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पाकिस्तान के विरोधी दल खोल रहे ‘अपनी सरकार और सेना की पोल’

  • Updated on 10/26/2020

‘‘न हमारे हालात पुराने होते हैं न हमारी नज्में आऊट ऑफ डेट होती हैं’’ यह कहना था मशहूर पाकिस्तानी शायर अहमद फराका का जब उन्हें  2004 में कराची के मुशायरे में ‘मोहासरा’ नज्म सुनाने को कहा गया क्योंकि 1977 में कराची में जब उन्होंने यही नज्म सुनाई थी तो तुरंत जिया-उल-हक की सरकार ने उन्हें जेल में डाल दिया था। इससे पहले भुट्टो सरकार ने भी उनके विरुद्ध लिखने पर, जेल में डाला था और इसके बाद परवेज मुशर्रफ की सरकार ने भी उन्हें देशद्रोही करार दिया था। 

शायद यह अब भी सही है। पाकिस्तान के हालात अगर कुछ बदल भी जाते हैं, तो भी उनकी सेना और उसके जनरल सरकारों को स्वतंत्रता से काम नहीं करने देते हैं।

शुरू से ही पाकिस्तान को ‘निर्देशित लोकतंत्र’ कहा जाता है। चूंकि इसे सेना द्वारा निर्देशित किया जाता है। अत: यह कोई आश्चर्य की बात नहीं थी जब यह आरोप लगाया गया कि पिछले चुनाव में पाकिस्तानी सेना ने इमरान खान को प्रधानमंत्री के रूप में जिताने के लिए धांधली की थी।
हर निर्वाचित प्रधानमंत्री या तानाशाही का नेतृत्व करने वाले जरनैल ही होते हैं, ऐसे में सेना को ‘पवित्र गाय’ ही माना जाता है। कम से कम खुले तौर पर आलोचना न की जाए, वे अपने जनरलों का नाम न लें या सार्वजनिक रूप से उनकी वित्तीय स्थिति का उल्लेख न करें, इसका खास ध्यान रखा गया।

इसलिए इस बार ऐसा क्या हुआ कि पाकिस्तान में विरोधी दलों का अप्रत्याशित गठबंधन जो खुद को ‘पाकिस्तान डैमोक्रेटिक मूवमैंट’ (पी.डी.एम.) कहता है, ने न केवल जनरलों के नाम बल्कि मरियम नवाज ने खुले तौर पर उनके कारनामे सबके सामने बयान कर दिए और कहा कि जनरल बाजवा अमेरिका में लाखों कमाने वाली पिज्जा कम्पनी ‘पापा जोंस’ के मालिक हैं।

गुजरांवाला के पंजाबी शहर में हजारों दर्शकों के लिए लंदन से वीडियो कॉल के माध्यम से संबोधित करते हुए पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने न केवल वर्तमान सरकार पर हमला किया बल्कि देश के सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा को भी कठघरे में खड़ा कर दिया।
उन्होंने कहा, ‘‘आपने (2018) चुनावों में लोगों की पसंद को खारिज कर दिया और लोगों के अक्षम समूह को सत्ता में स्थापित किया। जनरल बाजवा, आपको बढ़ाए गए बिजली के बिलों, दवाओं की कमी और पीड़ित लोगों के लिए जवाब देना होगा।’’

सेना की आलोचना कई स्तरों पर असाधारण है। पहला यह कि मुख्यधारा के किसी राजनेता ने कभी किसी सेना प्रमुख की सार्वजनिक रूप से आलोचना नहीं की। दूसरा, दसियों हजारों दर्शकों के सामने आरोप लगाए गए और तीसरा, एक पारम्परिक सैन्य गढ़ पंजाब में भाषण को सुना और सराहा गया। लेकिन आश्चर्यजनक बात यह है कि भले ही इस कार्यक्रम को टैलीविजन पर प्रसारित नहीं किया गया लेकिन भाषण के वीडियो फुटेज सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से प्रसारित हुए।

