Sunday, Oct 17, 2021
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आयुर्वेद में प्रदूषण का प्रभावी उपाय जिसके जरिए हो सकता है दुष्प्रभावों से बचाव

  • Updated on 11/2/2019

नई दिल्ली/ टीम डिजिटल। देश की प्राचीन चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद में कई ऐसे आसान और प्रभावी उपाए हैं, जिन्हें अपनाकर लोग आसानी से न केवल प्रदूषण के प्रभाव से बच सकते हैं बल्कि उसके दुष्प्रभाव से निपटने के लिए अपने शरीर को भी तैयार कर सकते हैं।

शरीर को जहरीले तत्वों से मुक्त करती है स्वेदन प्रक्रिया  

स्वेदन प्रक्रिया के तरह पसीने के माध्यम से शरीर के अंदर मौजूद विषैले तत्व (टॉक्सिक) को आसानी से बाहर किया जा सकता है। इस प्रक्रिया के तहत 100 मिलीलीटर से 500 मिलीलीटर गर्म पानी, गर्म दूध या गर्म चाय पीकर और मोटा कपड़ा ओढ़ कर पसीना लेने से फेफड़ों तथा शरीर के अन्य अंगों में पहुंचे प्रदूषण के कण शरीर से बाहर निकल जाते हैं और शरीर को हानि नहीं पहुंचा पाते।

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वाष्पीकरण की प्रक्रिया  

वाष्पीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसके जरिए धूल कणों को नियंत्रित करने में मदद मिलती है। धूलकण अगर हवा में होगा तो वह सांस के जरिए शरीर के अंदर चला जाता है। जो कई तरह की समस्याएं पैदा कर सकता है। जब वाष्पीकरण की जाती है तो हवा में मौजूद धूलकण भाप की वजह से भारी हो जाता है और जमीन पर फैल जाता है।

जिसे सफाई कर आराम से घर से बाहर निकाल सकते हैं। यदि सुबह शाम घर में 2 लीटर पानी खुले में उबाला जाए तो धूल व प्रदूषण के अधिकांश कण नीचे बैठ जाएंगे जिससे घर की हवा का प्रदूषण समाप्त हो जाएगा।

जलनेती से श्वसन तंत्र की करें रक्षा

प्रदूषण के दौरान वातावरण में मौजूद जहरीले सूक्ष्मकण बेहद आसानी से सांस के साथ नाक के अंदर चले जाते हैं। फिर फेफड़ों में पहुंच कर कई तरह के संक्रमण और समस्या पैदा कर सकते हैं। इससे बचने के लिए शाम को घर पहुंचने के बाद जलनेती करना स्वशन तंत्र की सुरक्षा का बेहद उपयोगी माध्यम है। इस प्रक्रिया के तहत एक टोंटी लगे लोटे के जरिए गुनगुने पानी को एक नाक में डालकर दूसरे से निकाला जाता है और नाक में डालकर मुंह से निकाला जाता है।

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भोजन में नियमित शामिल करें ये तत्व  

जब वातावरण प्रदूषित हो और वह स्वास्थ्य के लिए जोखिम बन जाए तो कुछ सब्जियां और दलहन प्रदूषण के प्रभावों से शरीर की रक्षा करते हैं। ऐसे में रोजाना भोजन में घीया, तोरी, टिंडा,पालक जैसी हरी सब्जियां तथा मूंग और मसूर की दाल का प्रयोग प्रदूषण से बचाव किया जा सकता है। इसके ठीक उलट भोजन में चावल, दही, गोभी, मटर, मूली, उड़द की दाल जैसी ठंडी तासीर की चीजों को कम खाना चाहिए।

प्रदूषित कणों को शरीर से बाहर निकालता है आयुर्वेदिक पेय

दूध या चाय में तुलसी, अदरक, लौंग, काली मिर्च उबालकर पीने से गले की खराश ठीक हो जाएगी और प्रदूषित कण भी शरीर से बाहर निकल जाएंगे। दूध में खजूर, छोटी पीपल, काली मिर्च और सौंठ उबालकर पीने से शरीर की इम्युनिटी बढ़ेगी जिससे प्रदूषण जन्य रोगों से बचाव हो सकेगा। ये सभी उपाय दिन में एक बार करने से शरीर स्वस्थ रहेगा और आजकल के प्रदूषण का शरीर पर कोई दुष्प्रभाव नहीं होगा।

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दिल्ली के प्रदूषण में पराली के धुएं की हिस्सेदारी 46 प्रतिशत हुई

दिल्ली में वायु गुणवत्ता की स्तिथी लगातार बिगड़ती जा रही है और हालत यह है कि शुक्रवार को पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने से निकले धुएं की हिस्सेदारी 46 प्रतिशत तक पहुंच गई। सरकारी एजेंसी सफर के अनुसार यह इस साल का सर्वाधिक स्तर है। प्रदूषण का स्तर अत्यधिक गंभीर श्रेणी में पहुंच गया है।

प्राधिकरण ने कार्यान्वयन एजेंसियों को पंजाब तथा हरियाणा में पराली जलाने पर रोक लगाने के लिए तत्काल सख्त कदम उठाने को भी कहा। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की वायु गुणवत्ता निगरानी इकाई सफर के अनुसार शुक्रवार को दिल्ली के प्रदूषण में पराली जलाने से निकले धुएं की हिस्सेदारी 46 प्रतिशत तक पहुंच गई।

सफर ने कहा कि हरियाणा और पंजाब (उत्तर पश्चिम भारत) में पराली जलाने के मामले बढ़ रहे हैं और यह इस साल के सर्वाधिक स्तर (3178) पर है। एजेंसी ने कहा कि निचले स्तर पर हवा की गति, धूल उडऩा और कम आद्र्रता जैसे कुछ अन्य कारण भी हैं जिनके कारण प्रदूषण के लिहाज से हालात प्रतिकूल हैं।

हालांकि सफर के अनुसार एक सकारात्मक घटनाक्रम यह है कि हवा की दिशा पश्चिम की ओर है लेकिन यह राहत थोड़े समय के लिए है।

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