Thursday, Jan 20, 2022
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विभाजन की ‘परछाईं’ और मौलाना आजाद

  • Updated on 1/27/2020

चूंकि सी.ए.ए., एन.आर.सी., एन.पी.आर. पर चर्चा के दौरान ‘‘विभाजन’’ शब्द भी आया है ऐसे में ध्यान मौलाना आजाद की ओर जाता है जो देश के विभाजन के सख्त विरोधी थे। संयोग से 22 फरवरी को मौलाना आजाद की 61वीं पुण्यतिथि है। उस तारीख से ठीक 30 वर्ष बाद ‘‘इंडिया विन्स फ्रीडम’’ के 30 कीमती पेज नैशनल आर्काइव्स से बाहर निकाले गए जिन्हें मौलाना ने दूर रखा था ताकि इन पेजों में शामिल रहस्योद्घाटनों, यदि कोई हो, से उनके समकालीन लोगों को शर्मिंदगी का सामना न करना पड़े। 
और फिर उलझनों की बाढ़ आ गई। बुद्धिजीवी वर्ग और शासक वर्ग मौलाना की लिखी बातों को ज्यादा महत्व देने के लिए तैयार नहीं था। 1988 में ‘‘इंडिया विन्स फ्रीडम’’ के ‘सम्पूर्ण’ संस्करण का प्रकाशन होने के बाद चर्चा का अभाव दबाने वाला था। न ही इसके बाद इतिहास के हित में सूत्रों को पकड़ा गया। उदाहरण के लिए मौलाना ने इस बात पर जोर दिया था कि अंग्रेजों के साथ बातचीत के अंत में सरदार पटेल ‘टू-नेशन थ्यूरी’ को लेकर ज्यादा आश्वस्त नजर आ रहे थे। यदि जरूरत हो तो इसे गलत साबित करें। विभाजन की योजना की घोषणा के बाद एक तर्क यह भी दिया गया कि अत्याचारों से बचने के लिए ब्रिटिश आर्मी को एकजुट रखा जाए। 
अस्थायी तौर पर यह विचार विवेकपूर्ण जान पड़ता था। लेकिन मौलाना इस बात से हैरान थे कि शांतिवादी राजेन्द्र प्रसाद संयुक्त सेना के बिल्कुल खिलाफ थे। उनका विरोध इस बात को लेकर था कि सेना के एक रहने से बंटवारे का काम अधूरा ही रहेगा और कौन जाने कि यह अधूरा काम कब तक लटकता रहेगा। यदि एकजुट सेना ने विभाजन को वापस रद्द कर दिया तो फिर क्या होगा? विभाजन को लेकर उत्सुकता बहुत से नेताओं के व्यवहार में झलकती थी। मौलाना इस बात का भी विस्तार से जिक्र करते हैं कि कैसे सरदार पटेल ने महात्मा गांधी को इस बात के लिए आश्वस्त किया था कि वर्तमान परिस्थितियों में विभाजन ही सही रास्ता था।
वर्तमान की ही तरह 1946-47 में भी असम राज्य चर्चा का केन्द्र था। आज यदि यह सी.ए.ए. व एन.आर.सी. पर चर्चा करने में अहम रोल अदा कर रहा है तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है। राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक गर्व से ओतप्रोत मुख्यमंत्री गोपीनाथ बोरदोलोई ने असम को बंगाल के साथ जोडऩे के कैबिनेट मिशन के प्रस्ताव को खारिज करने में महात्मा गांधी का समर्थन हासिल कर लिया जिसे मिशन के प्लान में जोन सी में रखा गया था। देश को ग्रुप ए, बी और सी अंतर्गत स्थिर किया जाना था।

