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सियासी भंवर में फंसी सूचना आयुक्तों की नियुक्ति, सरकार व नेता प्रतिपक्ष की मंशा पर उठे सवाल

  • Updated on 6/10/2018

देहरादून/ब्यूरो। सूचना आयोग यानि एक ऐसी संस्था जिसका गठन ‘सुशासन और पारदर्शी प्रशासन’ के उद्देश्य से किया गया है। इस संस्था से सियासत का दूर-दूर तक वास्ता नहीं होना चाहिए, लेकिन सच इसके उलट है। आयोग के आयुक्त पदों पर समय से नियुक्ति में भले ही सरकार की कोई दिलचस्पी न हो, पर इन नियुक्तियों में राजनीति हमेशा हावी रहती है। बेवजह की सियासत के कारण ही मौजूदा समय में सूचना आयोग में शिकायतों की सुनवाई ठप पड़ी हुई है।

उत्तराखंड सूचना आयोग में मुख्य सूचना आयुक्त को मिलाकर अधिकतम 10 सूचना आयुक्तों की तैनाती का प्रावधान है। आवश्यकता को देखते हुए अभी तक यहां अधिकतम 6 आयुक्त तैनात रहे हैं। इनमें मुख्य सूचना आयुक्त भी शामिल हैं। इनमें से पिछले दो वर्ष के दौरान एक-एक कर पांचों सूचना आयुक्त अपना कार्यकाल पूरा कर चुके हैं। लिहाजा मौजूदा समय में आयोग में सिर्फ मुख्य सूचना आयुक्त तैनात हैं। पीठ का कोरम पूरा न होने से आयोग में बीते कुछ दिनों से शिकायतों की सुनवाई बंद है। ऐसी नौबत इसलिए आई क्योंकि एक तो सरकार ने समय रहते सूचना आयुक्तों के खाली पदों पर नई नियुक्तियां नहीं की। अब नियुक्ति प्रक्रिया शुरू हुई, तो उसमें राजनीति हावी हो गई है।  

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दरअसल, सूचना आयुक्तों की नियुक्ति के लिए गठित चयन समिति में मुख्यमंत्री, मंत्रिमंडल का एक सदस्य व नेता प्रतिपक्ष शामिल होते हैं। तीनों के एक राय होने पर ही आयुक्तों की नियुक्ति होती है। लेकिन अमूमन होता यह है कि अपने चहेतों को आयुक्त बनाने में सरकार और नेता प्रतिपक्ष में पूरी जोर आजमाइश होती रहती है। बार-बार इसका नतीजा चयन समिति की बैठक टलने के रूप में सामने आता है। पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार में चयन समिति की बैठक पांच बार टली थी, जबकि त्रिवेंद्र सरकार में यह बैठक तीन बार टल चुकी है या बेनतीजा रही है।

नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश ने कहा कि मेरा सिर्फ इतना कहना है कि सूचना आयुक्त की नियुक्ति मेरिट के आधार पर होनी चाहिए, ताकि योग्य दावेदारों को ही मौका मिले। वहीं चयन समिति के सदस्य मदन कौशिक का कहना है कि सूचना आयुक्त के दो पदों के लिए 139 आवेदन आए हैं। इनमें से सुयोग्य दावेदारों के चयन की प्रकिया चल रही है। राजनीति से इसका कोई लेना-देना नहीं।

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