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हमें और जीने की चाहत न होती, अगर तुम न होते...

  • Updated on 10/13/2016

Navodayatimesनई दिल्ली, (अनिल मोहन): जिंदगी एक सफर है सुहाना,  जिंदगी प्यार का गीत है, मेरे महबूब कयामत होगी, दिल आज शायर है, खिलते हैं गुल यहां जैसे अनेक गीतों को अपनी आवाज देने वाले पाश्र्व गायक किशोर कुमार भले ही आज हमारे बीच नहीं है लेकिन खूबसूरत गीतों का जो खजाना वो अपने असंख्य चाहने वालों के लिए छोड़ कर गए हैं, उनकी खनक से वह प्रशंसकों के बीच हमेशा अमर रहेंगे।  

किशोर कुमार हिंदी फिल्म जगत की एक ऐसी महान हस्ती थे, जिन्हें बनाने-सवांरने में कुदरत को भी सदियां लग जाती हैं। किशोर की मधुर आवाज के जादू ने भला किसको दीवाना नहीं बनाया। उस आवाज का जादू आज भी लोगों के सिर चढ़कर बोल रहा है।

के एल सहगल थे पसंदीदा गायक

मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में गांगुली परिवार जन्मे किशोर कुमार के पिता का नाम कुंजीलाल गांगुली और माता का नाम गौरी देवी था। उनके बचपन का नाम आभास कुमार गांगुली था। 4 अगस्त 1929 को एक मध्यमवर्गीय बंगाली परिवार में जब इस छोटे बालक ने जन्म लिया तो कौन जानता था कि आगे चलकर यह बालक अपने परिवार और देश का नाम रोशन करेगा।

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परिवार मे सबसे छोटे किशोर कुमार का रुझान बचपन से ही अपने पिता के पेशे वकालत की तरफ न होकर संगीत की तरफ रहा अभिनेता और गायक के एल सहगल के प्रशंसक रहे किशोर कुमार बड़े होकर उनकी ही तरह गायक बनना चाहते थे और अपनी इसी चाह के चलते वो सहगल से मिलने 18 वर्ष की उम्र मे मुम्बई पहुंच गए लेकिन उनकी ये इच्छा पूरी नहीं हो पाई। 

उधार मांगने पर सुनाते थे गाना-

उस समय तक उनके बड़े भाई अशोक कुमार बतौर अभिनेता हिंदी फिल्मों में अपनी पहचान बना चुके थे। किशोर कुमार बचपन से ही नटखट और मनमौजी स्वभाव के थे उनकी आदत थी, कॉलेज की कैंटीन से उधार लेकर खुद भी खाना और दोस्तों को भी खिलाना।

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किशोर कुमार पर जब कैंटीन वाले के पांच रुपए बारह आने उधार हो गए और कैंटीन मालिक उन्हें उधारी चुकाने को कहता तो वह कैंटीन में बैठकर टेबल पर गिलास और चम्मच बजा-बजा कर पांच रुपया बारह आना गा-गा कर कई धुन निकालते और कैंटीन वाले की बात अनसुनी कर देते थे। बाद में उन्होंने अपने इस गीत का इस्तेमाल बड़ी खूबसूरती से फिल्म चलती का नाम गाड़ी में किया। ये गाना काफी हिट हुआ।

राजेश खन्ना की आवाज थे किशोर-

Navodayatimesकिशोर कुमार के फिल्मी करिअर की शुरुआत एक अभिनेता के रूप में वर्ष 1946 में फिल्म ‘शिकारी’ से हुई। इस फिल्म में उनके बड़े भाई अशोक कुमार ने मुख्य भूमिका निभाई थी। उन्हें पहली बार गाने का मौका मिला 1948 में बनी फिल्म ‘जिद्दी’ में। इस फिल्म में उन्होंने देव आनंद के लिए गाना गाया। वह के एल सहगल के बहुत-बड़े प्रशंसक थे, इसलिए उन्होंने यह गीत उनकी शैली में ही गाया।

