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कोरोना की दवाई खोजने में तेजी व औद्योगिक गतिविधियां तुरंत शुरू करने की जरूरत

  • Updated on 5/9/2020

सदी के सबसे बड़े संकट के रूप में उभरे ‘कोरोना’ से आज समूचे विश्व में आर्थिक, व्यावसायिक और औद्योगिक गतिविधियां ठप्प हो जाने से यह माहमारी, महामंदी तथा भुखमरी की ओर तेजी से बढ़ रहा है। भारत में इस कारण लागू कफ्र्यू और लॉकडाऊन से अर्थव्यवस्था को भारी हानि हुई है। उद्योग-धंधे बंद होने से बेरोजगारी में रिकार्ड तोड़ वृद्धि के अलावा प्रवासी मजदूरों के पलायन की भारी समस्या पैदा हो गई है।

अप्रैल महीने में देश में सभी क्षेत्रों में बेरोजगारों की संख्या बढ़ कर 12.20 करोड़ से अधिक हो गई है। इनमें 9.13 करोड़ छोटे व्यापारी और मजदूर, 1.78 करोड़ वेतनभोगी मजदूर तथा पार्ट टाइम कर्मचारी हैं। प्रवासी मजदूरों के अपने राज्यों को लौटने के लिए मची हलचल और लेबर का खर्चा बहुत अधिक बढ़ जाने से बड़े उद्योग-व्यवसाय तथा लाखों छोटे और दरम्याने व्यापारियों के लिए कामगारों की कमी और उनकी बढ़ी मजदूरी की समस्या का सामना करना कठिन हो गया है।
अभी से कंस्ट्रक्शन, उपभोक्ता वस्तुओं और ई-कामर्स क्षेत्र में यह प्रभाव साफ दिखाई दे रहा है और लॉकडाऊन की समाप्ति पर देश के प्रमुख उद्योगों में पूर्ण स्तर पर उत्पादन शुरू होने परइसका दुष्प्रभाव स्पष्ट दिखाई देगा।

ई-कामर्स डिलीवरी तथा वेयर हाऊस स्टाफ की उजरतों में 25 प्रतिशत से 100 प्रतिशत तक का इजाफा हो चुका है और इसमें अगले कुछ महीनों तक कमी आने की संभावना नहीं है। इस स्थिति के परिणामस्वरूप व्यापारिक प्रतिष्ठानों की विकास दर में कमी आएगी। यदि उद्योगों को जल्द चलाने की अनुमति नहीं मिली तो हालात और भी बिगड़ जाएंगे। मजदूर अपने घर चले गए तो उन्हें वापस लाने की सरकार की कोई योजना न होने के कारण उद्योगों को चलाने की अनुमति मिलने पर भी वे चल नहीं पाएंगे तथा मजदूरों का पलायन उद्योगों के लिए और संकट खड़ा कर देगा। अत: अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए औद्योगिक इकाइयों को शीघ्र चालू करना होगा ताकि श्रमिकों का पलायन रोका जा सके। इसी के दृष्टिगत उद्योग जगत के अग्रणी नेताओं का कहना है कि सरकार को सही समय का इंतजार किए बगैर देश की अर्थव्यवस्था को सामाजिक दूरी और अन्य सुरक्षा मानकों का पालन करते हुए खोल देना चाहिए।

इनके अनुसार निर्माण एवं अन्य सेवाओं के क्षेत्र में आई भारी गिरावट रोकने के लिए सरकार द्वारा तुरंत सुधारात्मक कदम उठाने की जरूरत है जिससे मांग तथा उद्योगों द्वारा काम तेज करने के जज्बे को बढ़ावा मिले। लॉकडाऊन ने दिहाड़ी मजदूरों को कंगाल और व्यापार-व्यवसाय को अपंग कर दिया है। लॉकडाऊन ने उनके जीवन के कमजोर ताने-बाने को छिन-भिन्न करके रख दिया है। नकारात्मक विकास की समस्या का सामना कर रही अर्थ व्यवस्था में लेबर की कमी भारी समस्या पैदा कर सकती है। अत: उपभोक्ताओं में मांग और उद्योग और व्यवसाय वर्ग को बढ़ावा देने का एकमात्र उपाय वित्तीय घाटों की ंिचंता किए बगैर उन्हें राहतों के अधिक पैकेज देने की आवश्यकता है क्योंकि उद्योग एवं व्यवसाय जगत को अभी तक जो कुछ दिया गया है वह अर्थव्यवस्था को सुधारने और उनकी रोजी-रोटी को सुनिश्चित करने के लिहाज से बहुत कम है। इसके लिए अनिवार्यरूप से सरकार को घरेलू स्रोतों और यदि जरूरी हो तो विदेशों से संसाधन जुटाने चाहिए और अपने कम स्रोतों से ‘कोरोना’ का मुकाबला कर रही राज्य सरकारों की भी सहायता करनी चाहिए। यदि ऐसा न करना हो तो केंद्र सरकार अपने केंद्रीय बैंक से राज्य सरकारों द्वारा जारी बांड खरीदने को कह सकती है क्योंकि राज्य सरकारों की विकासात्मक गतिविधियां किसी भी हालत में रुकनी नहीं चाहिए।

व्यापार और उद्योग जगत द्वारा एम.एस.एम.ई. (मध्यम, लघु और सूक्ष्म उद्योग) द्वारा ऋणों आदि पर ब्याज एक साल के लिए रोकने, विशेष आर्थिक पैकेज देने, लॉकडाऊन के दौरान वसूले जाने वाले स्थायी सेवा शुल्क समाप्त करने, अप्रैल के बाद की बंद अवधि के श्रमिकों के वेतन के भुगतान ई.एस.आई. फंड से करने, अन्य गैर पंजीकृत श्रमिकों के लिए श्रमिक कल्याण, आर्थिक पैकेज घोषित करने, बिजली बिल माफ करने आदि की मांग की जा रही है।

जब तक ‘कोरोना’ की वैक्सीन नहीं या कोई प्रभावशाली चिकित्सा नहीं खोजी जाती तब तक यह संकटजाने वाला नहीं है। अत: आवश्यकता इस बात की है कि भारत सरकार ‘कोरोना’ की दवा का प्रशिक्षण तेज करने के साथ-साथ बचाव संबंधी नियमों का पालन करते हुए फैक्टरियों में उत्पादन पहले की भांति तेजी से शुरू करवाए।

-विजय कुमार

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