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जजों की नियुक्ति में नहीं होगी दखलअंदाजी , कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद

  • Updated on 7/12/2019

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। सरकार ने स्पष्ट किया है कि उच्चतम न्यायालय (Supreme court) और उच्च न्यायालयों (High Court) के न्यायाधीशों (Judges) की नियुक्ति और उनके आचरण का नियमन करने संबंधी कानून का मसौदा लाने की कोई योजना नहीं है।

राज्यसभा में लिखित उत्तर दिया कानून मंत्री ने
कानून मंत्री (Law minister) रविशंकर प्रसाद (Ravi Shankar Prasad) ने गुरुवार को राज्यसभा (Rajya Sabha) में एक सवाल के लिखित जवाब में बताया कि सरकार के समक्ष इस तरह की कोई योजना विचाराधीन नहीं है। प्रसाद ने यह भी बताया कि न्यायाधीशों के नियुक्ति के लिए कोलेजियम द्वारा सुझाए गए नामों के बारे में कोई विवाद नहीं है। कांग्रेस (Congress) के राज्यसभा सदस्य विवेक तन्खा ने कानून मंत्री से पूछा था कि न्यायाधीशों की नियुक्ति और उनके आचरण को जनहित में कानून के द्वारा विनियमित करने की अनुमति देने का क्या कोई प्रस्ताव विचाराधीन है।

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इसके जवाब में प्रसाद ने कहा कि सरकार के समक्ष ऐसा कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है और न ही इस तरह की कोई संसदीय पहल की गई है। उन्होंने कहा कि इस विषय पर व्यापक विमर्श की जरूरत है और इस पर विभिन्न संवैधानिक प्राधिकारियों से मंजूरी की भी जरूरत होगी। 

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हाईकोर्ट जजों की रिटायरमेंट आयु बढ़ाने का प्रस्ताव
कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने गुरुवार को राज्यसभा में बताया कि देश के प्रधान न्यायाधीश ने उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ाने का प्रस्ताव भेजा है ताकि मामलों के लंबित होने की अवधि घटाई जा सके। हालांकि कानून मंत्री ने इस प्रश्न का जवाब नहीं दिया कि क्या सरकार उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ाने के प्रस्ताव पर विचार कर रही है या नहीं।

चीफ जस्टिस ने कानून मंत्री को भेजा प्रस्ताव
उन्होंने एक प्रश्न के लिखित जवाब में बताया कि प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई ने यह प्रस्ताव भेजा है ताकि अधिक समय तक अनुभवी न्यायाधीश उपलब्ध रहें जिससे न्यायाधीश के पदों के भरे रहने की स्थिति बेहतर हो सके और लंबित मामलों की संख्या कम हो। उव्च न्यायालय में न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति आयु को 62 से बढ़ाकर 65 साल करने के प्रावधान वाला एक संविधान संशोधन विधेयक संप्रग सरकार लोकसभा में लाई थी किंतु यह विचार या मतदान के लिए नहीं आ पाया। प्रसाद ने कहा कि एक जुलाई तक देश के 25 उच्च न्यायालयों में 403 रिक्तियां थीं। 

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मतदान को अनिवार्य बनाने की योजना नहीं
सरकार ने स्पष्ट किया है कि देश में मतदान को अनिवार्य बनाने का कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है। कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने राज्यसभा में एक सवाल के लिखित जवाब में बताया कि सरकार के पास ऐसा कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है। सदन में पूछा गया था कि मतदान को अनिवार्य तौर पर लागू करने करने के बारे में सरकार ने क्या कदम उठाए हैं। उल्लेखनीय है कि विधि आयोग ने 2015 की अपनी रिपोर्ट में अनिवार्य मतदान का विरोध करते हुए कहा था कि इसे लागू करना व्यावहारिक नहीं है। हाल ही में हुए आम चुनाव में मतदान 67.11 प्रतिशत रहा था, जबकि 2014 में मतदान 65.95 प्रतिशत था। 

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