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सिजोफ्रेनिया एक मेंटल डिस्ऑर्डर है, जानिए, आखिर क्या है इसका इलाज!

  • Updated on 9/15/2017

Navodayatimes नई दिल्ली/टीम डिजिटल।  भारत में आज भी मेंटल हेल्थ पर बहुत खास ध्यान नहीं दिया जाता। इस संबंध में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) का मानना है कि देश में मानसिक रोगों को अभी भी खास महत्व नहीं दिया जा रहा। आज भी लोगों में इसके प्रति जागरूक होने की जरूरत है। आज हम आपको ऐसे ही एक मानसिक विकार के बारे में बताने जा रहे है जिसे सिजोफ्रेनिया के नाम से जाना जाता है।

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विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक सिजोफ्रेनिया युवाओं की सबसे बड़ी क्षमतानाशक बीमारी है। विश्व की दस सबसे घातक बीमारियों में सिजोफ्रेनिया शामिल है। आपको यह जानकर हैरानी हो सकती है कि 15 से 35 वर्ष की उम्र के पूरे विश्व में लगभग ढाई करोड़ लोग सिजोफ्रेनिया से पीड़ित हैं। अकेले भारत में ही लाखों लोग अस बिमारी से पीड़ित है। 

क्या है सिजोफ्रेनिया-
सिजोफ्रेनिया एक ऐसी मानसिक बिमारी है जो किसी भी व्यक्ति के सोचने समझने की क्षमता को खा जाती है। यह एक प्रकार का मानसिक विकार है और इसकी वजह से व्यक्ति के सोचने, महसूस करने और व्यवहार करने का तरीका प्रभावित होता है।

 एक्सपर्ट का क्या कहना है-
एक्सपर्ट का कहना है कि सिजोफ्रेनिया 16 से 30 साल की आयु में हो सकता है। पुरुषों में इस रोग के लक्षण महिलाओं की तुलना में कम उम्र में दिखने शुरू हो सकते हैं। बहुत से लोगों को इस बात का अहसास ही नहीं होता कि उन्हें यह रोग हो गया है, क्योंकि इसके लक्षण बहुत लंबे समय बाद सामने आते हैं। 

आंकड़े
देशभर में किए गए एक सर्वे के अनुसार, भारत की सामान्य जनसंख्या का लगभग 13.7 प्रतिशत हिस्सा मानसिक बीमारियों से ग्रस्त है।  इसके अलावाए इनमें से लगभग 10.6 प्रतिशत लोगों को इमिडिएट मेडिकल केयर की आवश्यकता होती है।

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मरीजों का बिहेवियर

इस बिमारी से ग्रसित लोग दूसरों से दूर रहने लगते हैं और अकेले होते जाते हैं। वे अटपटे तरीके से सोचते हैं और हर बात पर शक करते हैं। ऐसे लोगों के परिवार में अक्सर पहले से मनोविकृति की समस्या चली आ रही होती है। युवाओं में ऐसी स्थिति को प्रोड्रोमल पीरियड कहा जाता है। 

इस रोग का पता लगाना इसलिए भी मुश्किल हो जाता है, क्योंकि बहुत से लोग मानते हैं कि उन्हें ऐसा कुछ है ही नहीं। सिजोफ्रेनिया के मरीजों को अन्य दिक्कतें भी हो सकती हैं जैसे कि किसी नशीले पदार्थ की लत, स्ट्रेस, और डिप्रेशन। 

शोधकर्ताओं का यह भी सुझाव है कि इस स्थिति के लिए भ्रूणावस्था में न्यूरोनल विकास भी जिम्मेदार हो सकता है।  सिजोफ्रेनिया के रोगियों का इलाज पर दवा और साइक्लोजिकल काउंसलिंग से होता है। 

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 बचाव के लिए कुछ उपाय 

सही उपचार कराएं। इलाज को बीच में बंद न करें। ऐसे रोगियों को यही लगता है कि वे जो सोच रहे हैं, वही सच है। ऐसे रोगियों को बताएं कि हर किसी को अपने तरीके से सोचने का अधिकार है। खतरनाक या अनुचित व्यवहार को बर्दाश्त किए बिना ऐसे मरीजों से सम्मान के साथ पेश आए और उनकी मदद करें।

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