देश को एक रखने का था अंतिम प्रयास
कैबिनेट मिशन का देश को एक रखने का यह अंतिम प्रयास था। 7 जुलाई 1946 को कांग्रेस ने इसका समर्थन किया था लेकिन दो हैरानीजनक घटनाओं ने बंटवारे को अवश्यंभावी बना दिया। एक था बंगाल के साथ जुडऩे के खिलाफ असम का सख्त विरोध। आज की तरह उसे तब भी यह डर था कि वहां माईग्रेशन की बाढ़ आ जाएगी। दूसरी थी, कांग्रेस के नए अध्यक्ष जवाहर लाल नेहरू की मुम्बई में 10 जुलाई को की गई  प्रैस कांफ्रैंस। नेहरू ने घोषणा की कि कैबिनेट मिशन और जिन्ना के साथ जो भी समझौता हुआ है उसकी संविधान सभा से पुष्टि होना जरूरी है। समझौते में यह शर्त शामिल नहीं थी। इस घटनाक्रम से नाराज जिन्ना वहां से निकल गए। बंटवारा अनिवार्य हो गया।

विभाजन के विरुद्ध थे मौलाना
मौलाना पूरी मजबूती के साथ विभाजन के विरोधी थे। वह देश की 1,100 वर्षों की संस्कृति की बात करते थे। उन्होंने कहा था ‘‘बंटवारे का मतलब होगा विशुद्ध हिन्दू राज’’, अनुभव की रोशनी में क्या वह गलत थे? क्या विभाजन हिन्दू अधिकार के लिए कांग्रेस का तोहफा था? पड़ोस में एक मुस्लिम देश जिससे लगातार घृणा की जाती हो। मुस्लिम बहुसंख्यक वाले कश्मीर की अनसुलझी समस्या। 

यदि पाकिस्तान मुसलमानों के हितों के इतना खिलाफ था, जैसा कि मौलाना कहते रहे, तो फिर इतनी बड़ी संख्या  में मुसलमान इस लालच में क्यों आ गए? इसका जवाब मौलाना कुछ इस तरह देते हैं :
‘‘इसका जवाब कुछ साम्प्रदायिक कट्टरवादी हिन्दुओं के व्यवहार में दिखता है। जब मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की बात करनी शुरू की तो उन्हें (हिन्दुओं को) इसमें इस्लामिक षड्यंत्र नजर आया। उन्होंने इसका विरोध किया। इससे मुस्लिम लीग के लोगों तथा अन्य मुसलमानों को ऐसा लगा कि यदि हिन्दू पाकिस्तान के इतने ही विरोधी हैं तो अवश्य ही यह मुसलमानों के लिए लाभदायक होगा।

उन्हें विश्वास था कि साम्प्रदायिक मतभेद का अध्याय शीघ्र ही समाप्त हो जाएगा। यह मतभेद केवल राजनीतिक दलों में विरोध के लिए ही रहेगा लेकिन यह धर्म पर आधारित न होकर आॢथक और राजनीतिक मुद्दों पर आधारित होगा। 
1964 में नेहरू ने अपनी मृत्यु से पहले अर्नोल्ड को एक इंटरव्यू दिया था जो काफी रहस्योद्घाटन करता है। इसमें वह स्वतंत्रता आंदोलन में मुस्लिम लीग की भूमिका को खारिज करते हैं। उनका कहना था कि मुस्लिम लीग की स्थापना अंग्रेजों ने उन्हें बांटने के लिए की थी। जब उन्हें पूछा गया कि ऐसी स्थिति में उन्होंने विभाजन को स्वीकार क्यों किया तो इसका उत्तर काफी रहस्यमय था ‘‘मैंने फैसला किया कि लगातार समस्या से जूझने की बजाय विभाजन बेहतर है।’’ यह समस्या थी कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच लगातार होने वाली कलह। अंतरिम सरकार की असंगतियों से नेहरू हताश थे। लेकिन क्या तब भारत के पहले प्रधानमंत्री ने अल्पसंख्यकों के बारे में सोचा। मौलाना आजाद इस बात को समझते थे कि उनका भविष्य क्या होगा लेकिन मौलाना नेहरू की तरह करिश्माई नेता नहीं थे लेकिन इस समुदाय को बाद में आत्ममंथन करने पर पता चला कि उन्हें उस नेता ने ही नीचा दिखा दिया जिसकी वह पूजा करते थे। 

सईद नकवी       

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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