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50 percent people can be corona asymptomatic says aiims director dr randeep guleria aljwnt

50 प्रतिशत लोग हो सकते हैं एसिंप्टोमेटिक : पद्मश्री डॉ. रणदीप गुलेरिया, डायरेक्टर, दिल्ली AIIMS

  • Updated on 6/8/2020

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। भारत में कोरोना वायरस का कहर लगातार बढ़ता जा रहा है। देश में कोरोना से संक्रमित होने वालों का आंकड़ा 2.5 लाख के पार जा चुका है। इस चिंताजनक स्थिति के बीच एम्स (दिल्ली) के डायरेक्टर पद्मश्री डॉ. रणदीप गुलेरिया ने पंजाब केसरी/ नवोदय टाइम्स/ जगबाणी/ हिंद समाचार से खास बातचीत की और कोरोना वायरस से जुड़ी कई अहम बातें साक्षा कीं। पेश हैं बातचीत के प्रमुख अंश...

सवाल: देश में कोरोना का संक्रमण बढ़ता ही जा रहा है, क्या स्थिति होने जा रही देश की?
जवाब: देश की आबादी ज्यादा है, ऐसे में संक्रमण के केस तो बढ़ेंगे ही। लेकिन, जिस तरह से मामलों के बढऩे की दर है वह कम है। यह लॉकडाउन का फायदा है। हमें कोरोना से लडऩे के लिए तैयार होने का वक्त मिला। अच्छी बात यह भी है कि अन्य देशों की तुलना में हमारे देश में कोरोना से होने वाली मौतों की संख्या कम है। हां, मामले बढ़ेंगे, लेकिन हम अधिक से अधिक जानें बचा पाएं, हमारे लिए यह जरूरी है। जानें बचा पाएंगे तो हम यह लड़ाई जीत पाएंगे।

सवाल: संक्रमण को लेकर भारत की स्थिति क्या है?
जवाब:  देश के विभिन्न राज्यों और शहरों में स्थिति अलग-अलग है। कुछ जगहों पर मामले कम हैं लेकिन, कई शहर हैं जैसे, दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद, इंदौर आदि जहां संक्रमण तेजी से बढ़ रहा है। इन शहरों में कोरोना का फैलाव अधिक हो रहा है। यहां पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है। यदि इन शहरों में संक्रमण घटेगा तो स्थिति को संभाला जा सकेगा। कंटेनमेंट जोन, हॉटस्पॉट में ज्यादा फोकस किया जाना चाहिए। माइक्रो प्लानिंग करने की जरूरत है।

सवाल: क्या लॉकडाउन कर्फ्यू जैसा होना चाहिए था?
जवाब: मेरा मानना है कि लॉकडाउन में कफ्र्यू जैसा माहौल ही होना चाहिए था। क्योंकि कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए सोशल डिस्टेंसिंग जरूरी है। अगर हम संपर्क में आते रहेेंगे तो संक्रमण फैलता रहेगा। इसी कारण जहां लॉकडाउन मेंं सोशल डिस्टेंसिंग का पालन नहीं हुआ वहां पर मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। शहरों में स्थित झुग्गियों में जहां एक-एक कमरे में कई लोग रहते हैं, कॉमन शौचालय इस्तेमाल किया जाता है। वहां मामले बढ़ रहे हैं। ऐसी जगहों पर जांच भी अधिक होनी चाहिए और पॉजिटिव लोगों का पता लगाकर उनको अलग करना जरूरी है। इसमें सभी को सतर्कता बरतनी होगी। चाहे शहर की बात हो या फिर गांव की। हर जगह सोशल डिस्टेंसिंग जरूरी है और मास्क लगाने के साथ ही बार-बार हाथ धोना जरूरी है। 

