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ताइवान पर युद्ध के बादल मंडरा रहे हैं

  • Updated on 5/11/2020

ताइवान दुनिया का एकमात्र विकसित देश है, जहां सभी स्कूल खुले हैं, और जहां पेशेवर बेसबॉल, बास्केटबॉल और फुटबॉल खेला जा रहा है, हालांकि बंद दरवाजों के पीछे। नए कोरोनो वायरस के प्रकोप से लड़ कर जीतने वाले इस द्वीप देश की प्रशासकीय कुशलता का यह उदाहरण है। लेकिन अपने देश में गेंद खेलने के अलावा ताइवान कोरोनो वायरस के उन्मूलन की दिशा में किए जाने वाले विश्व समुदाय के प्रयासों में भी अपनी भूमिका निभा रहा है, जैसे कि लाखों फेस मास्क दान करना और अनुसंधान में अपना सहयोग देना।

इवान सरकार ने न केवल अमरीका, यूरोपीय संघ, एशियाई पड़ोसियों और अपने सहयोगियों को नि:शुल्क फेस मास्क दिए हैं बल्कि यह ऐसे समय में किया जब कहीं और से ये उपलब्ध नहीं थे। ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि ताइवान विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू.एच.ओ.) की मदद के बिना यह सब कर रहा था।

 ताइवान अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में एक साधारण देश नहीं माना जाता, ऐसे में संयुक्त राष्ट्र और डब्ल्यू.एच.ओ. जैसे बहुपक्षीय संगठनों से इसे बाहर रखा गया है। चीन का कहना है कि ताइवान बीजिंग का अधिराज्य है।

वास्तव में ताइवान एक स्वतंत्र देश है जिसका आधिकारिक नाम चीन गणराज्य है। यह औपचारिक पदनाम तब से शुरू हुआ जब 1911 के बाद कुओमिनतांग (के.एम.टी.) ने 20 वीं शताब्दी में चीन पर शासन किया था। कम्युनिस्टों से चीनी गृह युद्ध हारने के बाद के.एम.टी. ताइवान भाग गए और 1949 में चीन गणराज्य फिर से स्थापित किया।

के.एम.टी. के तहत सत्ताधारी देश ताइवान ने 1990 के दशक में बहुपक्षीय चुनावों को अपनाया और आज समृद्ध हो रहे लोकतंत्र में इसका विकास हुआ है। इसके बावजूद सोचने की बात यह  है कि ऐसा क्यों है कि इसकी स्वतंत्र हस्ती पर सवाल अब भी उठाया जा रहा है?

वास्तव में जबकि दुनिया कोरोना वायरस से ग्रस्त है, न केवल ताईवान बल्कि हांगकांग की स्वतंत्रता भी चीन के निशाने पर है। समय-समय पर ताइवान ने यू.एन. का सदस्य बनने की कोशिश की। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसे इसने डब्ल्यू.एच.ओ. के साथ भी दोहराया है। ताइवान के कुछ सहयोगियों के साथ-साथ अमरीका, यूरोपीय संघ और ऑस्ट्रेलिया से अपील के बावजूद यह प्रक्रिया हमेशा विफल रहती है तथा कुछ बहुराष्ट्रीय संगठनों ने इसे यह अनुमति दी है कि ताइवान एशिया-प्रशांत आॢथक सहयोग मंच और ओङ्क्षलम्पिक में ‘चीनी ताइपे’ जैसे कृत्रिम नामों के अंतर्गत भाग ले सकता है।

सच्चाई यह है कि संयुक्त राज्य अमेरिका के अलावा बहुत कम देश ताइवान को खुले तौर पर समर्थन करने के लिए चीन का विरोध करने की हिम्मत करेंगे। कई देश, विशेषकर विकासशील दुनिया के लोग, चीन के साथ व्यापार के नुक्सान का जोखिम नहीं उठाएंगे, जो अक्सर उनका सबसे बड़ा आॢथक साझेदार है। इसी कारण ताइवान पर लगभग हर देश की आधिकारिक नीति मूल रूप से चीन द्वारा ही निर्धारित की जाती है।

ताइवान पर आक्रमण के उद्देश्य से चीन ने नौसैनिक जहाज निर्माण, विशेष रूप से बड़े संकट से निपटने वाले जहाजों और उभयचर हमला करने वाले जहाजों को रैंप पर उतारा है जो बाद में ताइवान के किसी भी आक्रमण का सामना करने के लिए के लिए आवश्यक होंगे।

फरवरी में, चीन के सरकारी मीडिया ने घोषणा की कि ‘ताइवान के अलगाववादियों’ और अमरीकी सेनाओं के खिलाफ लडऩे के लिए चीन सैनिकों के लिए 14 लाख ‘बॉडी आर्मर’ खरीद रहा है।

ताइवान के प्रति चीन का आक्रामक व्यवहार वर्षों से कायम है, और अब इसने इसे तीव्र करने के लिए उसने कोरोना महामारी का लाभ भी उठाया है। चीन की आक्रामकता केवल ताइवान के ही नहीं बल्कि अन्य देशों जैसे जापान, वियतनाम और फिलीपींस भी उसके निशाने पर हैं, जैसा कि दक्षिण चीन सागर में 1 मई से इसने सभी आसपास के देशों के मछली पकडऩे पर प्रतिबंध लगा दिया है।

परन्तु आजकल विश्व भर में चीन को कोरोनो वायरस महामारी के लिए  जिम्मेदार माना जा रहा है और उस के विरुद्ध गुस्सा बढ़ता जा रहा है! अंतर्राष्ट्रीय समुदाय चीन को एक जिम्मेदार विश्व शक्ति के बजाय एक अनिश्चित और अविश्वसनीय तानाशाह की तरह देख रहा है, जिस ने एक वैश्विक संकट के समय में भी अपनी आक्रामक नीति नहीं छोड़ी है!

ऐसी परिस्थिति में, जबकि अब भी, यूरोप चीन के विरुद्ध नहीं जाएगा,  ताइवान को चीन से बचाने के लिए सबका ध्यान अमरीका पर केंद्रित है, लेकिन  ऐसे में जापान, भारत और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों को भी साथ लाना महत्वपूर्ण होगा।

-विजय कुमार

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