Sunday, Jan 23, 2022
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पृथ्विराज कपूर ने थिएटर के लिए गम्छा फैला कर मांगे थे पैसे, पढें ऐसे ही कुछ किस्से

  • Updated on 11/3/2016

Navodayatimesनई दिल्ली (टीम डिजिटल): 3 नवंबर 1906 को जन्में पृथ्विराज कपूर का आज जन्मदिन है। कपूर खानदान की नींव बॉलीवुड में पृथ्विराज कपूर ने ही जमाई थी।

वो पंजाब के लायलपुर में एक जमींदार परिवार में जन्में थे। पृथ्विराज को रंगमंच का शौक था और उन्हें थिएटर का बादशाह भी कहा जाता है। जानिए कपूर खानदान के लेजेंड के बारे में। 

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  • पृथ्वीराज की 18 साल की उम्र में ही शादी हो गई थी। कपूर खानदान में केवल वो ही हैं जिनका किसी एक्ट्रेस से अफेयर नहीं रहा।
  • शादी के बाद उनका एक्टिंग का शौक बढ़ता रहा और 1928 में वह अपने तीन बच्चों को छोड़कर अपनी चाची से पैसे लेकर पेशावर से मुंबई आ गए।
  • मुंबई आकर वो इम्पीरीयल फिल्म कंपनी से जुड़ गए। इस कंपनी से जुड़ने के बाद उन्होंने फिल्मों में छोटे रोल करना शुरू कर दिया। 
  • साल 1929 में पृथ्वीराज को अपनी तीसरी फिल्म 'सिनेमा गर्ल' में पहली बार लीड रोल करने का मौका मिला।

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  • साल 1931 में भारत की पहली बोलती फिल्म 'आलम आरा' आई थी और इस फिल्म में पृथ्वीराज ने भी काम किया था।
  • पृथ्वीराज ने 'दो धारी तलवार', 'शेर ए पंजाब' और 'प्रिंस राजकुमार' जैसी 9 साइलेंट फिल्मों में काम किया है।
  • पृथवीराज को रंगमंच से बहुत प्यार था इसलिए वे साल 1931 में शेक्सपीयर के नाटक पेश करने वाली ग्रांट एंडरसन थिएटर कंपनी से जुड़ गए। 
  • साल 1944 में उन्होंने अपनी सारी जमा पूंजी पृथ्वी थिएटर की स्थापना में लगा दी। अपने थिएटर की स्थापना के लिए पृथ्वी ने गमछा फैलाकर पैसे मांगे थे। इलाहाबाद में महाकुंभ के दौरान शो करने के बाद पृथ्वीराज खुद गेट पर खड़े होकर गमछा फैलाते थे और लोग उसमें पैसे डालते थे।
  • 'विद्यापति' (1937), 'सिकंदर' (1941), 'दहेज' (1950), 'आवारा' (1951), 'जिंदगी' (1964), 'आसमान महल' (1965), 'तीन बहूरानियां' (1968) आदि फिल्में आज भी पृथ्वीराज के अभिनय की वजह से यादगार मानी जाती हैं।

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  • फिल्म 'मुगल-ए-आजम' में उन्होंने उलझे शहंशाह जलालुद्दीन अकबर के किरदार को अमर कर दिया था। इसके साथ ही उनकी फिल्म 'आवारा' आज भी उनकी बेस्ट फिल्म मानी जाती है।
  • साल 1957 में आई फिल्म 'पैसा' नामक नाटक पर उन्होंने फिल्म बनाई थी। जिसके निर्देशन के दौरान उनका वोकल कोर्ड खराब हो गया था और उनकी आवाज पहले जैसी दमदार नहीं रह गई थी। जिसके बाद उन्होंने पृथ्वी थिएटर बंद कर दिया था।
  • 1961 में पृथ्वीराज कपूर श्रावणी मेले में सुल्तानगंज गए थे। वो वहां से जल भरने के बाद कावंड़ उठाकर देवघर तक लाए थे। अजगैबीनाथ मंदिर के बही खाते में पृथ्वीराज कपूर के हस्ताक्षर आज भी हैं। 
  • साल 1969 में उन्हें पद्म भूषण अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था। साल 1972 में उनकी मृत्यु के बाद उन्हें दादा साहब फाल्के पुरस्कार से भी नवाजा गया था।
  • एक समय पर उन्हें तत्कालीन पीएम जवाहर लाल नेहरू ने विदेश में हो रहे एक सांस्कृतिक दल में साथ चलने को कहा था। पृथ्वीराज ने उन्हें मना कर दिया था क्योंकि वो थियेटर के काम में व्यस्त थे। 

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