किशोर कुमार की आवाज को फिल्म अभिनेता राजेश खन्ना के बेहद करीब माना था या यों भी कह सकते हैं कि उनकी आवाज को राजेश खन्ना की आवाज ही माना जाना लगा था। राजेश फिल्म निर्माताओं से किशोर से ही अपने लिए गीत गंवाने की गुजारिश किया करते थे। जब किशोर कुमार नहीं रहे तो राजेश खन्ना ने कहा था कि मेरी आवाज चली गई।

Navodayatimesराजेश के लिए उन्होंने ‘मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू’, ‘जिंदगी प्यार का गीत है’, ‘अच्छा तो हम चलते हैं’, ‘अगर तुम न होते’, ‘चला जाता हूं’, ‘चिंगारी कोई भड़के’, ‘दीवाना लेके आया है’, ‘दिल सच्चा और चेहरा झूठा’, ‘दीये जलते हैं’, ‘गोरे रंग पे ना इतना’, ‘हमें तुमसे प्यार कितना’, ‘जय जय शिव शंकर’, ‘करवटें बदलते रहे सारी रात हम’, ‘कोरा कागज था ये मन मेरा’, ‘कुछ तो लोग कहेंगे’, ‘मेरे नैना सावन भादो’, ‘ओ मेरे दिल के चैन’, ‘प्यार दीवाना होता है’, ‘रूप तेरा मस्ताना’, ‘शायद मेरी शादी का ख्याल’, ‘ये जो मोहब्बत है’, ‘ये क्या हुआ’, ‘ये शाम मस्तानी’, ‘जिंदगी का सफर’ जैसे 
खूबसूरत और यादगार नगमे गाए।

8 बार मिला फिल्मफेयर-

बतौर पाश्र्वगायक किशोर कुमार को आठ बार फिल्मफेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया था, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है। सबसे पहले उन्हें वर्ष 1969 में ‘आराधना’ फिल्म के गीत ‘रूप तेरा मस्ताना’ के लिए सर्वश्रेष्ठ गायक का फिल्म फेयर पुरस्कार दिया गया था। इसके बाद उन्हें 1975 में फिल्म ‘अमानुष’ के गीत ‘दिल ऐसा किसी ने मेरा’ के साथ ही 1978 में ‘डॉन’ के गीत ‘खाइके पान बनारस वाला’ के लिए उन्हें फिल्मफेयर अवार्ड से नवाजा गया था।

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वर्ष 1980 में फिल्म ‘हजार राहे जो मुड़ के देखी’ के गीत ‘थोड़ी सी बेवफाई’ सहित वर्ष 1982 की फिल्म ‘नमक हलाल’ के गाने ‘पग घुंघरू बांध मीरा नाची थी’ के लिए भी फिल्मफेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। 1983 में फिल्म ‘अगर तुम ना होते’ के टाइटल ट्रैक के लिए, वर्ष 1984 में फिल्म शराबी के सुपरहिट गीत ‘मंजिले अपनी जगह हैं’ सहित वर्ष 1985 की फिल्म ‘सागर’ के ‘सागर किनारे दिल ये पुकारे’ के लिए किशोर को फिल्मफेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

Navodayatimesकिशोर कुमार ने वर्ष 1987 में फैसला किया कि वह फिल्मों से संन्यास लेने के बाद, अपने गांव खंडवा लौट जाएंगे। वह कहा करते थे, ‘दूध जलेबी खाएंगे खंडवा में बस जाएंगे’ लेकिन उनका यह सपना पूरा नहीं हो सका। 13 अक्टूबर, 1987 को दिल का दौरा पडऩे से उनका निधन हो गया। उन्हें उनकी मातृभूमि खंडवा में ही दफनाया गया, जहां उनका मन बसता था।  

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