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story of atal bihari vajpayee aljwnt

वाजपेयी जी से जुड़ी एक याद- जब बटाला की 18 दिनों की नाकेबंदी अटल जी के पहुंचने पर समाप्त हो गई

  • Updated on 12/24/2020

श्री अटल बिहारी वाजपेयी (Atal Bihari Vajpayee के जन्मदिन पर मेरे मन में उनसे जुड़ी कुछ पुरानी यादें ताजा हो गई हैं जिनमें से एक याद मैं पाठकों के साथ सांझा कर रहा हूं। उल्लेखनीय है कि तीन बार भारत के प्रधानमंत्री रहे श्री वाजपेयी जी के साथ हमारे आत्मीय सम्बन्ध थे। उन्होंने 2004 में अस्वस्थता के कारण राजनीति से संन्यास ले लिया और लम्बी बीमारी के बाद 16 अगस्त 2018 को वह हमारे बीच नहीं रहे। श्री वाजपेयी एक कुशल राजनीतिज्ञ, कवि तथा श्रेष्ठ वक्ता भी थेे जिन्हें सुनने के लिए मेरे जैसे लोग हमेशा लालायित रहते। उनमें लोगों को अपने साथ जोडऩे की अद्भुत क्षमता थी। 

‘पंजाब केसरी’ द्वारा संचालित विभिन्न सहायता समारोहों में भाग लेने के लिए अटल जी चार बार जालन्धर आए। वह ‘शहीद परिवार फंड’ की ओर से पीड़ित परिवारों को राहत वितरण के लिए 3 फरवरी 1985 तथा 23 नवम्बर 1997 को, फिर 12 मई 1999 तथा 6 फरवरी 2000 को ‘प्रधानमंत्री राहत कोष’ के लिए ‘पंजाब केसरी’ द्वारा जनसहयोग से एकत्रित 10.50 करोड़ रुपए की धनराशि प्राप्त करने के लिए जालंधर पधारे। 80 का दशक पंजाब के लिए डरावना और भयानक था। लोग शाम के पांच बजे ही घरों में बंद हो जाते। व्यापार ठप्प हो गया था। कोई दिन ऐसा नहीं जाता था जिस दिन यहां कोई वारदात न हो। लोगों को बसों से उतार कर गोलियों से भूना जा रहा था। जगह-जगह मासूम नागरिकों की जान ली जा रही थी।

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यह उन्हीं दिनों की बात है जब 6 मार्च 1986 को आतंकियों ने पंजाब के औद्योगिक शहर बटाला के सभी 16 प्रवेश मार्गों की नाकेबंदी करके शहर को बंधक बना कर लोगों का अंदर-बाहर आना-जाना भी बंद कर दिया। 18 दिन वहां कफ्र्यू लगा रहा। शहर में आवश्यक खाद्य वस्तुओं का अभाव हो गया। भूख से व्याकुल बच्चे दूध के लिए तरसने लगे। न मरीजों को दवाई मिल रही थी, न सब्जी, न राशन और न ही मवेशियों के लिए चारा तथा अन्य सामान। नाकाबंदी के दौरान आतंकवादियों ने भारी लूटमार भी की। 

बताया जाता है कि इस दौरान वहां अन्य वस्तुओं के साथ ही 14 कारखानों और 34 दुकानों को लूटने के अलावा 20 बंदूकें भी लूटी गईं और 18 लाख रुपए से अधिक की सम्पत्ति नष्ट की गर्ई। नाकाबंदी खुलवाने के लिए बनाई गई ‘शांति समिति’ में भी यह मामला बार-बार उठा परंतु इसमें शामिल बटाला क्षेत्र के तीन मंत्री और अन्य नेता भी यह नाकाबंदी समाप्त नहीं करवा सके। लोगों में हाहाकार मचा हुआ था। केंद्र में उस समय श्री राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस की सरकार थी जबकि पंजाब में सुरजीत सिंह बरनाला मुख्यमंत्री थे। पूरा प्रशासन जब बटाला के लोगों को मुक्ति दिलाने में असफल हो गया तभी अचानक मुझे बटाला से किसी सज्जन का फोन आया कि ‘‘यदि आज लाला जी जीवित होते तो वह इस पर लिखते और हमारी यह हालत न होती।’’ इस पर मैंने उन्हें बताया कि मैं इस विषय पर लिख तो रहा हूं परंतु बदकिस्मती से अखबार बटाला नहीं जा रहे। 

