Thursday, Sep 23, 2021
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भीष्म पितामह के संबंध में तेजस्वी यादव की काबिले ऐतराज टिप्पणी

  • Updated on 11/25/2020

चर्चा पाने के लिए हमारे नेतागण बिना सोचे-विचारे अपने मुंह से कुछ भी बोल देने में जरा भी संकोच नहीं करते जिससे कई बार भारी विवाद खड़े हो जाते हैं। 

ऐसी ही काबिले ऐतराज बयानबाजी का उदाहरण 23 नवम्बर को ‘राजद’ नेता तेजस्वी यादव (Tejaswi Yadav) ने बिहार विधानसभा में विधायक की शपथ लेते समय पेश किया जब उन्होंने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की तुलना ‘महाभारत’ के सबसे महान पात्रों में से एक ‘भीष्म पितामह’ से करते हुए कहा : 

‘‘नीतीश कुमार भ्रष्टाचार के भीष्म पितामह हैं क्योंकि जितने भी गुनाहगार और भ्रष्टाचारी हैं उन्हें संरक्षण देना और बचाव करना उनकी फितरत रही है। सरकार में आने के बाद नीतीश ने फिर वही काम किए।’’

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तेजस्वी यादव का उक्त बयान तथ्यों के सर्वथा विपरीत है। सभी जानते हैं कि भीष्म पितामह का सम्पूर्ण जीवन धर्ममय था। उन्होंने कौरवों के पिता धृतïराष्टï्र के पुत्र मोह का सदैव विरोध किया और धृतराष्ट्र को सदैव न्याय के पथ पर चलने के लिए प्रेरित करते रहे। भ्रष्टïाचार के सर्वथा विरोधी भीष्म पितामह राजधर्म एवं राजनीति के महान विशेषज्ञ थे। 

भीष्म पितामह ने अपने पिता शांतनु का सत्यवती के साथ विवाह करवाने के लिए आजीवन ब्रह्मïचर्य का पालन करने की प्रतिज्ञा की थी। उनकी ऐसी पितृ भक्ति देख कर उनके पिता ने उन्हें ‘इच्छामृत्यु’ का वरदान दिया था। 

आजीवन अविवाहित और ब्रह्मïचारी रहने की इस भीष्म प्रतिज्ञा के कारण ही वह ‘भीष्म’ बने और बाद में सबके आदरणीय और प्रिय ‘भीष्म पितामह’ कहलाए। अपनी इसी प्रतिज्ञा और त्याग के लिए उन्हें सर्वाधिक जाना जाता है जबकि उनका पहला नाम ‘देवव्रत’ था। 

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इसी प्रतिज्ञा का पालन करने के लिए भीष्म पितामह ने हस्तिनापुर का राजा बनने का वास्तविक अधिकारी होने के बावजूद हस्तिनापुर के सिंहासन के संरक्षक की भूमिका निभाई और हस्तिनापुर के राजसिंहासन पर बैठने से इन्कार कर दिया। अपनी इसी प्रतिज्ञा का पालन करने की खातिर उन्होंने ‘महाभारत’ के युद्ध में कौरवों की ओर से भाग लिया था। 

हर तरह की शस्त्र विद्या के ज्ञाता और ब्रह्मïचारी भीष्म पितामह को युद्ध में पराजित कर पाना संभव नहीं था। ‘महाभारत’ के युद्ध में इन्होंने अर्जुन को अपनी बाण वर्षा से विचलित कर दिया था। 

18 दिनों तक चले ‘महाभारत’ के युद्ध में 10 दिनों तक अकेले घमासान युद्ध करके भीष्म पितामह ने पांडव पक्षï को व्याकुल कर दिया था। जब पांडवों से भीष्म पितामह पराजित नहीं हुए तो उन्होंने भीष्म पितामह से ही पूछा था कि आपका किस प्रकार अंत होगा?

भीष्म पितामह ने स्वयं ‘शिखंडी’ के माध्यम से अपनी मृत्यु का उपाय बताया कि ‘‘यदि कोई नारी मेरे सामने आए तो मैं उस पर अस्त्र-शस्त्र नहीं उठा सकता।’’ 

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इस पर भगवान श्री कृष्ण ने अपनी रणनीति के अंतर्गत शिखंडी को अर्जुन का सारथी बनाया जो पूर्व जन्म में नारी था और युद्ध में शिखंडी को आगे करके अर्जुन ने भीष्म पितामह का शरीर बाणों से बींध कर उन्हें घायल कर दिया। 

इसके बाद ‘महाभारत’ के इस अद्भुत योद्धा ने शर-शैया पर शयन किया और इच्छा मृत्यु के परिणामस्वरूप अपनी इच्छा के अनुसार सूर्य के उत्तरायण होने पर श्री कृष्ण को अपनी आंखों में बसाकर अपनी देह का त्याग किया था। 

इस महान आत्मा के बारे में तेजस्वी यादव द्वारा आपत्तिजनक टिप्पणी करना और उन्हें भ्रष्टाचार तथा नीतीश कुमार के साथ जोडऩा घोर आपत्तिजनक है जो निश्चय ही तेजस्वी यादव की अज्ञानता का परिचायक है। 

वैसे भी कम पढ़े-लिखे तेजस्वी यादव से इससे अधिक और उम्मीद की भी क्या जा सकती थी अत: तेजस्वी यादव के इस बयान की जितनी भी ङ्क्षनदा की जाए कम ही होगी।

इस तरह की तथ्यहीन बातें कहने वालों को ऐसी कड़ी सजा देनी चाहिए कि वे अपना ज्ञान बघारने के चक्कर में हमारी महान धार्मिक विभूतियों के बारे में भ्रामक और आपत्तिजनक बातें कहकर हमारे धर्म का स्वरूप बिगाडऩे और उनकी छवि धूमिल करने का दुस्साहस कदापि न कर पाएं।

—विजय कुमार

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