Monday, Sep 27, 2021
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जिन्ना का ऑफर ठुकराने वाला ये जाबांज मुस्लिम फौजी भारत के लिए हो गया था शहीद

  • Updated on 7/15/2020

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। आज आर्मी अफसर मोहम्मद उस्मान का जन्मदिन है। ये वही मोहम्मद उस्मान हैं जिन्होंने जिन्ना के कश्मीर पर कब्जा करने की साजिश को मिट्टी में मिला दिया था। मोहम्मद उस्मान का जन्म अविभाजित भारत के उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जनपद में 15 जुलाई 1912 में हुआ था।

उनके पिता मोहम्मद फारूक खुनाम्बिर पुलिस में अधिकारी थे और वो चाहते थे कि उनका बेटा सिविल सर्विस में जाए, लेकिन मोहम्मद उस्मान ने आर्मी को चुना।

बचपन से थे बहादुर
मोहम्मद उस्मान बचपन से बहादुर थे। उन्होंने 12 साल की उम्र में एक बच्चे को बचाने के लिए कुएं में छलांग लगा दी थी। इसी घटना से उनके हौसले और जज्बे को लोगों ने समझाना शुरू कर दिया था।

सैंडहर्स्ट इंग्लैंड में ट्रेनिंग
उन्होंने कड़ी चुनौती के बीच लगन और मेहनत से 1 फरवरी 1934 को सैंडहर्स्ट इंग्लैंड में सेना की ट्रेनिंग पास की। जब 1935 में ब्रिटिश भारत आए तो उनकी नियुक्ति बलूच रेजिमेंट की 5वीं बटालियन में हुई। उन्हें 30 अप्रैल 1936 को लेफ्टिनेंट की रैंक पर प्रमोशन मिला। फिर 1941 में कैप्टन बने। इसके बाद, 1944 में दूसरे विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने ब्रिटिश फौज की ओर से बर्मा में अपनी सेवाएं दी। कार्यवाहक मेजर के तौर पर 27 सितंबर 1945 को लंदन गैजेट में उनके नाम का उल्लेख किया गया।

जब मिला जिन्ना का ऑफर
अप्रैल 1945 से अप्रैल 1946 तक मोहम्मद उस्मान ने 10वीं बलूच रेजिमेंट की 14वीं बलाटियन की कमान संभाली। इसी बीच जिन्ना ने उनके सामने पाकिस्तान चलने का ऑफर रखा। लेकिन उन्होंने मना कर दिया। जिन्ना ने उन्हें फिर लुभाते हुए ऑफर दिया और कहा 'पाकिस्तान आ जाओ मैं तुम्हें आर्मी चीफ बना दूंगा।'  इस पर मोहम्मद उस्मान ने कहा, मैं भारत में जन्मा हूं और इसी जमीन पर मैं आखिरी सांस लूंगा।

कहलाए 'नौशेरा के शेर'
पाकिस्तानी सेना ने 25 दिसंबर, 1947 को झनगड़ पर कब्ज़ा कर लिया। इस वक्त झनगड़ और पुंछ को वापस लेना लक्ष्य था। उस लड़ाई में ब्रिगेडियर उस्मान की वीरता, नेतृत्व व पराक्रम से झनगड़ 1948 में भारत ने जीत लिया और उस्मान को 'नौशेरा का शेर' कहा गया। तब पाकिस्तान  के हजार जवान मारे गये थे और इतने ही घायल हुए थे, लेकिन भारत के 102 घायल हुए थे और 36 जवान शहीद हुए थे।

अपनी सालगिरह से पहले
बताया जाता है कि उस्मान अपनी 36वीं सालगरिह से सिर्फ 12 दिन पहले 3 जुलाई को युद्धभूमि में शहीद हुए थे। ब्रिगेडियर उस्मान को उनके साहस के लिए मरणोपरांत 'महावीर चक्र' से नवाजा गया था। उस्मान की अंतिम यात्रा में तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू के साथ ही गवर्नर जनरल लार्ड माउंटबेटन, केंद्रीय मंत्री मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद और शेख अब्दुल्ला शामिल हुए थे। दिल्ली के जामिया मिल्लिया इस्लामिया कब्रगाह में उनका अंतिम संस्कार हुआ था।

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