Tuesday, Oct 26, 2021
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157 artifacts and antiquities to return from us with pm''''''''s efforts

प्रधानमंत्री के प्रयास से अमेरिका से लौटेंगी 157 कलाकृतियां व पुरावशेष

  • Updated on 9/26/2021

नई दिल्ली। टीम डिजिटल। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सिर्फ अमेरिका से दोस्ती की सौगात ही नहीं बल्कि 157 कलाकृतियां व पुरावशेष वापस ला रहे हैं, जिनका पुरातात्विक महत्व काफी ज्यादा है। इन मूर्तियों को तस्करों द्वारा चोरी कर अवैध रूप से देश के बाहर ले जाया गया था। इनमें कलाकृतियों में हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म व जैन धर्म से संबंधित सांस्कृतिक पुरावशेष व मूर्तियां शामिल हैं। प्रधानमंत्री लगातार अपने पुरावशेषों को वापस अपने देश लाने का प्रयास करते रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी व अमेरिका के राष्ट्रपति ब्राइडेन ने चोरी, अवैध व्यापार से निपटने के अपने प्रयासों को मजबूत करने के लिए प्रतिबद्धता जाहिर करते हुए इन पुरावशेषों को दिया है।
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अधिकतर कलाकृतियां 11वीं से 14वीं शताब्दी की हैं
बता दें कि यह 157 कलाकृतियों में से अधिकतर 11वी से 14वीं शताब्दी के बीच की हैं। इनमें आधा मीटर की रेवंता की सेंडस्टोन से बनी मूूर्ति 10वीं शताब्दी की है जबकि 8.6 सेंटीमीटर लंबी ब्रांज की नटराज मूर्ति 12वीं शताब्दी की हैं। अधिकतर कलाकृतियां काॅपर की है। इनमें से कई 2000 ईसापूर्व में बनी तांबा की बनी मानववंशीय वस्तु या दूसरी शताब्दी में बने टेराकोटा के फूलदान व 45 पुरातनताएं सामान्य युग से पहले की हैं। जबकि 71 कलाकृतियां सांस्कृतिक है व 60 हिंदू धर्म, 16 बौद्ध धर्म व 9 जैन धर्म से संबंधित हैं।
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कई मूर्तियां बेहद खास
वहीं कांस्य संग्रह में मुख्य रूप से लक्ष्मीनारायण, बुद्ध की प्रसिद्ध मुद्राओं की अलंकृत मूर्तियां हैं। विष्णु, शिव-पार्वती और 24 जैन तीर्थकर और सामान्य कंकलमूर्ति, ब्राहमी, नंदिकेश के अलावा कई अज्ञात देवताओं की भी मूर्तियां शामिल हैं। इनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण मूर्तियां हैं तीन सिर वाले ब्रह्मदेव की मूर्ति, अपने रथ पर सवार सूर्य देव, विष्णु व उनकी पत्नी, शिव की दक्षिणामूर्ति और नृत्यमुद्रा में गणेश मूर्तियां हैं। जबकी बौद्ध धर्म की स्थायी बुद्ध, बोधिसत्व मंजूश्री व तारा मूर्तियां प्रमुख है। जैन धर्म से जैन तीर्थकर, पद्मासन तीर्थकर व जैन चैबिसी मूर्तियां प्रमुख है। इसके अलावा 12वीं शताब्दी की हिरण की जोडी, 14वी शताब्दी की बस्ट आॅफ फीमेल, 18वीं शताब्दी की तलवार है जिसमें शिलालेख के साथ फारसी में गुरू हरगोविंद सिंह का उल्लेख है।

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