Sunday, Oct 17, 2021
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निजता का अधिकार और डाटा संरक्षण विधेयक

  • Updated on 7/26/2021

कनिष्ठ विदेश मंत्री मीनाक्षी लेखी ने वीरवार को कहा कि पेगासस विवाद उनकी अध्यक्षता वाली एक संसदीय समिति की रिपोर्ट से जुड़ा था, जिसने व्यक्तिगत डाटा संरक्षण विधेयक की जांच की थी और यह इस तरह के कानून को रोकने का एक प्रयास था।

उन्होंने कहा कि विवाद पैदा करने का समय संसद को अव्यवस्थित करने के लिए था। व्यक्तिगत डाटा संरक्षण रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष को सौंप दी गई है और संसद द्वारा स्वीकार किए जाने के लिए तैयार है।
भाजपा ने पहले ही वीरवार को दावा किया था कि इसराईली कम्पनी एन.एस.ओ. के स्पाईवेयर पेगासस के माध्यम से कथित जासूसी बारे कहानी ‘मनगढ़ंत और सबूत-रहित’ है और इस पर आधारित नई रिपोर्ट ‘मानहानि’ के दावे का आह्वान करती है। 

स्पष्ट है कि आप पेगासस के बारे में जो कहते, महसूस करते,समझते और सोचते हैं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप घोटाले के किस ओर हैं! वह, जिसका फोन हैक हो गया है और गोपनीयता भंग हो गई है या जिसे इसके लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है? 

ऐसे में यह भी समझना अत्यधिक महत्वपूर्ण है कि यह व्यक्तिगत डाटा संरक्षण बिल है क्या और क्यों इसे पारित करने के लिए संसद बार-बार कमेटी  को और अधिक समय देती है?

इस बार तो लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने स्वयं कहा था कि व्यक्तिगत डाटा संरक्षण विधेयक पर संसद की संयुक्त समिति को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी और उन्हें दिए गए समय में कोई विस्तार नहीं दिया जाएगा।

फिर ऐसा क्या हुआ कि मात्र दो सप्ताह से भी कम समय में, लोकसभा ने शुक्रवार को जे.पी.सी. के लिए एक और विस्तार के लिए प्रस्ताव पारित कर दिया। अब संसद के शीतकालीन सत्र के पहले सप्ताह तक इसे अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करनी है।
जे.पी.सी. का गठन दिसंबर 2019 में व्यक्तिगत डाटा संरक्षण विधेयक, 2019 की समीक्षा के लिए किया गया था, जो सरकारी तथा निजी कंपनियों द्वारा व्यक्तिगत डाटा के उपयोग को विनियमित करने का प्रयास करता है। इसे दिया गया यह तीसरा विस्तार है जो शायद अच्छा ही है।

2017 में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस के.एस. पुट्टस्वामी (सेवानिवृत्त) बनाम भारत संघ ने निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में स्थापित किया। फैसले में, कोर्ट ने एक डाटा सुरक्षा कानून की मांग की, जो उपयोगकत्र्ताओं की गोपनीयता को उनके व्यक्तिगत डाटा पर प्रभावी ढंग से सुरक्षित कर सके। नतीजतन, इलैक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) बी.एन. श्रीकृष्ण  की अध्यक्षता में एक मसौदा डाटा संरक्षण कानून तैयार करने को कहा। 
बिल के प्रावधानों पर 2 साल से अधिक समय तक तीखी बहस के बाद, भारत सरकार ने अंतत: 11 दिसंबर, 2019 को संसद में अपना व्यक्तिगत डाटा संरक्षण विधेयक पेश किया। भारत के सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने इसे जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति को भेज दिया।

व्यक्तिगत डाटा संरक्षण विधेयक व्यक्तिगत डाटा को कैसे संसाधित और संग्रहित किया जाना चाहिए, इसके लिए नियम निर्धारित करता है और लोगों के अधिकारों को उनकी व्यक्तिगत जानकारी के संबंध में सूचीबद्ध करता है। यह इस कानून को लागू करने के लिए एक स्वतंत्र नए भारतीय नियामक प्राधिकरण, डाटा सुरक्षा प्राधिकरण (डी.पी.ए.) बनाने का भी प्रस्ताव करता है। विधेयक छूट के लिए आधार भी निर्धारित करता है।

ऐसे में 80 से ज्यादा संशोधन के बाद जो भी सामने आया है वह बिल्कुल अलग है। संशोधित 2019 विधेयक भारत को एक ‘निगरानी राज्य’ में बदलने की क्षमता रखता है, जिसकी मूल विधेयक के प्रारूपकार न्यायमूॢत बी.एन. श्रीकृष्ण द्वारा आलोचना की गई थी। उनका कहना था ‘सरकार किसी भी समय संप्रभुता या सार्वजनिक व्यवस्था के आधार पर निजी डाटा या सरकारी एजैंसी के डाटा तक पहुंच सकती है। इसके खतरनाक निहितार्थ हैं।’

विधेयक में कई प्रावधान शासन की प्रभावशीलता के बारे में चिंता का कारण बनते हैं। ये प्रावधान सरकारी एजैंसियों को व्यापक छूट देकर और उपयोगकर्ता के सुरक्षा उपायों को कमजोर करके विधेयक के उद्देश्यों के विपरीत कर सकते हैं।
उदाहरण के लिए, क्लॉज 35 के अंतर्गत केंद्र सरकार किसी भी सरकारी एजैंसी को विधेयक के अनुपालन से छूट दे सकती है। सरकारी एजैंंसियां विधेयक के अंतर्गत किसी भी सुरक्षा उपाय का पालन किए बिना व्यक्तिगत डाटा को संसाधित करने में सक्षम होंगी। यह उपयोगकर्ताओं के लिए गंभीर गोपनीयता जोखिम पैदा कर सकता है।

इसी तरह, उपयोगकर्ताओं के लिए विधेयक के विभिन्न उपयोगकर्ता सुरक्षा उपायों (जैसे अधिकार और उपचार) को लागू करना मुश्किल हो सकता है। उदाहरण के लिए, विधेयक उन उपयोगकत्र्ताओं के लिए कानूनी परिणामों की धमकी देता है, जो डाटा प्रोसैसिंग गतिविधि के लिए अपनी सहमति वापस लेते हैं। 

इतना तो स्पष्ट है कि स्पाईवेयर पेगासस और पर्सनल डाटा प्रोटैक्शन दोनों अलग चीजें हैं। जहां एक का उद्देश्य जनता के डाटा को बिना उनके जाने सरकारों को देना है तो दूसरा कानूनी तौर पर आपको कुछ हक देता है, परन्तु यह कानूनी तौर पर व्यक्तिगत डाटा को सरकार के हाथ देने में सक्षम है।

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