Wednesday, Apr 25, 2018

Exclusive interview हवा-पानी साफ रखने की पहली जिम्मेदारी राज्य सरकार कीः शीला दीक्षित

  • Updated on 12/1/2017

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। कांग्रेस की लगातार15 साल की सरकार में तीन टर्म दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित न केवल दिल्ली के पूर्ण राज्य के दर्जे की पैरोकार हैं, बल्कि दिल्ली पुलिस को भी राज्य सरकार के मातहत किए जाने की पक्षधर हैं।

लेकिन, केंद्र और पिछली सरकारों पर आरोप लगाकर खुद का पल्ला झाड़ लेने की मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की नीति के बेहद खिलाफ हैं। नवोदय टाइम्स/पंजाब केसरी  के साथ विशेष बातचीत में उन्होंने कहा कि दिल्ली ऐसा राज्य है, जहां बाहर से आने-जाने वालों का सर्वाधिक दबाव है, इसके मद्देनजर यहां सतत विकास की जरूरत है। केवल एक-दो कार्यों का प्रोपेगंडा करके दिल्ली को अपने हाल पर नहीं छोड़ा जा सकता। प्रस्तुत है बातचीत के प्रमुख अंश..

दिल्ली को जैसा आपने छोड़ा था, आज  आप किस तरह से देखती हैं?

दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी है। देश के अन्य शहरों की अपेक्षा यहां आने-जाने वालों का ज्यादा दबाव है। इसलिए यहां निरंतर विकास की जरूरत है। 1998 में जब हमारी सरकार आई थी, दिल्ली में 3-4 फ्लाईओवर थे। आज 30 से भी ज्यादा हैं। यातायात दबाव को देखते हुए ये भी पर्याप्त नहीं लगते। इसी तरह उस वक्त एक यूनिवॢसटी, दिल्ली विश्व-विद्यालय था। आज 5-6 यूनिवॢसटी हैं, फिर भी कमी महसूस होती हैं। कुछ-एक काम करके यह मान लेना कि इतना कर दिया, इससे काम नहीं चलने वाला। दुनिया के टॉप शहर में बने रहने के लिए लगातार करते रहने की जरूरत है। दुर्भाग्यवश ऐसा हो नहीं रहा है। जो काम हमारी सरकार ने किया, उसके बाद से कुछ हुआ नहीं। सिग्नेचर ब्रिज जैसे काम जो अधूरे रह गए थे, आज भी पूरे नहीं हुए। जो पूरे हुए थे, वर्तमान सरकार उन्हें संभालकर नहीं रख पा रही है। 

केजरीवाल सरकार शिक्षा में बहुत अच्छा काम करने का दावा कर रही है?
मेरी सरकार के वक्त शिक्षा की स्थिति को देखते तो उन्हें वस्तुस्थिति समझ में आ जाती। शत-प्रतिशत उपस्थिति और उत्कृष्ट रिजल्ट होता था दिल्ली का। 1997 में सरकारी स्कूलों में पंजीकरण 8 लाख 340 था, 2013 आते-आते यह संख्या 17 लाख हो चुकी थी। यानी 112 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज हुई थी। अस्पतालों में बेड 24 हजार से बढ़कर 44 हजार हो गया था। वाटर सप्लाई 2000 में जहां केवल 544 एमजीडी था, वह बढ़कर 835 एमजीडी हो गया था। इसी तरह सार्वजनिक परिवहन में सीटिंग व्यवस्था 180 फीसद बढ़ी थी। देखा जाए तो वे 15 साल दिल्ली के लिए बेमिसाल थे। हर क्षेत्र में वृद्धि हुई थी ।अफसोस यह है कि वर्तमान सरकार उसे बरकरार नहीं रख पा रही है। हर क्षेत्र में गिरावट दिख रही है। विकास कहीं दिख रहा हो तो बताइए?

