Tuesday, Nov 30, 2021
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150 साल बाद फिर जोडा गया था अशोक स्तंभ

  • Updated on 10/28/2021

नई दिल्ली। अनामिका सिंह। भारत की विरासत को एकत्र करके ही हम अपने इतिहास की गाथा को लिख सकते हैं। यही वजह रही होगी कि जब पांच टुकडों में टूटे अशोक स्तंभ की ऐतिहासिकता को समझते हुए उसे दोबारा 150 साल बाद जोडा गया। हालांकि आज तक इसके 5 टुकडों में विभाजन का सटीक पता इतिहासकार नहीं लगा पाए हैं।
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अशोक स्तंभ रखा था अंग्रेज साहब फेजर की कोठी पर 
इतिहासकारों का कहना है कि 18वीं शताब्दी के शुरूआत के दौरान जब दिल्ली में फर्रूखसियर का राज था तब बारूद या बम के चलते ये अशोक स्तंभ खंडित हो गया था। यही नहीं तकरीबन 150 सालों तक अशोक स्तंभ मौसम की मार सहता हुआ वहीं पडा रहा और उसके कुछ सालों बाद उसे ले जाकर एक अंग्रेज साहब जिनका नाम फेजर था उनकी कोठी पर रख दिया गया। ध्यान ना दिए जाने की वजह से अशोक स्तंभ पर लिखे शिलालेख धूंधले पड गए। बताया जाता है कि यह स्तंभ 33 फुट लंबा और 3 फुट 1 इंच गोलाई में था। हालांकि आज इसकी लंबाई मात्र 10 मीटर रह गई है। जब साल 1838 में फेजर की कोठी को हिंदू मराठाओं ने खरीदा तो उन्होंने इसके साथ अशोक स्तंभ के टूटे हुए टुकडों को भी खरीद लिया था। इस कोठी को वर्तमान में हिंदूबाडाराव अस्पताल के नाम से जाना जाता है।
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मराठे महत्व तो समझे लेकिन स्तंभ किसका है यह नहीं जान पाए
कई इतिहासकारों का कहना है कि मराठों ने जब पहली बार अशोक स्तंभ के टुकडों को देखा तो वो इसकी ऐतिहासिकता तो समझ गए लेकिन यह है किसका स्तंभ इसकी जानकारी उन्हें नहीं हुई। जिसके चलते कई सालों तक कोठी के एक कोने में यह स्तंभ पडा रहा। 

1866 में अशोक स्तंभ होने का पता चला
1857 के विद्रोह के बाद जब पूरा इलाका दोबारा अंग्रेजों के कब्जे में चला गया तो उनके लिए भी स्तंभ के 5 टुकडे कौतूहल का विषय बने रहे। साल 1866 में इन टुकडों पर लिखे अभिलेखों के अंश को आरी से काटकर एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल को भेजा गया। वहां इसके अशोक स्तंभ होने का खुलासा हुआ और साल 1867 में इसे दोबारा कुश्क-ए-शिकार महल पर स्थापित कर दिया गया, जहां आज भी यह स्थित है।
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आंशिक रूप से दिखती है सम्राट अशोक की राजाज्ञा
इस स्तंभ को काफी नुकसान सहना पडा है। यही वजह है कि अशोक की राजाज्ञा पहली से पांचवी तक आंशिक रूप से यहां उल्लिखित है। लेकिन उसके ऊपर लगा प्लास्टर पूरी तरह से बर्बाद हो गया है जिससे राजाज्ञा यानि ब्राहमी लिपि में लिखे शिलालेख कहीं-कहीं ही देखने को मिलते हैं। इसके संरक्षण का कार्य भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) कर रहा है।

कौन लाया था अशोक स्तंभ को यहां
ब्रज किशन चांदीवाल अपनी पुस्तक में लिखते हैं कि ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार 1375 ईसवीं में फिरोजशाह के बेटे फतहखां की मृत्यु होने के बाद वो पुत्र वियोग में डूब गया। उसके उमराओं ने उसे समझाया कि राज-काट जरूरी है। ऐसे में उसने अपना मन बहलाने के लिए शिकार करना शुरू किया और कुश्क-ए-शिकार नाम से महल बनवाया और उस पर मेरठ से लाए गए दूसरे अशोक स्तंभ को स्थापित करवाया। यह महल पहाडी पर इतनी ऊंचाई पर बनाया गया था कि पहले दूर से ही अशोक स्तंभ दिख जाया करता था।

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