Wednesday, Oct 27, 2021
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amarinder singh said do not discredit farmers they are fighting for their lives and future pragnt

'किसानों को बदनाम न करें, वे अपने जीवन और भविष्य के लिए संघर्ष कर रहे हैं'- अमरिंदर सिंह

  • Updated on 1/30/2021

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। 26 जनवरी को लाल किले (Red Fort) पर हुई हिंसा के बाद से दो महीने से ज्यादा लंबे समय से दिल्ली (Delhi) में सिंघू बार्डर और टिकरी बॉर्डर सहित 15 जगहों पर धरना प्रदर्शन कर रहे किसानों (Farmers) को खालिस्तानी और नक्सलवादी तक नामों से बुलाया जाने लगा है। क्या ये लोग खालिस्तानी या फिर नक्सलवादी हैं- इस संबंध में नवोदय टाइम्स के साथ विशेष बातचीत में मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह (Captain Amarinder Singh) ने कहा कि किसानों को बदनाम न किया जाए, वे अपने जीवन और भविष्य के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उनका भविष्य दाव पर लगा हुआ है। इसके साथ ही उन्होंने किसानों और केंद्र सरकार से वार्ता जारी रखने का भी आग्रह किया है। उनका कहना है कि वार्ता ही इस मामले का एकमात्र हल है। 

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जो लोग लाल किले की हिंसा में शामिल थे, वे वास्तव में किसान नहीं थे। कुछ असामाजिक तत्वों ने आंदोलन में घुसपैठ की थी
क्या आपको लगता है कि लाल किले की हिंसा, जिसकी आपने राष्ट्र के अपमान के रूप में भी निंदा की है, ने किसानों की छवि को धूमिल किया है और उनके आंदोलन को एक खेदजनक स्थिति में ला दिया है? इस पर मुख्यमंत्री ने कहा- हां, यह घटना हम सभी के लिए शर्मनाक है। हमारे राष्ट्र का अपमान है। स्वतंत्र भारत के प्रतीक को क्षतिग्रस्त और अशक्त किया जाना कोई ऐसी बात नहीं है जिस पर कोई भारतीय गर्व कर सकता हो। यह वास्तव में हमारे श्रद्धेय निशान साहिब का भी अपमान है जो कुछ गुंडा तत्वों (वे किसान नहीं हो सकते थे) द्वारा शांतिपूर्ण विरोध को कम करने के लिए इस्तेमाल किया गया है।

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एक पंजाबी के रूप में, मैं अपने उस समुदाय की ओर से अपमानित महसूस करता हूं, जो अपने बेटों को राष्ट्र की सीमाओं से लगभग हर दूसरे दिन राष्ट्रीय ध्वज में लपेट कर ला रहा है लेकिन पूरे समुदाय को बदनाम करना गलत होगा, जिसकी देशभक्ति पर कभी भी संदेह नहीं किया जा सकता। उन किसानों को बदनाम करना भी गलत होगा, जो पहले पंजाब में और फिर दिल्ली की सीमाओं पर पिछले दो महीनों से ज्यादा समय से बिना किसी परेशानी के शांतिपूर्वक विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। ये उन बहुत से किसानों के बेटे हैं, जो हमारे देश की सीमाओं की रक्षा के लिए अपने जीवन का बलिदान दे रहे हैं। 

यह स्पष्ट है कि जो लोग लाल किले की हिंसा में शामिल थे, वे वास्तव में किसान नहीं थे। कुछ असामाजिक तत्वों ने इस आंदोलन में घुसपैठ की थी। उनमें से कुछ की पहचान की गई है, जैसे कि अभिनेता दीप सिद्धू, जिन्हें दिल्ली पुलिस ने एक प्रमुख अपराधी के रूप में नामजद किया है इसलिए इस घटना से किसानों के आंदोलन के लिए कुछ अस्थायी नतीजे हो सकते हैं, लेकिन मुझे नहीं लगता कि इससे किसानों के आंदोलन को कोई गंभीर नुक्सान हो सकता है। वे अपने अस्तित्व के लिए और अपनी आने वाली पीढिय़ों के लिए लड़ रहे हैं और मुझे नहीं लगता कि वास्तविक किसानों या उनके समर्थकों के संघर्ष को एक ऐसी घटना से नकारा जा सकता है, जो किसी साजिश का नतीजा लगती है।

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किसान आंदोलन को खत्म करने की कोशिश करने वाली भाजपा की यह पहली घटना नहीं 
क्या आपको लगता है कि भाजपा लाल किले की घटना का इस्तेमाल किसानों के आंदोलन को बदनाम करने के लिए कर रही है? तो उन्होंने कहा- हां, किसानों के आंदोलन को खत्म करने की कोशिश करने वाली भाजपा की यह पहली घटना नहीं है। वे आंदोलन की शुरूआत से ही ऐसा बार-बार और लगातार कर रहे हैं। 