तो क्या केजरीवाल सरकार कुछ विशेष वर्ग को खुश कर अपना वोट बैंक बनाने में लगी है?
मेरे पास एक नागरिक का फोन आया। बताया कि बिजली का बिल जो आधा करने का दावा किया जा रहा है, वास्तव में ऐसा हुआ नहीं है। उसे आज भी वही पुराने हिसाब से पूरा बिल भरना पड़ रहा है। इसी से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि दिल्ली सरकार किसे खुश कर रही है और किसे अनदेखा?
 

केजरीवाल कहते हैं कि दिल्ली से ज्यादा उत्तर भारत के कई राज्यों में प्रदूषण है।
हां, है। लेकिन यह कह देने से तो दिल्ली प्रदूषण मुक्त नहीं हो जाएगी। हवा-पानी साफ-सुथरा रखने की पहली जिम्मेदारी तो राज्य सरकार की ही है न। दूसरों पर आरोप लगा देने भर से तो काम नहीं चलता। दिल्ली को प्रदूषण मुक्त करने के लिए सरकार मन बना ले तो धन की कमी नहीं है। 1300 करोड़ रुपए तो अभी सरकारी खजाने में इसी काम के लिए पड़े हैं, सरकार ने उसका उपयोग नहीं किया। अगर सरकार वाकई मन से प्रदूषण के खिलाफ काम करना चाहेगी तो आम जनता से भी इसमें सहयोग मिलेगा।
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स्मॉग और प्रदूषण तो आपकी सरकार के वक्त भी था। नया मुद्दा तो है नहीं। आपने क्या किया था?
दिल्ली ऐसी जगह है कि बर्फ कहीं गिरे ठंड यहां बढ़ जाती है। पराली कहीं जले और हवा यहां की खराब हो जाती है। हवा को रोका अथवा बांधा नहीं जा सकता। इसलिए यहां बहुत ध्यान देने की जरूरत है। मेरी सरकार के वक्त पहली बार जब प्रदूषण का मामला आया तो हमने भूरे लाल और सुनीता नारायण जैसे अनुभवियों और विशेषज्ञों की कमेटी बनाई। उनकी सलाह पर पहले सीएनजी फिर मेट्रो लेकर आए। आज जो सरकार है, उसे भी चाहिए विशेषज्ञों की कमेटी बनाए और उनसे मिली सलाह के अनुसार इंतजाम करे। केंद्र सरकार के साथ भी बैठे। हरियाणा, पंजाब, गुरुग्राम में पराली जलाने के मुद्दे पर वहां की सरकारों से बातचीत करे। समाधान है, ढूंढ़े तब न। कोई प्रयास तो कहीं दिखाई नहीं देता।केजरीवाल का लगातार कहना है कि केंद्र की भाजपा सरकार उन्हें सहयोग नहीं कर रही है।जब मैंने दिल्ली में सीएनजी और मेट्रो की शुरुआत की थी, केंद्र में एनडीए की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार थी। सीएनजी की पहल केंद्र की नहीं, दिल्ली सरकार की थी। दिल्ली का मुख्यमंत्री दिल्ली का चेहरा है। हर बात केंद्र के पाले में डालकर अपनी जिम्मेदारियों से नहीं भाग सकते। निर्भया कांड को ही ले लीजिए, पुलिस की गलती थी। पुलिस राज्य के अधीन नहीं लेकिन सारा ठीकरा मेरे सिर ही फोड़ा गया। वीडियोकॉन के सी.ई.ओ. अरविन्द बाली का विशेष इंटरव्यू

केजरीवाल का उपराज्यपाल के साथ भी टकराव बना हुआ है। एलजी क्या सर्वेसर्वा हैं?
नहीं, उपराज्यपाल के पास केवल पुलिस और भूमि संबंधी पूरे अधिकार हैं। लेकिन, दिल्ली की स्थिति बाकी राज्यों जैसी नहीं है। तमाम प्रशासनिक मामले हैं, जो उपराज्यपाल के जरिए ही हो सकते हैं। इसलिए उपराज्यपाल के साथ टकराव करके राज्य सरकार नहीं चल सकती। दोनों के बीच समन्वय की जरूरत होती है। राज्य सरकार एलजी के साथ मिलकर कुछ करना चाहेगी तो मुझे नहीं लगता कि कहीं कोई दिक्कत आने वाली है।
 

