Thursday, Jan 27, 2022
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खतरनाक हो सकता है कंजक्टिवाइटिस, जानें डॉक्टर्स क्या देते हैं सलाह

  • Updated on 4/14/2018

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। अप्रैल का महीना शुरू होते ही गर्मी ने दस्तक दे दी है। इस मौसम में कई तरह के रोग लोगों को अपनी चपेट में ले लेते हैं। मई से सितम्बर तक की गर्मी में उमस के साथ ही तीखी धूप होती है। इस दौरान वर्षा और गर्मी का मिलाजुला प्रभाव होने की वजह से लोग जिस बीमारी का अधिक शिकार होते हैं, उसका नाम है- कंजक्टिवाइटिस यानी नेत्र फ्लू।

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हमारे समाज में नेत्र फ्लू वैसे तो आंख की सामान्य बीमारी समझी जाती है, लेकिन ज्यादा लापरवाही बरतने पर आंखों की कोर्निया क्षतिग्रस्त हो सकती है, जिससे आप अंधेपन का शिकार हो सकते है। नेत्र फ्लू रोग में आंखे लाल हो जाती है। लोगों को पढऩेे या कोई मानसिक कार्य करने में दिक्कत होती है। नेेत्र फ्लू बैक्टैरिया और वायरस दोनों हो सकता है।

नई दिल्ली के सेंटर फॉर साइट के निदेशक डॉ.महिपाल सचदेव का कहना है कि नेत्र फ्लू आंख के बाहरी पर्दे यानी आंखों में सफेद दिखने वाला भाग पर चढ़ी झिल्ली जिसे कन्जक्टिवाइटिस कहते हैं पर वायरस का संक्रमण होता है। नेत्र फ्लू रोग में कन्जक्टवाइ प्रभावित होती है। इसलिए इस रोग को चिकित्सकीय भाषा में कंजक्टिवाइटिस कहते हैं। लोगों में कंजक्टिवाइटिस रोग सामान्तया 35 फीसदी वायरस एवं 65 फीसदी बैक्टैरिया एवं अन्य कारण से होते हैं। 

नेत्र फ्लू का वायरस गंदी उंगलियों, धूल-धुंआ, तालाबों एवं गड्ïढ़ों में भरे गंदे पानी में नहाने एवं मक्खियों के माध्यम से फैलता है। साथ ही सप्लाई वाले दूषित पानी पीने से भी इसका संक्रमण फैलता है। इसके अलावा नेत्र फ्लू संक्रमित व्यक्ति के कपड़े का उपयोग करने, उत्सर्जित हवा और निकट स्पर्श आदि के कारण भी होता है। यह इतना तीव्र संक्रामक रोग है कि मात्र रोगी व्यक्ति की आंखों की ओर देखने से यह देखने वाले की आंखों में हो सकता है। इसके जीवाणु (वायरस) हवा के संपर्क में आने से दूसरे व्यक्ति की आंखों में पहुंचते हैं।

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कंजक्टिवाइटिस होने के बाद आंखों में चुभन और जलन होने लगती है। ऐसा लगता है कि उनमें कुछ है। आंखों को धूप तथा तेज रोशनी चुभती है। इसे फोटो फोबिया कहते हैं, जिससे आंखों को पूरी तरह खोलने से रोगी हिचकता है। आंखों में थकान तथा दर्द भी महसूस होता है। कभी कभी आंखों की पुतलियों पर दाने पड़ जाते हैं। उपयुक्त उपचार न होने की स्थिति में दूसरे बैक्टीरिया भी आंखों को प्रभावित कर देते हैं, जिससे सफेद गाढ़ा पदार्थ आंखों के कोने तथा पलकों के किनारों पर एकत्र हो जाता है। यह कीचड़ इतना हो सकता है कि जब सुबह व्यक्ति उठता है तो उसकी दोनों पलकें चिपकी होती है।

आखों में इसका संक्रमण होते ही तुरंत डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए। आंखों को तेज रोशनी से होने वाली परेशानी से बचने के लिए आंखों पर गहरे रंग का शीशे वाला धूप का चश्मा पहनना चाहिए। इस बीमारी का इलाज केवल दो तरीके से हो सकता है, पहली किसी विसंक्रामक द्रव से आंखों की बार-बार सफाई और दूसरी आंखों में सेकेन्डरी इन्फेक्शन को रोकने के लिए एंटीबायोटिक का प्रयोग। 

 

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