशय जी ने इसका जीर्णोद्धार करवाया और इसमें लिफ्ट आदि लगवाई।

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‘साधक निवास’ के उद्घाटन के लिए मुझे निमंत्रण देते हुए महाशय जी ने कहा था कि वहां जरूरतमंद बहनों को राशन भी देना है। अत: मेरे वहां पहुंचने पर 50 से अधिक बुजुर्ग विधवा बहनों को राशन दिया गया जिनके बच्चे उन्हें कुछ रुपए देकर वृंदावन के मंदिरों में यह कह कर छोड़ गए थे कि अब आप यहां रह कर प्रभु का भजन किया करें।

मंदिर वालों ने उन्हें रहने को स्थान दे रखा था तथा उनके खाने-पीने की व्यवस्था की हुई थी और उनको भजन करने के बदले में कुछ पैसे वहां से मिल जाते थे। सभी महिलाएं बुजुर्ग थीं और सभी ने एक साड़ी में स्वयं को लपेटा हुआ था। 
उनकी यह दयनीय दशा देखकर मेरा मन अत्यंत दुखी हुआ कि जिन बच्चों को इन्होंने लाड़-प्यार से पाल-पोस कर बड़ा किया, उन्होंने ही इन्हें छोड़ दिया और फिर कभी मिलने ही नहीं आए।

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महाशय जी की विशेषता उनकी सादगी थी। स्वदेशी के प्रति उनका इतना लगाव था कि उन्होंने सारी उम्र खादी के वस्त्र बिना इस्तरी किए हुए ही पहने और जीवन भर चप्पल भी चमड़े की नहीं पहनी।

समाज के हर वर्ग के लोगों का ध्यान रखना सरकारों का काम होता है। जो काम सरकारों को करना चाहिए वह काम महाशय गोकुल चंद जैसे लोग ही कर रहे हैं। 

अपना जीवन देकर समाज के पिछड़े व कमजोर लोगों की सहायता के लिए ही महाशय गोकुल चंद जी जैसे लोगों का इस धरती पर आगमन होता है जिनकी याद उनके जाने के बाद भी सदा बनी रहती है।

—विजय कुमार

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