सवाल: छूट बढ़ती जा रही है, सोशल डिस्टेंसिंग नहीं दिखाई दे रही है, कितना बड़ा खतरा है?
जवाब: जैसे-जैसे लॉकडाउन उठ रहा है, वैसे-वैसे हर व्यक्ति की जिम्मेदारी बढ़ रही है। लॉकडाउन में छूट का मतलब यह नहीं कि कोरोना खत्म हो गया है। हमें सोशल डिस्टेंसिंग का ध्यान रखने की जरूरत है। दफ्तर हो या दुकान, दूरी बनाकर रखनी चाहिए। ऑफिस में लंच बे्रक के दौरान साथ में खाना भी नहीं खाना चाहिए। कुछ समय तक इस तरह की चीजें बंद रखनी होंगी। 

सवाल: अस्पतालों में काम करने वाले स्वास्थ्यकर्मी कोरोना वॉरियर हैं, उनका मनोबल बढ़ाने के लिए एम्स में क्या किया जा रहा है?
जवाब: संक्रमण काल में सभी कर्मचारियों का पूरा सहयोग किया जा रहा है। यदि कोई संक्रमित होता है तो उसका और उसके परिवार का पूरा ध्यान रखा जाता है। वेतन में कटौती नहीं की जाती। लगातार पूछा जाता है कि कोई दिक्कत तो नहीं है। किसी को ऐसा नहीं लगने देते कि कोरोना होना किसी तरह से कलंक है। 

सवाल: संक्रमण को कलंक की तरह  देखा जा रहा है?
जवाब: यह बहुत बड़ी समस्या है। चाहे मरीजों की बात हो या फिर डॉक्टर या स्वास्थ्यकर्मियों की। शुरू में तो अस्पताल में काम करने वालों को उनके मकान मालिकों ने घर से निकाल दिया था या घर के अंदर नहीं जाने दिया था। ऐसा नहीं होना चाहिए। 

सवाल: बिना लक्षण वाले कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या भी बढ़ती जा रही है, यह कितनी बड़ी समस्या है?
जवाब: अगर हम बिना लक्षण वाले मरीजों यानी एसिंप्टोमेटिक की बात करें तो यह पॉजिटिव है। इनके गंभीर होने की आशंका काफी कम होती है। इनको घबराने की जरूरत नहीं है। ऐसे लोग 5-7 दिन में खुद ही ठीक हो जाते हैं। लेकिन, बिना लक्षण वाले संक्रमित लोगों को आइसोलेट होकर रहना जरूरी है। क्योंकि, वह किसी और को, परिवार वालों को संक्रमित कर सकते हैं। एसिंप्टोमेटिक या माइल्ड इफेक्ट वाले कोरोना मरीज घर पर रहकर मॉरल सपोर्ट के साथ जल्दी ठीक हो सकते हैं। कुल मरीजों में करीब 80-90 प्रतिशत मरीज ऐसे हैं जो एसिंप्टोमेटिक या माइल्ड इफेक्ट वाले ही हैं। जिनके भीतर लक्षण नहीं हैं, उनसे अलग तरह का खतरा है। 

सवाल: अधिक समय तक मास्क लगाने से सांस आदि की दिक्कत तो नहीं होगी?
जवाब: यदि साधारण कॉटन वाला मास्क लगाया जा रहा है तो किसी तरह की दिक्कत नहीं है। हां, सांस लेने में मास्क की परत एक बैरियर की तरह काम करती है, जिससे थोड़ी परेशानी हो सकती है। लेकिन, इससे किसी तरह की कोई दिक्कत नहीं है। समझने वाली बात है कि अगर आप अकेले हैं तो मास्क लगाना जरूरी नहीं है। एसिंप्टोमेटिक मरीजों की संख्या ज्यादा हो रही है, ऐसे में मास्क लगाने से काफी हद तक बचाव होगा।

