दिल्ली में भी अकाली दल में दो फाड़, टकसाली हुए बागी

  • Updated on 2/2/2019

नई दिल्ली/ (सुनील पाण्डेय) : शिरोमणि अकाली दल (बादल) की पंजाब ईकाई के बाद अब दिल्ली में भी सबकुछ ठीक नहीं है। टकसाली अकाली नेता खुलेआम बगावत पर उतर आए हैं। नतीजन, पार्टी दो फाड़ होती नजर आ रही है। अपना सारा जीवन अकाली दल को समर्पित करने वाले जत्थेदार कुलदीप सिंह भोगल ने दिल्ली गुरुद्वारा कमेटी और अकाली दल में अपनी हो रही अनदेखी से तंग होकर बगावत शुरू कर दी है।

भोगल सोशल मीडिया के फेसबुक पर सरेआम पार्टी के मौजूदा नेताओं के खिलाफ भड़ास निकाल रहे हैं। इसके अलावा भोगल ने 1984 सिख दंगों को लेकर टकसाली नेताओं द्वारा शुरू की गई लड़ाई का श्रेय दिल्ली कमेटी की मौजूदा लीडरशिप द्वारा लेने पर आंखे तरेर दी है। केंद्र सरकार द्वारा वरिष्ठ अकाली नेता सुखदेव सिंह ढींढसा तथा आम आदमी पार्टी को अलविदा कहने वाले वरिष्ठ वकील हरविंदर सिंह फुलका को पदम पुरस्कार देने की घोषणा के बाद दिल्ली में अकाली दल के समीकरण बिगड़ गए हैं।

ढींढ़सा और फुल्का के एकत्र होने के बाद पार्टी में दो फाड़ की स्थित पैदा हो गई है। इसकी शुरुआत कुलदीप सिंह भोगल द्वारा ढींढसा को पदम पुरस्कार के लिए सम्मानित करने को लेकर किए गए आयोजन को लेकर बढ़ गई है। पार्टी का नाराज धड़ा यह समझता है कि बादल परिवार इस समय अकाली दल की हालत खराब करने का दोषी है। लिहाजा, वह ढींढसा के नेतृत्व में नये अकाली दल के प्रति अपनी आस्था जता सकता है।

सूत्रों के मुताबिक भारतीय जनता पार्टी को भी अंदरुनी किए गए सर्वे में इस बात का एहसास हो गया है कि पंजाब में अकाली दल के साथ लोकसभा चुनााव लडऩे पर उनका नतीजा सिफर रह सकता है। लिहाजा, पार्टी गुपचुप तरीके से पंजाब में दूसरा रास्ता खोज रही है। सूत्रों की माने तो बेअदबी मामलों की जांच में एसआईटी की बढ़ी रफ्तार ने बादल परिवार की नींद हराम कर रखी है।

लिहाजा, लोकसभा चुनाव आते आते भाजपा नाराज अकाली नेताओं को साथ लेकर नया सत्ता समीकरण बनाकर चुनाव मैदान में ताल ढोक सकती है। इस नये समीकरण में ढींढसा, फुल्का,व शिरोमणि अकाली दल टकसाली के अध्यक्ष ब्रहमपुरा की भूमिका अहम रहने वाली है। सूत्रों की माने तो दिल्ली में अकाली दल में एक धड़ा सुखबीर बादल के करीब है, जबकि दूसरा धड़ा वरिष्ठ नेता सुखदेव सिंह ढींढसा के साथ सक्रिय हो गया है। इस मामले में दिल्ली कमेटी से बेदखल होने के बाद पूर्व अध्यक्ष मंजीत सिंह जीके खामोश हैं। उनकी चुप्पी भी बड़ी अहम नजर आ रही है। 

भोगल का छलका दर्द, निकाली भड़ास  

 शिरोमणि अकाली दल के वरिष्ठ अकाली नेता जत्थेदार कुलदीप सिंह भोगल ने साफ कहा कि पार्टी में टकसाली अकाली नेताओं की अनदेखी हो रही है। लिहाजा, अब पार्टी में रहने को मन नहीं कर रहा है। उन्होंने कहा कि 34 साल से 1984 सिख दंगों की लड़ाई हम लड़ते रह गए, और शिरोमणि कमेटी से सम्मान आज के झूठे नेता पा गए।

यहां तक कि बाला साहिब अस्पताल को लेकर बड़ी लड़ाई लड़ी और अकाली दल को कमेटी में सत्ता दिलाई, लेकिन जब मलाई की बात आई तो पार्टी भूल गई। लेकिन अब वह खामोश नहीं रहेंगे। उन्होंने कहा कि पार्टी को टकसाली अकाली नेताओं की नाराजगी तथा हवाबाजों को ज्यादा ताकत देना नुकसान कर सकता है। 

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