Thursday, Jan 27, 2022
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नेपाल सरकार द्वारा भारतीय क्षेत्रों को अपना बताने वाला नक्शा वापस लेने का सही निर्णय

  • Updated on 5/28/2020

जहां चीन ने 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद हमारी 38,000 वर्ग कि.मी. भूमि पर कब्जा कर रखा है वहीं वास्तविक नियंत्रण रेखा पर भारतीय क्षेत्र में चीनी सेनाओं का अतिक्रमण लगातार जारी है। मात्र इसी महीने दोनों देशों की सेनाओं के बीच कम से कम तीन बार झड़प के बाद दोनों देशों में तनाव चरम पर है। 

इन घटनाओं में जहां चीन ने अनुचित आक्रामकता दिखाते हुए दबंगों की तरह व्यवहार किया वहीं अपने ऊंचाई वाले इलाके में उड़ान भरने के अनुकूल लड़ाकू विमान भी तैनात कर दिए हैं।

इसी को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल, चीफ आफ डिफैंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत और तीनों सेनाओं के प्रमुखों के साथ अलग-अलग बैठक करने के बाद पूर्वी लद्दाख में विकास परियोजनाएं जारी रखने और चीन के बराबर वहां अपनी सेनाएं रखने का निर्णय किया है।

इस बीच अमरीका के राष्टï्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भी भारत और चीन के तनावपूर्ण संबंधों के बीच मध्यस्थता करने का प्रस्ताव रखा है।

अपना भारत विरोधी गुप्त एजैंडा आगे बढ़ाने के साथ ही चीनी नेताओं ने पाकिस्तान और नेपाल के माध्यम से भी भारत विरोधी गतिविधियां जारी रखवाई हुई हैं। नवीनतम मामला भारत के निकटतम पड़ोसी नेपाल का है जिसके साथ कुछ समय पहले तक हमारे बहुत अच्छे संबंध रहे हैं। 

भारत ने रोजगार के लिए भारत आए नेपालियोंं को सुविधाएं देने के अलावा नेपाल के विकास के लिए अरबों रुपए दिए हैं। वहां 2015 में आए भीषण भूकंप से निपटने के लिए भारत सरकार ने 1.6 अरब रुपए और 2018 में  ‘जनकपुर’ के विकास के लिए 1 अरब रुपए की सहायता दी थी। 

इस तथ्य से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि विश्व में मंदिरों के लिए विख्यात ङ्क्षहदू देश नेपाल से भारत में आकर नौकरी करने वाले नेपाली लोग भारत को अपना दूसरा घर मानते हैं और दोनों देशों में रोटी-बेटी का संबंध भी है। 

नेपाल से भारत आकर कमाई करके बड़ी संख्या में नेपाल मूल के लोगों ने न सिर्फ भारत में अपने मकान तक बना लिए हैं और अनेकों ने अपने काम-धंधे भी यहां कायम कर लिए हैं जिससे होने वाली आय से वे नेपाल में रह रहे अपने परिजनों का पालन-पोषण करते हैं बल्कि नेपाल की अर्थव्यवस्था में भी अपना योगदान डाल रहे हैं। 

परंतु पिछले कुछ वर्षों से नेपाल में अपना प्रभाव बढ़ाने और भारत का प्रभाव घटाने की कोशिशों में जुटे चीनी शासकों के उकसाने पर नेपाल के सत्तारूढ़ नेताओं ने अपने भारत विरोधी तेवर तेज कर दिए थे। 

4 अगस्त, 2019 को नेपाल सरकार ने भारतीय मूल के 8 लोगों की नागरिकता रद्द कर दी और भारत से मंगवाई जाने वाली कापियों-किताबों पर 10 प्रतिशत आयात शुल्क लगा दिया। 

हाल ही में नेपाल सरकार ने भारत द्वारा उत्तराखंड के ‘लिपुलेख दर्रे’ तक सड़क बिछाने के विरुद्ध रोष व्यक्त किया तथा महाकाली नदी और कालापानी से लगे ‘छांगरू गांव’ में अपनी पुलिस तैनात कर दी।

19 मई को नेपाल के प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली ने भारत के विरुद्ध एक आपत्तिजनक बयान में कूटनीतिक मर्यादा लांघते हुए नेपाल  में ‘कोरोना’ के प्रसार के लिए भारत को दोषी ठहराते हुए कहा कि ‘‘देश में ‘कोरोना’ के मामले भारत से अवैध तरीके से नेपाल में दाखिल होने वालों के कारण बढ़ रहे हैं जिससे देश में इसका प्रसार रोकना मुश्किल हो गया है।’’ 

25 मई को ओली ने फिर कहा कि ‘‘भारत से लोगों के नेपाल में बिना चैकिंग करवाए दाखिल होने से यहां कोरोना तेजी से फैल रहा है।’’

‘लॉकडाऊन’ के चलते काम बंद हो जाने के कारण अपने घर वालों से मिलने आने वाले नेपालियों को ‘कोरोना का वाहक’ कह कर उनका विरोध करना और इसके लिए भारत को दोषी ठहराना कतई उचित नहीं। बहरहाल इस समय जबकि नेपाल सरकार द्वारा भारत विरोधी तेवरों के चलते दोनों देशों के बीच संबंधों में कटुता पनप रही थी वहीं अच्छी खबर यह आई है कि नेपाल सरकार ने पिछले दिनों जारी विवादास्पद नक्शे का प्रस्ताव वापस लेते हुए उसे संविधान संशोधन की कार्रवाई से हटा दिया है जिसमें उसने ‘लिपुलेख’, ‘कालापानी’ और ‘ङ्क्षलपियाधुरा’ नामक भारतीय इलाके नेपाल में दिखाए थे।

भारतीय नेताओं को भी नेपाल के साथ अपने सदियों पुराने संबंधों को देखते हुए उनके नेताओं के साथ मिल-बैठ कर उनकी शिकायतें और भ्रांतियां दूर करनी चाहिएं ताकि दोनों देशों के आपसी संबंध खराब न हों तथा इस क्षेत्र में शांति और स्थिरता बनी रहे।

—विजय कुमार

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