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एक माह में 'चार सितारे हुए अस्त' भारतीय सिने जगत को लगा बड़ा आघात

  • Updated on 5/1/2020

इस समय जहां सारा संसार 'कोरोना' रूपी अदृश्य शत्रु के प्रकोप से पीड़ित है वहीं पिछला एक महीना भारतीय सिने जगत के लिए भी अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण रहा जिसने हम से चार ऐसी अभिनय प्रतिभाएं छीन लीं जिनकी कमी हमेशा महसूस की जाएगी। 25 मार्च को 1950-1960 के दशक की प्रसिद्ध अभिनेत्री ‘निम्मी’ (असली नाम नवाब बानो) का 88 वर्ष की उम्र में बीमार रहने के बाद मुम्बई में निधन हो गया।

उन्हें सबसे पहले राज कपूर ने फिल्म ‘बरसात’ में अभिनय का अवसर दिया था जिसके बाद उन्होंने ‘दाग’, ‘दीदार’, ‘अमर’, ‘आन’, ‘उड़न खटोला’, ‘भाई-भाई’, ‘कुंदन’, ‘मेरे महबूब’ आदि प्रसिद्ध फिल्मों में अभिनय करके अपनी पहचान बनाई। 
इनकी शादी प्रसिद्ध फिल्म लेखक अली रजा से हुई थी जिसमें हास्य अभिनेता मुकरी ने बड़ी भूमिका निभाई थी।

26 मार्च को तमिल फिल्मों के प्रसिद्ध अभिनेता डॉक्टर वी. सेतुरमण का मात्र 36 वर्ष की आयु में दिल का दौरा पड़ने से चेन्नई में निधन हो गया जिससे इनके अनेक प्रशंसक सदमे में आ गए। इन्होंने 2013 से शुरू अपनी मात्र 7 वर्षों की अभिनय यात्रा में अत्यधिक लोकप्रियता प्राप्त की थी।

29 अप्रैल को प्रसिद्ध अभिनेता इरफान खान का 53 वर्ष की आयु में कैंसर से निधन हो गया। इन्हें सर्वश्रेष्ठ खलनायक के ‘फिल्मफेयर’ पुरस्कार (2004), पद्मश्री (2011), फिल्म ‘पान सिंह तोमर’ के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के राष्ट्रीय पुरस्कार (2012) तथा  ‘ङ्क्षहदी मीडियम’ फिल्म के लिए ‘फिल्मफेयर’ के सर्वश्रेष्ठ अभिनेता (2017) के पुरस्कारों से नवाजा गया।

30 अप्रैल को भारतीय सिने जगत को एक और सबसे बड़ा आघात लगा जब जिंदादिल स्वभाव और सबके मददगार रोमांटिक अभिनेता और मुम्बई की मायानगरी के अग्रणी कपूर परिवार की तीसरी पीढ़ी के सदस्य ऋषि कपूर उर्फ ङ्क्षचटू (67) की भी कैंसर ने जान ले ली।

ऋषि कपूर के दादा पृथ्वीराज कपूर ने, जो मूलत: पाकिस्तान के पेशावर के रहने वाले थे, 1929 में सिने जगत में प्रवेश किया था। इनकी एक बेटी उर्मी के अलावा तीन बेटों राजकपूर, शम्मी कपूर और शशि कपूर ने अभिनय के क्षेत्र में अपनी विशिष्टï पहचान बनाई।

पृथ्वीराज कपूर को रंगमंच से भी बेहद लगाव था और उन्होंने मुम्बई में ‘पृथ्वी थियेटर’ की स्थापना की थी। इसी के लिए फंड इकट्ठा करने वह 1958 में जालन्धर आए और उन्होंने ‘ज्योति थियेटर’ में एक सप्ताह तक चलने वाले ‘नाट्य समारोह’ में 7 नाटकों का मंचन किया था।

उल्लेखनीय है कि ‘ज्योति थियेटर’ के मालिक भी कपूर ही थे जो स्वर्गीय पृथ्वीराज कपूर के रिश्तेदार थे तथा इसी थिएटर में ‘संगम’ सहित राज कपूर की हिट फिल्में रिलीज हुई थीं। मैं उसी अवसर पर पृथ्वीराज कपूर से मिलनेे पूज्य पिता लाला जगत नारायण जी और बड़े भाई रमेश के साथ गया था। तब मैंने पहली बार ऋषि कपूर को देखा था जो उनके साथ ही आए हुए थे और उस समय उनकी आयु 6 वर्ष थी। उन्होंने जालन्धर में ही रहने वाले अपने पुराने मित्र के बारे में पूछा जो संयोगवश हमारे मोहल्ले की पिछली गली में ही रहते थे और इतने विनम्र थे कि हमारे साथ अपने उस मित्र के घर मिलने भी गए।

ऋषि कपूर को अपने दादा और पिता के अभिनय और संगीत से प्रेम के गुण विरासत में मिले थे। उन्होंने सबसे पहले अपने पिता राजकपूर की फिल्मों ‘श्री 420’ और ‘मेरा नाम जोकर’ में बाल कलाकार की भूमिका निभाई। ‘मेरा नाम जोकर’ के लिए जब उन्हें सर्वश्रेष्ठï बाल कलाकार का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला तो खुशी के मारे दादा पृ्थ्वीराज कपूर की आंखें भर आई थीं।

फिर आई ‘कच्ची उम्र की प्रेम कहानी’ के रूप में प्रचारित फिल्म ‘बॉबी’ ने इन्हें रातों रात स्टार बना दिया और इस फिल्म में अभिनय के लिए उन्हें 1974 में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का ‘फिल्मफेयर’ पुरस्कार मिला। दर्जनों पुरस्कारों से सम्मानित ऋषि कपूर का अपनी सह अभिनेत्री नीतू सिंह (कपूर) के साथ प्रेम फिल्म  ‘खेल-खेल में’ की शूटिंग के दौरान शुरू हुआ जो ‘कभी-कभी’ के दौरान परवान चढ़ा और 1980 में दोनों विवाह बंधन में बंध गए।

लगभग दो वर्ष पहले बीमार होने पर ऋषि कपूर 9 सितम्बर 2018 को इलाज के लिए अमरीका चले गए और 3 अक्तूबर 2018 को उनके कैंसर से पीड़ित होने की पुष्टिï के बाद वह लगातार ग्यारह महीने ग्यारह दिन अमरीका के अस्पताल में उपचाराधीन रहे। जब अमरीका में लंबे इलाज के बाद वह स्वदेश लौटे तब कौन जानता था कि घर वापसी की यह खुशी अधिक समय तक नहीं टिकेगी।

निम्मी, वी. सेतुरमण और  इरफान खान की मृत्यु के आघात से सिने प्रेेमी अभी उबर भी न पाए थे कि ऋषि कपूर की मृत्यु के समाचार ने उनकी पीड़ा को और बढ़ा दिया। सबसे पहले मीडिया को ऋषि कपूर की मृत्यु का समाचार देते हुए अमिताभ बच्चन ने कहा, 'मैं बर्बाद हो गया हूं।'

निम्मी, वी. सेतुरमण, इरफान खान और ऋषि कपूर ये चारों ही अपने आप में अनूठे कलाकार थे जो दुनिया को तो अलविदा कह गए हैं लेकिन सिने प्रेमियों की दिलों में हमेशा बसे रहेंगे।

—विजय कुमार

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