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मैं, मेरा मकान, मेरा मुंडा, मेरी मारुति, इस दुर्दशा के लिए स्वयं जिम्मेदार

  • Updated on 10/15/2020

कोरोना महामारी (Coronavirus) के दौरान आवागमन सीमित होने से पूर्व मैं प्राय: प्रत्येक रविवार को विभिन्न समाजसेवी संस्थाओं के निमंत्रण पर उनके द्वारा जनसेवा के मकसद से आयोजित समारोहों में भाग लेने जाता रहा हूं।

इस दौरान मेरी अनेक महानुभावों से देश की वर्तमान दयनीय स्थिति को लेकर चर्चा भी होती रही है जिसके दौरान मैं सब पहलुओं का अध्ययन करके इसी निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि वास्तव में अपनी इस दुर्दशा के लिए हमारी स्वार्थलोलुपता और हम स्वयं ही जिम्मेदार हैं। पहले हम मुगलों के गुलाम रहे और उसके बाद 200 वर्षों तक अंग्रेजों ने हम पर शासन तथा हमारा शोषण किया और हमने दोनों के साथ ही अपने निजी स्वार्थों व उपाधियों के लिए मिल कर अपने राष्ट्रीय हितों को ठेस पहुंचाई। 

यही नहीं देश की आजादी के समय भी हम 600 से अधिक रियासतों में बंटे हुए थे। तत्कालीन उप-प्रधानमंत्री और गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल (Sardar Vallabhbhai Patel) ने इन रियासतों के भारत के साथ विलय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई परंतु हैदराबाद रियासत के निजाम की तरह ही कुछ अन्य रियासतों के राजा भी भारत में विलय न करने की जिद पर अड़े हुए थे और दो देशों भारत और पाकिस्तान के बीच अपनी स्वतंत्र हस्ती कायम रखना चाहते थे।

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इस प्रकार के हालात में सरदार वल्लभ भाई पटेल की कूटनीति और प्रयासों से सारी रियासतें तो भारत में मिल गईं परंतु कश्मीर रियासत के महाराजा हरि सिंह जी भारत में विलय स्वीकार करने को तैयार नहीं हुए और अपनी स्वतंत्र प्रभुसत्ता पर डटे थे। 

उल्लेखनीय है कि 1940 का दशक समाप्त होने से कुछ पहले जब यह साफ हो गया था कि अंग्रेज अब भारत छोड़ने ही वाले हैं तब महाराजा हरि सिंह के प्रधानमंत्री रामचंद्र काक ने उन्हें कश्मीर की आजादी के बारे में विचार करने को कहा था। कांग्रेस से घृणा के चलते महाराजा हरि सिंह जी भारत में विलय नहीं चाहते थे और पाकिस्तान में विलय का अर्थ था उनके ‘हिंदू राजवंश’ पर पूर्ण विराम लग जाना। अत: वह कश्मीर को स्वतंत्र देश ही बनाए रखना चाहते थे। कहा जाता है कि 15 अगस्त से पहले-पहले लार्ड माऊंटबेटन ही नहीं बल्कि स्वयं महात्मा गांधी ने भी कश्मीर जाकर महाराजा हरि सिंह को भारत में विलय के लिए राजी होने को कहा लेकिन ये सभी प्रयत्न विफल रहे। 

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अंतत: भारत के स्वतंत्र होने के बाद महाराजा हरि सिंह ने कश्मीर के भारत में विलय का निर्णय बहुत देर से लिया जब 20 अक्तूबर, 1947 को कबायलियों के वेश में जम्मू-कश्मीर भेजे हुए पाकिस्तानी सैनिकों ने लूटपाट और मारकाट शुरू कर दी। तब महाराजा हरि सिंह जी अपने समस्त परिवार सहित श्रीनगर से जम्मू आ गए और 26 अक्तूबर, 1947 को उन्होंने उसी प्रकार विलय समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए जिस प्रकार अन्य रियासतों ने किए थे। इसीलिए मैं कहता हूं कि अपनी इस प्रकार की समस्याओं के लिए कोई बाहर से आए हुए लोग नहीं बल्कि हम स्वयं ही जिम्मेदार हैं और एक प्रकार से आज भी हालात के गुलाम हैं। जो कुछ भी हमारे साथ हुआ है उसके लिए गैर लोग नहीं बल्कि हमारी अपनी ही कमियां जिम्मेदार हैं जो कश्मीर के उक्त उदाहरण से स्पष्ट है। 

देश और समाज का हित भूल कर प्रत्येक व्यक्ति में ‘मैं’ की भावना हद से ज्यादा बढ़ चुकी है और हर व्यक्ति यही चाहता है कि मैं, मेरा मुंडा, मेरा मकान-जायदाद और मारुति हो, मतलब मेरे लिए मौजें-मौजें, सैर-सपाटे और मनोरंजन का सारा सामान हो, देश और समाज जाएं भाड़ में। सदियों से चली आ रही यह स्वार्थपूर्ण और संकीर्ण विचारधारा अभी तक कायम है और हमारे लोगों में लोकतांत्रिक संस्थाओं तथा लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति उपेक्षा का भाव लगातार बढ़ रहा है जो देश में नित्य प्रति हो रही असुखद घटनाओं से स्पष्ट है। 

लोगों की मानसिकता कुछ इस प्रकार की बन गई है कि धनाढ्य वर्ग के लोग तो मतदान करने ही नहीं जाते और राजनीतिक नेताओं तथा विभिन्न राजनीतिक दलों का हाल यह है कि उन्हें तो सत्ता लिप्सा की खातिर आपसी उठा-पटक और जोड़-तोड़ से ही फुर्सत नहीं है। ऐसे में भला देशहित की बात कौन सोचता है? निश्चय ही यह एक दुखद स्थिति है और जब तक हम सब एक देश के रूप में संगठित होकर निजी स्वार्थों का त्याग करके राष्ट्रहित के प्रश्र पर एक नहीं होंगे तब तक देश के हालात में सुधार आना कठिन ही प्रतीत होता है।

—विजय कुमार

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