केजरीवाल ने भ्रष्टाचार को एक अहम मुद्दा बनाया था। क्या दिल्ली भ्रष्टाचार मुक्त हो चुकी है?
भ्रष्टाचार ऐसी चीज है जो दिखती नहीं, इसलिए इस पर कुछ कहना मुश्किल है। हां, हाल के दिनों में कुछ ऐसी खबरें पढऩे को मिली, जिसमें 3000 करोड़ रुपए के घपले की बातें कही गई थीं, और जब काम कहीं दिख नहीं रहा है, केवल हर तरफ विज्ञापन ही विज्ञापन दिख रहा है तो इसे क्या मानेंगे। विज्ञापन पर खर्च तो हो ही रहा है। यह क्या है? 
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दिल्ली पुलिस को दिल्ली सरकार के अधीन करने की मांग उठती रहती है। आप क्या मानती हैं?
मैं इसकी पक्षधर हूं कि दिल्ली पुलिस दिल्ली सरकार के पास होनी चाहिए। इससे कानून-व्यवस्था बनाने में राज्य सरकार को मदद मिलेगी। मैंने एनडीए की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के वक्त इस बारे में केंद्र को भेजा था। तब के गृहमंत्री लालकृष्ण अडवानी ने इस पर कुछ पहल भी की थी। लेकिन बाद में सब डंप हो गया।
 

दिल्ली को पूर्ण राज्य के दर्जे का भी एक बड़ा मुद्दा है। आपको क्या लगता है कि यह होना चाहिए?
दिल्ली का जो वर्तमान ढांचा है, वह पूर्ण नहीं है। बाकी राज्यों की तरह दिल्ली की स्थिति नहीं है। फुल अथॉरिटी नहीं होने के कारण राज्य सरकार को कई बार दिक्कतें आती हैं। फ्रीडम नहीं है। पुलिस केंद्र की है। राज्य सरकार अपनी पसंद का चीफ सेक्रेटरी तक नहीं तय कर सकती। ऐसी कई परेशानियां आती हैं। इसलिए दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा मिलना 
ही चाहिए।

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राहुल के अध्यक्ष बनने का यह सबसे मुफीद वक्त है
राहुल गांधी अगले कुछ दिनों में अध्यक्ष बनने जा रहे हैं। आप किस तरह से देख रही हैं? राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने का यह सबसे मुफीद वक्त है। अनुभव बढऩे के साथ-साथ उनके व्यक्तित्व में भी निखार आ रहा है। दो साल या पांच साल पहले वाले राहुल गांधी अब नहीं हैं। वे तेजी से चीजों को सीख रहे हैं। उनका एप्रोच बहुत परफेक्ट है। चुनाव हारना-जीतना अलग बात है और नेतृत्व करना अलग बात। अब वे नेतृत्व करने के लिए पूरी तरह परफेक्ट हैं। राहुल खुद कह चुके हैं कि उनकी टीम में अनुभवी और युवा दोनों के लिए पर्याप्त जगह होगी। Exclusive interview: रोमांस की नई शैली ‘करीब-करीब सिंगल’

आपको लगता है कि राहुल गांधी पीएम नरेंद्र मोदी को चुनौती दे सकेंगे?
राहुल गांधी के साथ मोदी की तुलना बेतुका है। राहुल की अपनी पर्सनालिटी है। दोनों की तुलना गैरवाजिब होगा। राहुल की तुलना करना है तो उनके पिता राजीव गांधी से करिए, दादी इंदिरा गांधी से कीजिए। परदादा जवाहर लाल नेहरू से कीजिए। राहुल अलग धारा से हैं। मोदी की अलग धारा है। दोनों में उम्र और अनुभव का भी काफी अंतर है। क्या लगता है प्रियंका गांधी राहुल की टीम का हिस्सा बनेंगी? प्रियंका गांधी के राजनीति में आने, न आने का फैसला उनके परिवार का मामला है। 

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