उन्होंने किसानों को खालिस्तानियों, शहरी नक्सलियों और गुंडों तक के नाम से बुलाया। क्या ये किसान आतंकवादी या अलगाववादियों की तरह दिखते हैं? सच कहूं तो भाजपा के विभिन्न नेताओं के ताजा बयान पार्टी द्वारा किसानों के संघर्ष को कम करने और उनकी आवाज को दबाने का सिर्फ एक और प्रयास है। यह वास्तव में दुर्भाग्यपूर्ण है कि सत्तारूढ़ भाजपा ने न केवल संघवाद और हमारे संविधान के सभी मानदंडों का उल्लंघन किया और कृषि कानूनों को पहले स्थान पर लागू किया, बल्कि लोकतांत्रिक तरीके से किए गए विरोध प्रदर्शनों को रोकने के लिए अपनी शक्ति का इस्तेमाल किया है।

लाल किले की घटना, जो पूरी तरह से अस्वीकार्य है, की कांग्रेस सहित हर समझदार व्यक्ति ने निंदा की है लेकिन भाजपा किसानों के दर्द को समझ नहीं सकी है जो दो महीने से भीषण सर्दी में दिल्ली में धरना प्रदर्शन कर रहे हैं। क्या भाजपा उनके आंसू नहीं देख सकती? क्या वे लगभग हर दिन किसानों को मरते हुए नहीं देख रहे? या वे अपने अहंकार में इतने अंधे हो गए हैं कि उन्हें कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा?

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यदि सरकार चीन से बात कर सकती है, जो हमारे क्षेत्रों में घुसपैठ कर रहा है और महीनों से हमारी जमीन हड़प रहा है, तो अपने ही किसानों से क्यों नहीं? 
दिल्ली पुलिस द्वारा लाल किले की घटना को लेकर एफ.आई.आर. में किसान यूनियनों के कई नेताओं को नामजद किया गया है और सरकार में कुछ लोग कह रहे हैं कि इस घटना ने बातचीत के दरवाजे बंद कर दिए हैं। क्या आप इससे सहमत हैं? इस पर उन्होंने कहा कि अगर केंद्र सरकार इस घटना का इस्तेमाल कर किसानों के साथ भविष्य में बातचीत के दरवाजे बंद करती है, तो यह वास्तव में दुर्भाग्यपूर्ण होगा। यह वास्तव में भारत के लिए लोकतंत्र की मृत्यु का कारण होगा।

यह एक राष्ट्र के रूप में हमारे लिए काला दिन होगा, जिसने अपनी स्वतंत्रता के बाद से ही अपनी लोकतांत्रिक राजनीति और सिद्धांतों पर गर्व किया है। मैं ईमानदारी से आशा करता हूं और केंद्र सरकार से किसानों के साथ बातचीत जारी रखने का आग्रह करता हूं, जैसा कि वे पिछले कई हफ्तों से कर रहे हैं। वार्ता या बातचीत ही इस संकट को हल करने का एकमात्र तरीका है और समस्या का एकमात्र समाधान है। यदि सरकार चीन से बात कर सकती है, जो हमारे क्षेत्रों में घुसपैठ कर रहा है और महीनों से हमारी जमीन हड़प रहा है, तो सरकार को अपने ही किसानों, हमारे अपने लोगों के साथ बातचीत क्यों स्थगित करनी चाहिए?

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किसानों और केंद्र सरकार-दोनों से मेरा सुझाव- कृपया बात करते रहें, मुझे यकीन है कि आप जटिलताओं से बाहर निकलने का रास्ता खोज लेंगे। मैं यहां यह भी दोहराना चाहूंगा कि केंद्र या दिल्ली पुलिस द्वारा इस एक घटना का उपयोग किसान नेताओं को परेशान करने और उन्हें निशाना बनाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। जो लोग हिंसा भड़काने के दोषी हैं और जो सक्रिय रूप से अराजकता में लिप्त हैं, उन्हें निश्चित रूप से दंडित किया जाना चाहिए लेकिन यह घटना किसानों के आंदोलन को नष्ट करने का उपकरण नहीं बननी चाहिए। अगर इन किसानों में से किसी की भी उकसाने बारे में कोई सबूत है या कोई कोई वीडियो फुटेज है तो उन्हें गिरफ्तार किया जाए और दंडित किया जाए लेकिन उन्हें दूसरों के कृत्यों के लिए बाकी को कैसे जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। वास्तव में, इसमें कुछ राजनीतिक सदस्यों के शामिल होने के संकेत हैं।