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फोन करने वाले ने कहा कि अब इस बारे में किससे कहा जाए तो मैंने दिल्ली में कांग्रेस वर्किंग कमेटी के सदस्य स. दरबारा सिंह को फोन किया। उन्होंने मुझसे कहा कि वह बात करके मुझे अगले दिन बताएंगे। उनकी बात सुन कर मुझे लगा कि बात बन जाएगी परंतु जब उनकी ओर से कोई संतोषजनक उत्तर न मिला तभी मुझे भाजपा के वरिष्ठï नेता श्री कृष्ण लाल शर्मा की याद आई जो जब भी जालंधर आते तो मुझसे अवश्य मिलने आया करते थे। हालांकि तब तक मेरा अटल जी के साथ सम्पर्क नहीं हुआ था परन्तु मैंने कृष्ण लाल जी को फोन किया कि यदि अटल जी बटाला आ जाएं तो यह ‘नाकेबंदी’ खुल सकती है। अटल जी उस समय भाजपा के अध्यक्ष थे। 

श्री कृष्ण लाल के कहने पर कि यह काम तो कठिन है, मैंने उनसे अनुरोध किया कि वह कोशिश तो करें। मैंने इसी सम्बन्ध में भाजपा नेता डा. बलदेव प्रकाश जी से भी बात की तो वह भी मेरी बात से पूरी तरह सहमत हुए। इसके बाद श्री वाजपेयी को फोन द्वारा सारे घटनाक्रम और हालात की गम्भीरता के बारे में बताया गया तो एक दिन श्री कृष्ण लाल शर्मा का फोन आ गया कि श्री वाजपेयी जी आने के लिए राजी हो गए हैं। अटल जी के बटाला आने के समाचार से पंजाब के राज्यपाल और सरकार पर बहुत दबाव पड़ा। पंजाब सरकार तुरंत हरकत में आई और श्री वाजपेयी तथा उनके साथ दिल्ली से आने वाले भाजपा नेता श्री केदारनाथ साहनी एवं पंजाब के कुछ भाजपा नेताओं को भारी सुरक्षा प्रबन्धों में बटाला पहुंचाने की व्यवस्था की गई। 

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अमृतसर से बटाला जाने के दो रास्ते हैं। पहला अमृतसर से सीधा बटाला जाता है और दूसरा भिंडरांवाला के गढ़ मेहता चौक से बटाला जाता है। यह कहने के बावजूद कि अमृतसर से सीधे बटाला जाना ही सुरक्षित है, अटल जी ने कहा,‘‘चाहे जो भी हो, मैं तो उस रास्ते से ही जाऊंगा जहां आतंकवादी अपना डेरा लगाए हुए हैं।’’जान हथेली पर रख कर अटल जी मेहता चौक के रास्ते ही 25 मार्च,1986 को बटाला पहुंचे और लोगों का मनोबल बढ़ाने के लिए किला मंडी बटाला के प्रांगण में एक विशाल रैली को सम्बोधित किया जिसे सुनने हजारों लोग वहां पहुंचे। इसके साथ ही उन्होंने सभी पक्षों के साथ बैठकें करके नाकेबंदी समाप्त करवा दी जिससे बटाला वासियों ने राहत की सांस ली। वैसे तो इस घटना से बहुतों को खुशी हुई होगी परंतु सबसे अधिक खुशी मुझे हुई कि किस तरह अटल जी ने एक साधारण व्यक्ति का अनुरोध स्वीकार करके बटाला पहुंच कर यह समस्या सुलझाई और बटाला वासी 18 दिनों की कैद से मुक्त हुए। 

आज मैंने पाठकों के साथ अपनी जिंदगी की यह अनमोल याद इसलिए सांझी की है ताकि मैं बता सकूं कि अटल जी के दिल में देशवासियों के लिए कितना दर्द था जिसे दूर करने के लिए वह किसी भी खतरे का सामना करने को सदा तत्पर और तैयार रहते थे। काश यदि हमारे देश के नेता उनके त्यागमय जीवन और उच्च आदर्शों से प्रेरणा लें तो आज देश को दरपेश समस्याओं से मुक्ति मिल सकती है।

-विजय कुमार

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