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भारतीय अखंडता को मिली मजबूती, जानें... अनु. 370 से जुड़े विपक्ष के सवालों के जवाब

  • Updated on 8/8/2019

भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने अपना नाम इतिहास में उस क्षण दर्ज करवा लिया जब मंगलवार को लोकसभा में जम्मू- कश्मीर पुनर्गठन बिल (Jammu Kashmir Reorganization bill) पास हुआ। भारत को पूर्ण रूप से अखंड बना दिया गया। इस बिल के पारित होने के बाद भारत की अखंडता को मजबूती मिली है। लेकिन अनुच्छेद 370 को हटाने और जम्मू-कश्मीर पुर्गठन बिल लाने को लेकर कई लोगों के मन में बहुत से सवाल हैं। उन सवालों का उत्तर देने की कोशिश इस लेख से की है। 

इतनी जल्दी भी क्या थी? ऐसे भी क्या हालात हो गए थे कश्मीर में?

70 साल से अनुच्छेद 370 का दंश कश्मीर के साथ- साथ भारत भी झेल रहा है। आजादी के बाद देश में जितना भी विकास हुआ कश्मीर में उसका कितना प्रतिशत विकास हुआ इसकी बानगी वहां के हालात देते हैं। सिर्फ कश्मीर ही नहीं पूरा भारत वहां के नौजवानों की और भारतीय सेना के जवानों की दुर्गती देख बिलख उठता था। सेना के जवानों के चीथड़े, कश्मीरी युवाओं का आतंक के रास्ते पर चले जाना, पैलेट गन के प्रहार से लहूलुहान युवाओं के शरीर, उनकी संकुचित सोच, अपनी देश की सेना पर अपने ही देश के युवाओं का पत्थर चलाना। स्वर्ग जैसी धरती का हर रोज रक्तरंजित हो जाना। ये सब देख भारत माता का दिल भी क्षत-विक्षत हो जाता था। किससे किसकी लड़ाई और क्यों? इतना सब होने के बाद आप कहते हैं कि इतनी भी क्या जल्दी थी। ऐसा भी क्या हो गया कश्मीर में। और क्या होना बाकी रह गया था कश्मीर में?

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'370 को हटाना संवैधानिक त्रासदी, लोकतंत्र की हत्या हुई'
लोकतांत्रिक देश में इस प्रकार से कानून बनाना गलत है। मैं भी मानती हूं। लेकिन इसके अलावा और कोई विकल्प था आपके पास? हमारे संविधान का अनुच्छेद 123 राष्ट्रपति को अध्यादेश लाकर कानून बनाने का अधिकार देता है। केंद्र ने इसका योजनाबद्ध तरीके से उपयोग किया। राष्ट्रपति की मंजूरी से कानून लाया गया। उसके बाद उसे राज्यसभा और लोकसभा में पारित किया गया। तो किस प्रकार से ये असंवैधानिक हुआ।

अनुच्छेद 370 तो पहले से ही (1949 में) अस्थायी तौर पर लाया गया था। इसको तो बहुत पहले ही समाप्त किया जाना चाहिए था। अगर इसको अन्य प्रस्तावों की तरह लाया जाता तो ये असंभव था। कश्मीरी नेता इसके लिए कभी भी तैयार नहीं होता। उल्टा कश्मीर में उन्माद फैल सकता था। तनाव बढ़कर दंगों का रूप ले सकता था। जिसका व्यपाक असर पूरे देश में भी पड़त सकता था। कई मासूमों की जानें जा सकती थी। इसलिए सुरक्षा के लिहाज से कश्मीर में धारा 144 को लगाना सरकार के लिए लाजमी हो गया और जम्मू- कश्मीर के लोगों की सुरक्षा के मद्देनजर ही सेना की तैनाती भी की गई। 

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मसले पर संवेदना बरतने की जरूरत
कुछ लोगों का मानना है कि इस फैसले के बाद वहां का महौल अशांति पूर्ण हो जाएगा। तो उनसे ये प्रश्न है कि इससे पहले कश्मीर के हालात बहुत शांतिपूर्ण थे क्या? केंद्र सरकार ने फैसला लिया है तो उसकी जिम्म्दारी भी बनती है। एक नागरिक भी आहत न होने पाए। प्यार से लोगों को समझाया जाए कि ये जो कुछ किया गया है उनके भले के लिए है। संसद में धारा 370 को खत्म करने का प्रस्ताव पेश किए जाने के साथ ही सोशल मीडिया पर कश्मीर में जमीन खरीदने..., कश्मीरी लड़कियों से शादी करने.... जैसे मजाक लोकप्रिय हो रहे हैं जो निंदनीय है। ये पूरे देश की जिम्मेदारी बनती है कि कश्मीर के लोगों के मन में ये विश्वास पैदा करें कि उनसे उनके अधिकार छीने नहीं गए हैं। बल्की पूरा भारत उनको दिया है। सब उनके साथ हैं। उनका हक कोई नहीं छीन रहा है।

जम्मू कश्मीर की तुलना उत्तर प्रदेश से करना तर्क नहीं कुतर्क है
उत्तर प्रदेश की तुलना आप कश्मीर के साथ कैसे कर सकते हैं? कश्मीर संपूर्ण भारत की सुरक्षा के लिहाज से एक अलग राज्य है। चीन और पाकिस्तान जैसे देशों की सीमाओं से लगा हुआ है। वर्तमान में जब सभी राष्ट्र अपने देश की सीमाओं को मजबूत कर रहे हैं, तब देश की सुरक्षा के लिए ये निर्णय जरुरी था। मध्यस्ता के लिए आतुर हो रहे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को संदेश भी दिया गया कि भारत अपने देश हित में फैसले लेने में पूरी तरह सक्षम है। 

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'बीजेपी ने ये निर्णय केवल वोट बैंक की राजनीति के लिए लिया है'
लिया होगा। लेकिन ये देश हित में है। भारत एक लोकतांत्रिक देश है। अगर कश्मीर की सुरक्षा में चूक होती है तो बीजेपी को औंधे मुह गिराने की ताकत भी इसी लोकतंत्र में नीहित है। किसी भी नेता को अपना भगवान मत बनाइए। उन्होंने जो भी किया ये उनका कर्तव्य है। इसलिए सवा सौ करोड़ की जनता ने उन्हें चुना है। आंख, नाक, कान सब खुले रखिए। देखिए और जांचिए। सरकार की गलती पर एक जुट होकर आवाज उठाइए। अपनी विचारधारा के हिसाब से हर परिस्थिति को देखना सही नहीं है। सरकार भी इस बात का ध्यान रखे कि बहुत साहसिक कदम उठाने के बाद जिम्मेदारी भी बहुत बड़ी आई है। हर एक कदम संभल कर रखना होगा। वरना भारतीय लोकतंत्र में ‘किसी को बख्शा नहीं जाएगा’

लेखिका: कामिनी बिष्ट

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है। 

 

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