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यह कोई प्रतिष्ठा का सवाल नहीं है, बल्कि अस्तित्व का है। उनका पूरा भविष्य दाव पर है, उनके बच्चों का भविष्य खतरे में है 
क्या आपको लगता है कि बदले हुए परिदृश्य को देखते हुए किसानों को कृषि कानूनों को लागू करने के केंद्र के प्रस्ताव को फेस-सेवर के रूप में स्वीकार करना चाहिए? बशर्ते कि केंद्र सरकार किसानों को समायोजित करने के लिए अभी भी तैयार है। इस पर कैप्टन ने कहा कि यह एक बहुत ही एकतरफा दृष्टिकोण है। किसान कोई भीख नहीं मांग रहे हैं, वे अपने हक के लिए लड़ रहे हैं इसलिए केंद्र के समायोजन या किसानों द्वारा स्वीकार किए जाने या नहीं स्वीकार करने का कोई सवाल नहीं है। किसी भी राजनीतिक दल का इस मामले में कुछ कहना नहीं है, और कुछ वर्गों द्वारा इस गिनती बारे फैलाए गए झूठ के विपरीत, कोई भी किसानों को निर्देशित नहीं कर सकता है। वे जानते हैं कि उनके लिए क्या अच्छा है और क्या नहीं। यह कोई प्रतिष्ठा का सवाल नहीं है, बल्कि अस्तित्व का है। उनका पूरा भविष्य दाव पर है, उनके बच्चों का भविष्य खतरे में है। मैं किसी को कैसे कह सकता हूं कि वे अपने भविष्य और अपनी आजीविका की रक्षा न करे?

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अगर सड़कों पर बैठे लोग किसान नहीं बल्कि आतंकवादी हैं तो केंद्र सरकार ने कृषि कानूनों पर चर्चा करने के लिए उनके साथ 12 दौर की वार्ता कैसे की?
लाल किले की घटना के बाद किसानों को खालिस्तानियों और नक्सलियों के रूप में बुलाए जाने की पुनरावृत्ति हुई है। इस बारे में आपकी क्या कहेंगे तो कैप्टन ने जैसा कि मैंने पहले उल्लेख किया है, भाजपा द्वारा किसानों के कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन को कमजोर करने के लिए किसानों को सभी प्रकार के तुच्छ नामों जैसे कि खालिस्तानी, शहरी नक्सली आदि से बुलाया जा रहा है लेकिन फिर भी वे किसानों की आवाज को दबा नहीं सके तो उन्होंने लोगों को गुमराह करने और किसानों से दूर रहने और उनकी सहानुभूति हासिल करने के लिए इस तरह के हथकंडे अपनाने शुरू कर दिए।

वे तब भी सफल नहीं हुए और अब किसानों को अलग-थलग करने या इन कार्यों के साथ उनके आंदोलन को नष्ट करने में सफल नहीं होंगे। अगर सड़कों पर बैठे लोग किसान नहीं बल्कि आतंकवादी और अलगाववादी हैं तो क्या आपको लगता है कि केंद्र सरकार ने इस मुद्दे पर चर्चा करने के लिए उनके साथ 12 दौर की वार्ता की होगी? यह नामकरण केवल किसानों की इच्छा को तोड़ने के लिए भाजपा की हताशा को दर्शाता है। मैं ईमानदारी से उन्हें रुकने की सलाह दूंगा। भारत की जीवन रेखा किसानों और इसकी कृषि प्रणाली है और उन्हें नष्ट करने का मतलब देश की खाद्य सुरक्षा और आत्मनिर्भरता का अंत होगा।

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किसान शांत रहें और शरारती तत्वों को उकसाने न दें 
क्या आप गणतंत्र दिवस के दिन हुई घटना के बाद किसानों को संदेश देना चाहते हैं? इस पर कैप्टन ने कहा मैं केवल अपने किसान भाइयों से कहना चाहूंगा- शांत रहें। किसी शरारती तत्व को किसी भी तरह की प्रतिक्रिया में उकसाने न दें। शांतिपूर्ण साधनों से जुड़े रहें जो इन महीनों में आपके आंदोलन की पहचान रहे हैं और जिन्होंने दुनिया भर से आपके लिए अपार समर्थन सुनिश्चित किया है। केंद्र सरकार के साथ लगे रहो, उनसे बात करो। मुझे यकीन है कि सरकार आपकी बात को समझने और कृषि कानूनों को निरस्त करने के लिए आपके सुझाव को स्वीकार करने के लिए उत्तरदाई होगी।

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