Sunday, Oct 17, 2021
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why the afghan army could not stand in front of the taliban musrnt

तालिबान के सामने क्यों नहीं टिक सकी अफगान सेना

  • Updated on 8/16/2021

20 साल लम्बा युद्ध और राष्ट्र निर्माण पर 2 ट्रिलियन डॉलर खर्च करने के बावजूद अफगानिस्तान एक बार फिर बर्बादी की कगार पर पहुंच चुका है। तालिबान कुछ ही दिनों में मार-काट मचाते हुए सारे इलाकों पर कब्जा कर चुका है। कहा जा रहा है कि कुछ प्रांतीय राजधानियों को तो अफगान सेना ने लड़ाई किए बिना ही तालिबान को सौंप दिया। 

इसी बीच रविवार को तालिबान राजधानी काबुल में दाखिल हो गए और अफगान राष्ट्रपति अशरफ गनी भी अपने पद से इस्तीफा देकर देश छोड़ ताजिकिस्तान चले गए हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार कार्यवाहक अफगान आंतरिक एवं विदेश मंत्री अली अहमद जलाली नई अंतरिम सरकार के प्रमुख होंगे।  

आखिर क्या कारण है कि अमरीका तथा सहयोगी सेनाओं के वहां से विदा होते ही अफगानिस्तान की सरकार और सेना ने तालिबान के सामने घुटने टेक दिए? इसकी एक वजह तो यह है कि युद्ध दिमाग से नहीं हिम्मत से लड़े जाते हैं।
वर्तमान और पूर्व अमरीकी एवं अफगान अधिकारियों तथा विशेषज्ञों की मानें तो इसके प्रमुख कारणों में भ्रष्टाचार तथा अमरीकी सेना के साथ सैन्य कांट्रैक्टरों का भी प्रस्थान कर जाना शामिल है।

एक शीर्ष अमरीकी कानूनविद् स्टीफन लिंच के अनुसार अफगान सरकार में भ्रष्टाचार ‘तालिबान जितना ही बड़ा खतरा’ है और हमें युद्ध के मैदान में यह साफ नजर आ रहा है। 

गत सप्ताह काबुल से एफ.पी. की एक रिपोर्ट के अनुसार अफगानिस्तान में सुरक्षा बलों के तेजी से पतन के लिए व्यापक अक्षमता, नेतृत्व की कमी और स्वार्थ जिम्मेदार हैं। कई अफगान पुलिस वालों को महीनों से वेतन नहीं मिला है जबकि सैनिकों तक पहुंचने से पहले ही अत्यंत आवश्यक गोला-बारूद और भोजन चुरा लिया जाता है।

वहां की सेना के तालिबानों के आगे हथियार डालने का एक कारण यह भी है कि तालिबान भी अफगानिस्तान के स्थानीय निवासी तथा मुसलमान होने के कारण अफगान सेना उनके विरुद्ध पूरी शक्ति से हमलावर नहीं हुई। 

सबसे बड़ा कारण यह है कि अमरीकी सेनाओं द्वारा अफगानिस्तान में 20 वर्ष तक रहने के बावजूद उन्होंने कभी भी अफगानिस्तान की सेना को नियमित सेना नहीं बनाया बल्कि उसके साथ अद्र्धसैनिक बलों जैसा ही व्यवहार करती रही, उन्हें अद्र्धसैनिक बलों की तरह ही प्रशिक्षण दिया और नियमित सेना का हिस्सा नहीं बनाया। अफगानिस्तान की सेनाओं को कभी पूरा गोला-बारूद भी उपलब्ध नहीं हो सका।

अफगान वायुसेना और स्पैशल फोर्सेज ही तालिबान के विरुद्ध मोर्चा सम्भाल रही थीं लेकिन वायुसेना कमजोर है। पिछले महीने के अंत में कई अफगान सांसदों ने अफगान वायुसेना के लिए अधिक समर्थन की विनती करते हुए कहा कि 160 विमानों के बेड़े का एक-तिहाई हिस्सा पैट्रोल तथा अन्य साजो-सामान तक उपलब्ध नहीं होने के कारण निष्क्रिय है जिसकी एक वजह अमरीकी सेना के कांट्रैक्टरों का प्रस्थान है। 

यू.एस. और नाटो सैनिकों की वापसी के साथ गठबंधन और अफगान बलों का समर्थन करने वाले हजारों कांट्रैक्टर भी चले गए। उनका जाना सुॢखयों में नहीं आया लेकिन अधिकारियों का कहना है कि वे अफगान सेना की रीढ़ थे। उनके बिना सैन्य कामकाज के लिए जरूरी सभी प्रणालियां अस्त-व्यस्त हो चुकी हैं।

तालिबान को बल प्रयोग और मानवाधिकारों के हनन के लिए दंडित करने के लिए अमरीका और उसके सहयोगी देश अंतर्राष्ट्रीय यात्रा में छूट को रद्द करना, अफगानिस्तान को अमरीकी सहायता में कटौती और प्रतिबंध लगा सकते हैं लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार सबसे भारी प्रतिबंध भी तालिबान को अपने हमले रोकने के लिए राजी नहीं कर पाएंगे, खासकर जब हालात उनके पक्ष में हों। बाइडेन की यह सबसे बड़ी गलती साबित हो सकती है।

जहां हर क्षेत्र में अमरीका चीन को रोकने की कोशिश कर रहा है, वहीं अब उन्होंने अफगानिस्तान में चीन को एक खुला मौका और मैदान दे दिया है और चीन कोई रूस नहीं जो पीछे हट जाएगा।
दरअसल तालिबान और अमरीका के बीच न ही कोई उचित सौदेबाजी हुई और न ही हस्तांतरण, अमरीका को तो बस वहां से निकलने की जल्दबाजी थी। यह भी संभव है कि तालिबान स्वयं को एक देश और एक क्षेत्र तक सीमित न रखे।

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