Monday, Jan 21, 2019

Review: अनुपम की दमदार एक्टिंग से सजी है ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’

  • Updated on 1/11/2019

स्टारकास्ट: अनुपम खेर,अक्षय खन्ना,सुजैन बर्नर्ट,अर्जुन माथुर,आहना कुमरा
डायरेक्टरः विजय रत्नाकर गुट्टे
रेटिंग: 3.5 स्टार/5*

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। विजय रत्नाकर गुट्टे के निर्देशन में बनी फिल्म ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ में अनुपम खेर मनमोहन सिंह की भूमिका में और अक्षय खन्ना संजय बारु के किरदार में हैं। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर आधारित फिल्म ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ इस समय काफी सुर्खियों में है और इसे लेकर राजनीति भी गरमाई हुई है। दरअसल ये फिल्म 2004 से 2008 तक मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार रहे संजय बारु की इसी नाम से प्रकाशित पुस्तक पर आधारित है। 

खास बात ये है कि इस फिल्म को लेकर जितने भी विवाद थे खत्म हो गए है, क्योंकि इसके रिलीज होते ही सबकि प्रतिक्रिया अच्छी है विवादित नहीं।

अनुपम खेर ने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की एक्टिंग बहुत अच्छी की है। कहीं कहीं उनका हाथ आगे झुकाकर चलना थोड़ा अजीब लगता है। लेकिन जैसे जैसे फिल्म आगे बढ़ती है, वे किरदार में फिट लगने हैं। अक्षय खन्ना ने संजय बारू का किरदार बखूबी निभाया है। वहीं जर्मन ऐक्ट्रेस सुजैन बर्नर्ट सोनिया गांधी के लुक में जच रही हैं। इसके अलावा प्रियंका के किरदार में आहना से अच्छा कोई और नहीं लग सकता था।

कहानी

2004 में लोकसभा में यूपीए के विजयी होने से फिल्म की शुरूआत होती है। जिसमें कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी (सुजैन बर्नेट) खुद डॉक्टर मनमोहन सिंह को पीएम पद के लिए चुनती हैं। संजय बारू (अक्षय खन्ना ) 2004 से 2008 के बीच प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार थे। वे लगातार पीएम की इमेज को मजबूत बनाते जाते है। उन्हें ये बात  साफ कर दी जाती है कि वह हाईकमान सोनिया गांधी को नहीं बल्कि पीएम को ही रिपोर्ट करें।

उसके बाद राहुल गांधी (अर्जुन माथुर), प्रियंका गांधी (आहना कुमरा) जैसे कई किरदारों की एंट्री होती हैं। पीएमओ में संजय की काफी सुनी जाती है ओर उसके विरोधी भी कई हैं। बारू पीएम के भाषण लिखता है और सब बताता है।  पीएम की मीडिया से बातचीत, बुश के साथ न्यूक्लियर डील सबकुछ बेहतरीन तरीके से दिखाया गया है। न्यूक्लियर मामले पर पीएम इस्तीफा देने को होते हैं पर हाईकमान उनको इस्तीफा देने से रोक लेती है। आगे पीएम की सफलता के पांच साल भी दिखाए गए हैं। 


फिल्म के डायरेक्टर विजय रत्नाकर गुट्टे ने अपनी पहली फिल्म को बनाने में कोई कमी नहीं छोड़ी। लेकिन इसका सेकंड हाफ काफी निराशाजनक है। धीरे-धीरे फिल्म थोड़ी बोर महसूस होने लगती है। खासकर उनके लिए जिन्हें राजनीति में दिलचस्पी नहीं है। फिल्म में थोड़ा एंटरटेनमेंट होना चाहिए था।

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