Wednesday, Jan 19, 2022
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‘नेपाल पर सत्ता कायम रखने के लिए’ ‘ओली ने खेला हिन्दू कार्ड’

  • Updated on 2/4/2021

एकाएक 20 दिसम्बर, 2020 की सुबह नेपाल के प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ‘ओली’ की सिफारिश पर राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी द्वारा देश की संसद भंग कर 30 अप्रैल और 10 मई को 2 चरणों में देश में चुनाव करवाने की घोषणा के विरुद्ध नेपाल में जन आक्रोश भड़क उठा है और सरकार विरोधी प्रदर्शन जारी हैं। ‘खड्ग प्रसाद शर्मा’ (के.पी.शर्मा) ‘ओली’ के इस कदम के विरुद्ध रोष स्वरूप ‘नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी’ के दोफाड़ हो जाने के बाद जहां कम्युनिस्ट पार्टी के चुनाव चिन्ह को लेकर लड़ाई शुरू हो गई है वहीं पार्टी के एक धड़े ने ‘ओली’ को पार्टी से बाहर निकाल दिया हैै। 

अभी तक स्वयं को नास्तिक कहते आए ‘ओली’ पचास से अधिक वर्षों से कम्युनिस्ट विचारधारा से जुड़े हुए हैं। इनके पिता पं. मोहन प्रसाद ओली ज्योतिषी थे परंतु धर्म को ‘अफीम’ मानने वाले के.पी. शर्मा ‘ओली’ हमेशा धर्म-कर्म की बातों से इंकार करते रहे और सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि ‘‘दुनिया में कोई भगवान नहीं है और अगर भगवान है तो वह सिर्फ और सिर्फ ‘कार्ल माक्र्स’ ही है।’’ परंतु अब अपनी कुर्सी खिसकती देख कर उन्होंने अपने कट्टïर कम्युनिस्ट वाले चोले में एकाएक हिंदुत्व का रंग भरना शुरू कर दिया है। नेपाल के हिन्दू राजतंत्र का विरोध करने वाले ‘ओली’ अब हिन्दू धार्मिक अनुष्ठानों में बढ़चढ़ कर भाग लेने और मंदिरों में जाने लगे हैं। गत सप्ताह वह काठमांडू स्थित प्रसिद्ध ‘पशुपति नाथ मंदिर’ में अपनी पत्नी राधिका के साथ विशेष पूजन के लिए गए। उन्होंने वहां सवा घंटा पूजा-अर्चना की व देसी घी के सवा लाख दीपक भी जलाए। 

इस अवसर पर उन्होंने मंदिर में लगने वाले 108 किलो सोने की खरीद के लिए 30 करोड़ रुपए देने की घोषणा भी की और ‘पशुपति क्षेत्र विकास ट्रस्ट’ के अध्यक्ष एवं देश के संस्कृति मंत्री ‘भानु भक्त आचार्य’ को निजी रूप से सोना खरीदने के लिए धन का प्रबंध करने और मंदिर को सनातन धर्मावलंबियों के पवित्र तीर्थ स्थल के रूप में विकसित करने का निर्देश भी दिया। के.पी. शर्मा ओली की इस मंदिर यात्रा के अगले ही दिन मंदिर ट्रस्ट की बैठक में एक सप्ताह के भीतर नेपाल राष्ट्रीय बैंक से सीधे तौर पर सोना खरीदने का फैसला कर लिया गया।

‘पशुपति नाथ मंदिर’ में पूजा करने वाले वह नेपाल के पहले प्रधानमंत्री हैं। इससे पहले वह किसी मंदिर में नहीं गए थे। माना जा रहा है कि उन्होंने ऐसा करके संसद को भंग करने से उपजा जनरोष कम करने की कोशिश की है। ओली के इस कदम को संविधान पर हमला बताया जा रहा है क्योंकि देश के संविधान में नेपाल को एक धर्मनिरपेक्ष राज्य का दर्जा दिया गया है। पशुपति क्षेत्र विकास ट्रस्ट के अधिकारियों के अनुसार मंदिर की स्वर्ण सज्जा का सारा काम ‘ओली’ 11 मार्च से पहले सम्पन्न करवा देना चाहते हैं ताकि यहां महाशिवरात्रि का पर्व धूमधाम से मनाया जाए। ट्रस्ट के अधिकारियों के अनुसार यदि 11 मार्च तक ऐसा करना संभव न हुआ तो यह काम 14 मई को मनाए जाने वाले अक्षय तृतीया के पर्व तक तो अवश्य ही सम्पन्न कर दिया जाएगा। 

राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि ओली की इस मंदिर यात्रा के पीछे उनका राजनीतिक एजैंडा छिपा हुआ है और ऐसा करके वह धर्मनिरपेक्षता के लेबल से मुक्त होना चाहते हैं। के.पी. शर्मा ‘ओली’ की विचारधारा में अचानक हिन्दू रीति-रिवाजों के प्रति यह झुकाव ऐसे समय में आया है जब देश में एक हिन्दू राष्ट्र के रूप में 2008 से पहले की स्थिति बहाल करने की मांग पर बल देने के लिए प्रदर्शनों की बाढ़ आई हुई है। ‘ओली’ के इस अप्रत्याशित कदम से नेपाल की राजनीति में गर्मी आ गई है और चीन की कम्युनिस्ट सरकार के मुखिया शी-जिनपिंग को अपने मंसूबों पर पानी फिरता दिखाई देने लगा है। अब ‘ओली’ का यह दाव कितना सफल होता है इसका पता तो आगे चल कर ही चलेगा परंतु अपनी सत्ता कायम रखने के लिए मतदाताओं को प्रभावित करने के उद्देश्य से उनका मंदिर में जाना और मंदिर के सौंदर्यीकरण के लिए भारी धनराशि देना नेपाल की राजनीति में नई करवट का संकेत अवश्य है।

 

—विजय कुमार 

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