Sunday, Oct 17, 2021
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‘कांग्रेस पार्टी के भले के लिए’‘सिद्धू व अमरेंद्र दिल मिलाएं’

  • Updated on 7/20/2021

इन दिनों देश की दोनों बड़ी राजनीतिक पार्टियां कांग्रेस और भाजपा आंतरिक कलह की भारी शिकार हैं। वैसे तो कांग्रेस की राजस्थान, बिहार, केरल और हरियाणा इकाइयों में भी कलह व्याप्त है परन्तु सर्वाधिक असंतोष पंजाब कांग्रेस में ही था जहां पूर्व मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू के अलावा चंद अन्य मंत्रियों व कांग्रेस नेताओं ने अमरेन्द्र सिंह के विरुद्ध मोर्चा खोल रखा था।

कांग्रेस आलाकमान द्वारा गठित मल्लिकार्जुन समिति पंजाब के 100 से अधिक नेताओं से बातचीत तथा अमरेंद्र सिंह और नवजोत सिद्धू सहित पंजाब के कांग्रेसी नेताओं की दिल्ली में राहुल और प्रियंका गांधी के साथ मुलाकातों के बावजूद इसे दूर करने में विफल रही। मुख्यमंत्री अमरेंद्र सिंह ने सोनिया गांधी से 6 जुलाई को भेंट की परंतु कोई नतीजा न निकला। 
पिछले चंद दिनों के दौरान राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर की पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरेंद्र सिंह और राहुल गांधी से भेंट व प्रशांत किशोर के कांग्रेस में शामिल होने की अटकलों के बीच 15 जुलाई को पंजाब कांग्रेस प्रभारी हरीश रावत का बयान आया जिसमें उन्होंने पंजाब कांग्रेस की अंतर्कलह समाप्त करने बारे फार्मूला तैयार हो जाने की बात कही।

इसके अंतर्गत कैप्टन अमरेंद्र सिंह के मुख्यमंत्री बने रहने, नवजोत सिद्धू के पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष बनाए जाने तथा सिद्धू के अध्यक्ष बनने की स्थिति में पार्टी में हिंदू तथा दलित भाईचारे से 2 कार्यकारी अध्यक्षों की नियुक्ति का संकेत दिया गया परंतु बाद में श्री रावत ने कहा कि उनके बयान का गलत अर्थ निकाला गया है।

अंतत: 17 जुलाई को हरीश रावत के साथ चंडीगढ़ में भेंट के बाद अमरेंद्र सिंह ने कहा कि उन्हें सोनिया गांधी का हर फैसला मंजूर होगा परंतु इस बैठक में अमरेंद्र ने रावत के सामने कुछ ऐसे सवाल उठाए जिनका वह जवाब नहीं दे पाए। अमरेंद्र सिंह ने यह भी कहा कि जब तक सिद्धू अपने ट्वीटों बारे सार्वजनिक रूप से माफी नहीं मांगते तब तक उनसे भेंट नहीं होगी।

एक ओर कैप्टन अमरेंद्र सिंह 18 जुलाई को भी नवजोत सिंह सिद्धू की माफी पर अड़े रहे तो दूसरी ओर इसी दिन अंतत: रात 9 बजे के लगभग कांग्रेस अध्यक्ष पद पर नवजोत सिंह सिद्धू की ताजपोशी किए जाने की घोषणा कर दी गई। 
इसके साथ ही पंजाब कांग्रेस के 4 कार्यकारी अध्यक्ष भी नियुक्त कर दिए गए जिनकी नियुक्ति कैप्टन अमरेंद्र सिंह के सुझावों पर की गई बताई जाती हैं। इनमें हिंदू, जाट तथा दलित को बराबर का प्रतिनिधित्व देने की कोशिश की गई है। नई व्यवस्था के अनुसार कैप्टन अमरेंद्र सिंह सरकार तो सिद्धू पार्टी को संभालेंगे।

यहां यह बात भी उल्लेखनीय है कि सिद्धू को बधाइयां मिल रही हैं, परंतु कैप्टन अमरेंद्र सिंह की ओर से कोई बधाई संदेश उन्हें नहीं भेजा गया परंतु मंत्री तृप्त बाजवा ने कहा है कि जिस प्रकार वह सांसद प्रताप सिंह बाजवा की लिखी हुई चिट्ठियों को भूल गए हैं, उसी तरह नवजोत सिंह सिद्धू के ट्वीटों को भी भूल जाएं।

हालांकि अपनी तरफ से कांग्रेस हाईकमान ने अमरेंद्र सिंह के हाथों में सरकार की बागडोर कायम रख कर और सिद्धू को प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनाकर यह झगड़ा समाप्त करने की कोशिश की है परंतु इसके बावजूद ऐसा दिखाई दे रहा है कि दोनों के बीच कुछ खटास अभी बाकी है। 

जो भी हो, अमरेन्द्र सिंह व नवजोत सिद्धू को मानना चाहिए कि दोनों से ही कुछ छोटी-मोटी गलतियां अवश्य हुई होंगी। अमरेंद्र सिंह 1984 में आप्रेशन ब्ल्यू स्टार के विरोध में संसद सदस्यता से इस्तीफा दे कर अकाली दल में शामिल हो गए थे तो नवजोत सिद्धू भी भाजपा से अपनी राजनीतिक पारी शुरू करने और अमृतसर से लगातार सांसद रहने के बावजूद अपनी आवाज कम सुनी जाने के कारण पार्टी से अलग होकर कांग्रेस में शामिल हुए हैं।

उल्लेखनीय है कि नवजोत सिद्धू के पिता स. भगवंत सिंह कांग्रेस के कार्यकर्ता के रूप में स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हुए थे और अंत तक कांग्रेसी ही रहे। अत: बीती बातें भुला कर दोनों को ही पुरानी कटुता छोड़ कर काम में जुट जाना चाहिए। दोनों के दिलों का मिलन जरूरी है। इसी में उनका, कांग्रेस का और वर्करों का भला है।

—विजय कुमार 

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