सवाल: एसिंप्टोमेटिक या यूं कहें कि बिना लक्षण वाले कोरोना संक्रमित लोगों की संख्या कितनी होगी?
जवाब: कई तरह की बातें हैं, जिसमें कहा जा रहा है कि 30 से 40 प्रतिशत लोग एसिंप्टोमेटिक हो सकते हैं। इसके लिए आंकड़े जुटाए जा रहे हैं, आईसीएमआर भी स्टडी कर रहा है। सीरो सर्विलांस के तहत बड़े स्तर पर जांच करके पता लगाया जाए कि कितने लोगों में इन्फेक्शन हुआ और एंटीबॉडीज बने, लेकिन कोरोना के लक्षण नहीं दिखाई दिए या कम दिखाई दिए और वह ठीक हो गए। मेरा मानना है ऐसे लोगों की संख्या काफी ज्यादा है। 40-50 प्रतिशत तक हो सकती यह दर। इसी कारण हम प्रोटेक्शन की बात कर रहे हैं। क्योंकि जब भी आप बाहर निकल रहे हैं तो इस बात की आशंका बहुत ज्यादा है कि आपके आसपास जो व्यक्ति मौजूद हो या बैठा हो, हो सकता है वह बिना लक्षण वाला कोरोना संक्रमित मरीज हो। जरूरी है कि सोशल डिस्टेंसिंग बनाकर और मास्क लगाकर रखा जाए। क्योंकि आपको पता ही नहीं कि कौन निगेटिव है और कौन पॉजिटिव है। ऐसे में यह मानकर चलना चाहिए कि आसपास जो भी हैं सभी पॉजिटिव हैं और सभी से दूरी बनाकर रखनी चाहिए। तभी हम खुद को कोरोना से बचा पाएंगे। ऐसा नहीं करने पर जो सुरक्षा का दायरा है उसमें ढील पड़ जाएगी। 

सवाल: कोरोना के मामले बढऩे पर आपको विशेष रूप से गुजरात भेजा गया था, क्या स्थिति रही वहां पर?
जवाब: वहां पर सोशल डिस्टेंसिंग नहीं होने पर मामले बढ़ रहे थे। कोरोना संक्रमण को एक कलंक की तरह देखा जा रहा था। लोग इलाज के लिए अस्पताल नहीं पहुंच रहे थे, देर से पहुंच रहे थे। लोगों को डर था कि अगर वह पॉजिटिव पाए जाते हैं तो पूरा परिवार क्वारंटीन कर दिया जाएगा और दूसरे लोग उनको अलग नजर से देखेंगे। यह खतरनाक है, क्योंकि अगर कोरोना संक्रमण के शुरू में तकलीफ होने पर अस्पताल पहुंचा जाए तो जान बचाई जा सकती है। जरूरी है कि लोग छिपाएं नहीं बताएं, अगर जरूरी है तो जांच जरूर कराएं। 

सवाल: वैक्सीन इफेक्टिव होनी चाहिए
जवाब: करोना को लेकर वैक्सीन बनाने के लिए बड़े स्तर पर काम चल रहा है। भारत में जो शोध हो रहे हैं, उनमें विदेशी कंपनियों, शोधकर्ताओं के साथ पार्टनरशिप की गई है। वैक्सीन बनाने के लिए कई बातों का बहुत ध्यान रखा जाता है। वैक्सीन इफेक्टिव होनी चाहिए। यदि यह कहा जाए कि वैक्सीन दस प्रतिशत सुरक्षा देती है तो उसका फायदा नहीं है। हमारा मानना है कि वैक्सीन ऐसी हो जिससे 80-90 प्रतिशत तक सुरक्षा हो सके। वैक्सीन ऐसी होनी चाहिए जो न्यूट्रीलॉजिंग एंटीबॉडीज अच्छी मात्रा में बनाए। इसके साथ वैक्सीन सेफ होनी चाहिए, क्योंकि इसे आम जनता को लगाया जाना है, उसके साइड इफेक्ट नहीं होने चाहिए। अच्छी वैक्सीन बन जाने के बाद उसका प्रोडक्शन बड़ी संख्या में हो पाना भी समय लेने वाला काम है।

सवाल: बचाव को ही वैक्सीन समझना होगा?
जवाब: जब तक वैक्सीन नहीं आती तब तक बचाव के तरीकों को ही वैक्सीन समझकर चलना होगा। मास्क लगाना, सेनेटाइजर का इस्तेमाल करना, दूरी बनाकर रखना, फिलहाल इन बातों का पालन करना ही कोरोना से बचने की वैक्सीन है।

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