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कोरोना वायरस का प्रकोप जल्दी पीछा छोड़ने वाला नहीं 

  • Updated on 5/4/2020

भारत 4 मई को अपने तीसरे लॉकडाऊन में प्रवेश करने जा रहा है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार 3 मई तक भारत में कोरोना वायरस के 130 रैड जोन, 294 ऑरेंज, 319 ग्रीन जोन बन चुके हैं। हालांकि, अधिकतर क्षेत्र ग्रीन जोन में हैं परन्तु 17 प्रतिशत जिलों में 33 प्रतिशत भारतीय जनसंख्या अब भी रैड जोन में है। ऐसे में कोरोना वायरस की समस्या अभी समाप्ति से कोसों दूर है। अभी भी डॉक्टरों और चिकित्सा कर्मचारियों की अत्यधिक आवश्यकता है परन्तु देश में अभी भी, अनेक जगहों पर, न केवल उनके प्रति असंवेदनशील बल्कि हिंसक रवैया अपनाया जा रहा है (बल्कि अब वे भी इस महामारी का शिकार हो रहे हैं)। ऐसा किसी ईसाई या मुस्लिम देश में नहीं हुआ, चाहे वे देश विकसित हों या विकासशील।
कहने को धन्यवाद के तौर पर तो शुरू में तालियों, मोमबत्तियों और अब सेना के सभी अंगों की ओर से भव्य शो के आयोजन किए गए और ऐसा लगा कि जैसे शायद हम सुधर गए हों परन्तु ऐसा नहीं है।

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे अनेक वीडियो और समाचार आ रहे हैं जिनसे पता चलता है कि अपने अनेक कोरोना योद्धाओं के साथ कुछ लोग कितना क्रूर व्यवहार कर रहे हैं। ऐसे ही एक वीडियो में मुम्बई के एक अस्पताल में कार्यरत एक कोरोना संक्रमित होने के बाद ठीक होने वाली नर्स सुरेखा जाधव ने बताया कि किस प्रकार उसके मायके वालों को पड़ोसियों की घृणा का शिकार होना पड़ा, जिनके पास उसने ड्यूटी के चलते अपनी तीन वर्षीय बेटी को छोड़ रखा था और यहां तक कि उन्हें राशन की दुकान वाले ने राशन तक नहीं दिया और उसके भाई को मारने चले गए। शायद अब हमें मिस्र का उदाहरण देने की आवश्यकता है जहां सरकार द्वारा स्वास्थ्य क्षेत्र की बहुत लंबे समय तक उपेक्षा किए जाने के परिणामस्वरूप इस महामारी के चलते सरकार का तख्ता पलट सकता है।

16 मार्च को मिस्र में कोरोना वायरस के 126 मामलों की पुष्टि हुई थी। मध्य अप्रैल तक यह आंकड़ा 2,700 तक पहुंच गया और एक सप्ताह के बाद, वहां इसके मामलों में एक-तिहाई से अधिक की वृद्धि हो गई जबकि यह प्रकोप वहां अभी शुरू हो रहा है। पहले से ही संघर्ष कर रही मिस्र की कमजोर स्वास्थ्य प्रणाली कुछ ही दिनों मैं चरमरा-सी गई है।

28 अप्रैल तक वहां कोरोना वायरस के लगभग 5,000 मामलों और 359 लोगों की मृत्यु की पुष्टि की गई है। हालांकि वहां पूरे परीक्षण न हो पाने के कारण मृत्यु के वास्तविक आंकड़े तो अवश्य इससे अधिक ही होंगे। पूरे देश में डॉक्टरों, नर्सों, दवाओं और अस्पतालों में बिस्तरों की कमी है। कम वेतन और खराब कामकाजी परिस्थितियों ने कई चिकित्सकों को देश छोडऩे के लिए मजबूर कर दिया है। पिछले तीन वर्षों में लगभग 10,000 डॉक्टर मिस्र छोड़ कर जा चुके हैं।

वहां के मैडिकल सिंडिकेट के एक अनुमान के अनुसार लगभग 220,000 पंजीकृत डॉक्टरों में से अनुमानत: 120,000 मिस्र के बाहर काम करते हैं। सार्वजनिक अस्पतालों को लगभग 55,000 से 60,000 नर्सों की जरूरत है। मिस्र में प्रति 1,000 लोगों पर 1.3 अस्पताल बैड है। इसके विपरीत जापान में 13, जर्मनी में 8 और फ्रांस में 6 लोगों पर एक बैड होने के बावजूद इन देशों में वायरस ने भयानक रूप धारण किया  है तो फिर भला मिस्र की क्या औकात है।

अरब बैरोमीटर के अनुसार, अप्रत्याशित रूप से, केवल 2018-2019 में 31 प्रतिशत मिस्र वासियों ने ही कहा था कि वे अपनी सरकार की स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं से संतुष्ट हैं। वर्ष 2020 में तो यह संख्या और भी घट गई है तथा आजकल अधिकांश लोग देश की स्वास्थ्य सेवाओं से असंतुष्ट हैं।

मिस्र के 13 प्रतिशत कोरोनो वायरस मामले अब डॉक्टरो नर्सो और मैडिक्स के हैं। खुल कर बोलने के खतरे के बावजूद, कई डॉक्टरों ने काम की परिस्थितियों, कुप्रबंधन और अनिवार्य दवाओं आदि की आपूॢत में कमी के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए सोशल मीडिया का सहारा लिया है और उनका कहना है कि वे अपने जीवन को खतरे में डाल कर अस्पतालों  में काम कर रहे हैं। ऐसे में स्वास्थ्य कर्मचारियों के वीडियो आम हो गए हैं। अत: वहां यदि संकट बढ़ता है, तो उनकी आवाजों को दबाने का प्रयास विफल रहेगा।

यह हालत तो तब है जब अफ्रीका के अन्य देशों की तुलना में मिस्र को आॢथक रूप से मजबूत माना जाता है। इम्पीरियल कॉलेज, लंदन  का हवाला देते हुए शुक्रवार को जारी एक नई रिपोर्ट के अनुसार, अफ्रीका में कोरोना वायरस से 300,000 लोगों की मौत हो सकती है।

वायरस के विरुद्ध हस्तक्षेप के बिना पैदा होना वाली सबसे खराब स्थिति के अंतर्गत अफ्रीका में 3.3 मिलियन मौतों और 1.2 बिलियन संक्रमणों की आशंका 'अफ्रीका आॢथक आयोग' ने व्यक्त की है। अफ्रीका में प्रत्येक 5,000 लोगों के लिए एक डॉक्टर है तथा डब्ल्यू.एच.ओ. के अनुसार वहां 1.8 मिलियन स्वास्थ्य कर्मचारियों की कमी है।

हाल ही में, संयुक्त रूप से सौदेबाजी करके अफ्रीकी देशों ने 400 वैंटिलेटर 54 देशों के लिए खरीदे है जबकि उन्हें सुरक्षात्मक  पी.पी.ई. (सुरक्षा कवच), परीक्षण किट आदि खरीदने के लिए 44 मिलियन डालर की जरूरत है। दशकों से, यहां के तानाशाह अपनी सेनाओं पर अधिक और स्वास्थ्य सिस्टम पर कम पैसा लगाते रहे हैं। इसके विपरीत भारत में अच्छे डॉक्टर हर शहर में इस बीमारी से जूझ रहे हैं!  तो क्या हम उदार और सम्मानजनक व्यवहार अपने डॉक्टरों के प्रति नहीं अपना सकते।

—विजय कुमार

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