भले ही पाकिस्तान के प्रधानमंत्री अक्सर काफी विरोध का सामना करते  रहे हैं पर वह विरोध आंदोलनों के बजाय सैन्य तख्तापलट में फंस जाते हैं। इस्लामाबाद के ङ्क्षथक टैंक तबादला के एक वरिष्ठ साथी मुशर्रफ जैदी ने कहा, ‘‘लोग पाकिस्तान में पी.एम. के कार्यालय की शक्ति को बहुत कम आंकते हैं। जब तक इमरान खान को सेना का समर्थन प्राप्त है, वह अपनी नौकरी में सुरक्षित हैं।’’

लेकिन मौजूदा समय में यह मिसाल ज्यादा नहीं मानी जा सकती। केवल एक चीज जो वास्तव में इमरान खान पर नहीं बल्कि सेना पर सवाल उठ रहे हैं वह है एक गंभीर आर्थिक संकट।

इमरान सरकार या यूं कहें कि सेना अब भी लोगों पर नहीं बल्कि अपने सैन्य साजो-सामान पर धन लगा रही है और पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था वास्तव में भारी परेशानी में है, जो अंतर्राष्ट्रीय मंदी के कारण भारी मुद्रास्फीति दर, नकारात्मक विकास दर और अरबों डॉलर के कर्ज में डूबी हुई है।

ऐसी आर्थिक समस्याओं से बचने के लिए न तो प्रधानमंत्री इमरान खान और न ही पाकिस्तान की सेना के पास कोई घोषणा या रोडमैप है। ऐसे में कौन किसको बचाएगा या किसकी बलि चढ़ाई जाएगी? 

माना यह भी जा रहा है कि जिस प्रकार हजारों की संख्या में कोरोना महामारी के समय लोग सड़कों पर निकल आए हैं केवल इमरान खान का जाना इसका समाधान नहीं होगा। हो सकता है सेना को कुछ सुधार लाने पडं़े और अपने ही कुछ जनरलों को ऊपर-नीचे करना पड़े परंतु ऐसा करने से सेना कमजोर नजर आ सकती है जो उन्हें मान्य नहीं होगा।

दूसरा मुद्दा जो सेना और विपक्षी दल बार-बार उठा रहे हैं वह यह है कि इमरान खान कश्मीर के मामले के समय चुप रहे और जब अनुच्छेद 370 हटाया गया तो उन्हें  इसके बारे में कोई सूचना नहीं थी! तो क्या सेना अपनी ओर से ध्यान हटाने के लिए कुछ युद्ध जैसी परिस्थिति सरहद पर बना देगी! 

पाकिस्तानी उच्चायोगों के सामने विरोध प्रदर्शन की शृंखला में वीरवार को मैनचेस्टर, बॄमघम, ब्रैडफोर्ड और लंदन में वाणिज्य दूतावासों के बाहर प्रदर्शन किए गए। 22 अक्तूबर को ‘ब्लैक डे’ को चिन्हित करने के लिए भी विरोध प्रदर्शन किए गए थे। ये प्रदर्शन 73 साल पहले इसी दिन कश्मीर घाटी पर हमला करने वाले पाकिस्तान की याद दिलाते हैं।
फिलहाल विपक्ष ने मोर्चा बहुत अच्छी तरह से संभाला है। उन्होंने गठबंधन के प्रमुख के रूप में जे.यू.आई.-एफ. के मौलाना फजलुर रहमान को चुना। इसने मरियम नवाज शरीफ और बिलावल भुट्टो-जरदारी के बीच प्रतिद्वंद्विता की किसी भी संभावना को दफन कर दिया।

रहमान को पाकिस्तान में दक्षिणपंथी समूहों के बीच एक विशाल इस्लामवादी कट्टरपंथी माना जाता है। इससे इमरान खान और पाकिस्तानी सेना के लिए विरोध प्रदर्शन का ठीकरा विदेशी ताकतों के सिर मढ़ना मुश्किल होगा। चाहे सोशल मीडिया पर अब पाक सेना, अपने नामों को मिटाती रहे, मगर लोग तो समझ ही रहे हैं।

- विजय कुमार

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