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अच्छे-भलों के काम-धंधे हुए बंद, वे अब घर-घर सब्जियां बेचने को हुए मजबूर

  • Updated on 5/13/2020

‘कोरोना’ ने बहुत कम समय में ही विश्व भर में अत्यंत व्यापक प्रभाव डाला जिसके बारे में उद्योग और व्यापार जगत से जुड़े अग्रणी लोगों और अर्थशास्त्रियों का कहना है कि कोरोना का कहर समाप्त हो जाने के बाद यह दुनिया पहले जैसी नहीं रहेगी।

वास्तव में इस बदलाव के संकेत तो अभी से ही मिलने लगे हैं। भारत की बात करें तो मात्र दो-अढ़ाई महीनों में ही यहां उद्योग-व्यवसाय, शिक्षा और जीवनशैली में न जाने कितने बदलाव आ गए हैं।

इस संकट ने जहां उद्योग-व्यवसाय को चौपट कर दिया है, वहीं शिक्षा संस्थाओं के बंद हो जाने के कारण प्राथमिक कक्षाओं तक की शिक्षा ऑनलाइन हो गई है वहीं बड़ी संख्या में लोग अपने काम धंधों को ताले लगा कर घरों में रहने के लिए विवश हो गए हैं।

सिनेमाघरों और मल्टीप्लैक्सेज के बंद हो जाने के कारण मनोरंजन के सारे साधन घरों की चारदीवारी के अंदर ही सिमट कर रह गए हैं। इसी कारण ‘संयुक्त राष्टï्र बाल कोष’ (यूनिसेफ) ने तो यहां तक भविष्यवाणी कर दी है कि : 

'मार्च में कोरोना को वैश्विक महामारी घोषित किए जाने के बाद से 9 महीनों के भीतर भारत की जनसंख्या रिकार्डतोड़ गति से बढ़ेगी। भारत में दिसम्बर महीने तक 2.41 करोड़ बच्चों के जन्म लेने की संभावना है और स्वास्थ्य सेवाएं सीमित होने के कारण लाखों महिलाएं तथा बच्चे गम्भीर खतरे में होंगे।'

देश में जब ‘लॉकडाऊन’ किया गया तो उद्योग-धंधों के साथ-साथ कई ऐसी दुकानें भी बंद हो गईं जिन पर बैठने वाले कभी ‘सेठ जी’ कहलाते थे और छोटे-बड़े व्यवसायों से जुड़े मध्यम वर्गीय तथा नौकरी पेशा लोग अब छोटे-मोटे काम करने को विवश हो गए हैं :

*  जयपुर में 25 वर्षों से ज्यूलरी का कारोबार कर रहे हुकम चंद सोनी ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि एक दिन उनका यह जमा-जमाया कारोबार ठप्प हो जाएगा और अब वह अपने ज्यूलरी के शो-रूम में गहने नहीं बल्कि सब्जी बेच रहे हैं।

* मध्य प्रदेश के शिवपुरी और करैरा आदि में ऐसे कई परिवार फल और सब्जी बेच कर गुजारा कर रहे हैं जिनका सात-सात पीढिय़ों से टेलरिंग का पुश्तैनी धंधा था। मकैनिकल काम करने वाले बशीर खान तरबूज बेच रहे हैं और होटलों आदि में काम करने वाले भी रेहड़ियां लगा रहे हैं।

*  हरियाणा के रोहतक में कुछ समय पहले तक दूध सप्लाई करने का  काम करने वाला धर्मपाल, विवाह-शादियों  में बैंड बजाने वाला सुनील कुमार, कन्फैक्शनरी का व्यापारी गोला, अल्मारियां बनाने वाले अनिल और विनीत, इलैक्ट्रीशियन जगदीप और ऑटो रिक्शा चालक दीपक उन चंद लोगों में शामिल हैं जिन्होंने अपने पुराने काम-धंधे छोड़ कर सब्जी बेचना शुरू कर दिया है।

*  मध्यप्रदेश के पिथौरागढ़ में अनेक छोटे दुकानदार, फड़ लगाने वाले, खोखों वाले और ठेलों पर चाय-नाश्ता बेचने वाले अपना पुराना धंधा छोड़ कर सब्जी-फल आदि बेच रहे हैं।

*  बिहार के पटना में ऑटो चालक रवि प्रकाश अब अपने ऑटो पर सवारियां ढोने की बजाय इस पर सब्जियां लाद कर इन्हें गली-गली घूम कर बेच रहे हैं। इसी प्रकार हाजीपुर की एक फैक्टरी में नौकरी करने वाला मुकुल राय भी लॉकडाऊन के कारण नौकरी से हटाए जाने के बाद सब्जियां ही बेच रहा है।

* पटना के राजा बाजार में अपने पिता के साथ समोसों की दुकान चलाने वाले प्रवीण कुमार ने तालाबंदी में दुकान बंद होने के बाद आलू बेचने शुरू कर दिए हैं। इसी प्रकार एक ठेला चलाने वाले रंजन ने सामान ढुलाई का काम मिलना बंद हो जाने पर आलू-प्याज की दुकान लगा ली है।

*  उत्तर प्रदेश में शामली का बर्तन बाजार अब सब्जी बाजार में बदल गया है। यही नहीं लॉकडाऊन के कारण पशु व्यापारियों का धंधा भी बंद हो जाने के कारण अनेक पशु व्यापारियों ने फलों की रेहड़ियां लगानी शुरू कर दी  हैं।

* जम्मू में फंसे विभिन्न राज्यों के प्रवासी भी बिल्डिंग कंस्ट्र्क्शन का काम मिलना बंद हो जाने के कारण सब्जी बेचने लगे हैं। ऐसे ही एक प्रवासी मजदूर मध्य पदेश के रहने वाले रवि प्रसाद के अनुसार, 'शुरू-शुरू में तो मुझे कुछ दिक्कत का सामना करना पड़ा लेकिन अब मैंने भी इस धंधे के गुर सीख लिए हैं।'

* कोलकाता भी इससे अछूता नहीं रहा। वहां रिक्शा चालक ‘खोकोन देवनाथ’ को पालक बेचते, नौकरी से निकाले गए एक कर्मचारी को केले बेचते और एक गोलगप्पों की रेहड़ी लगाने वाले उमेश कुमार को भुट्टा बेचते देखा गया।

* झारखंड के रांची और जमशेदपुर में भी गोलगप्पों की रेहडिय़ां लगाने वाले और मांसाहारी पदार्थ  बेचने वाले इन दिनों तरबूज तथा अन्य वस्तुएं बेच रहे हैं।

इनके अलावा भी न जाने ऐसे कितने मामले होंगे जो लॉकडाऊन के कारण अपना जमा-जमाया धंधा बदलने को मजबूर हो गए ताकि बदले हुए हालात में घर में पैसे की आमद हो और उनके परिवारों का पालन-पोषण होता रहे परंतु प्रश्र तो यह है कि आखिर ऐसा कब तक चलेगा? निश्चय ही यह एक गम्भीर समस्या है जिसका उत्तर भविष्य ही दे सकता है।

—विजय कुमार

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