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पहली बार नहीं टूटा BJP-SHIVSENA का गठबंधन, जानें पूरा इतिहास

  • Updated on 11/11/2019

नई दिल्ली/ टीम डिजिटल। महाराष्ट्र (Maharashtra) के चुनाव परिणाम आने के बाद किसी ने नहीं सोचा होगा कि राज्य  में सरकार बनाने वाले बीजेपी-शिवसेना गठबंधन (alliance) का हाल ऐसा होगा कि दोनों एक-दूसरे का चेहरा देखना तक पसंद नहीं करेंगे। वैसे यह तो पूर्वानुमानित था कि बीजेपी (BJP) और शिवसेना (Shivsena) गठबंधन की उम्र ज्यादा नहीं बची है मगर यह मालूम ना था कि वह इस मोड़ पर आकर धराशायी होगा। 


लेकिन ऐसा पहली बार नहीं है जब यह गठबंधन टूटा हो इतिहास में इससे पहले भी यह गठबंधन टूटता बनता रहा है आइए हम आपको बताते है कि ऐसा कब-कब और क्यों हुआ है ?  

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1889 में पहली बार आए साथ
बता दें कि भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना का गठबंधन पहली बार 1989 में हुआ था जब राम मंदिर (Ram mandir) आंदोलन का दौर चल रहा था दोनों पार्टियों के गठबंधन के बाद एक बाद महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनाव (loksabha election) लड़ा जिसका फायदा दोनों पार्टियों को खूब मिला और दोनों की सीटों में इजाफा देखा गया। 


1991 में BMC चुनाव अलग-अलग लड़ा 
लोकसभा और विधानसभा चुनाव को एक साथ लड़ने वाली पार्टी स्थानीय चुनाव (BMC) में अलग हो गई और शिवसेना को छगन भुजबल (Chhagan Bhujbal) ने छोड़ दिया। जिस पर बाला साहेब ठाकरे (Bal Thackeray) की नाराजगी सामने आयी थी।

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1995 में फिर आए एक साथ
1995 में शिवसेना और बीजेपी फिर एक साथ आए क्योंकि राज्य में कांग्रेस (Congress) सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। तब दूसरी बड़ी पार्टी शिवसेना को बीजेपी ने अपना समर्थन दिया और दोनों ने मिलकर सरकार बनाई। इसके राज्य दोनों में केन्द्र में भी सहमति बनी और अटल बिहारी वाजपेयी (Atal Bihari Vajpayee) सरकार में शिवसेना के नेताओं को भी जगह मिली। 

लम्बे समय तक रहे विपक्ष में
साल 1999 के बाद बीजेपी और शिवसेना लम्बे समय तक विपक्ष में रहे थे वह साल  2004 से 2014 तक जब कांग्रेस की सरकार रही थी तो दोनों पार्टियां एकजुट होकर विपक्ष में ही रही थी। 2014 में एक बार बीजेपी और शिवसेना फिर से अलग-अलग चुनाव लड़े लेकिन परिणाम आने के बाद दोनों दल फिर एक साथ आ गए। लेकिन सेना सरकार की किसान, नोटबंदी (Notebandi) और जीएसटी (GST) जैसे मुद्दों पर आलोचना करती रही है। |

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2019 में फिर एक बार सामने आयी कटुता
2019 के विधानसभा चुनाव के परिणाम आन के बाद बीजेपी को 105 और शिवसेना को 56 और एनसीपी को 54, कांग्रेस को 44 सीटें मिली थी। जिस कारण बीजेपी सरकार से दूर रह गई थी। और शिवसेना ढाई-ढाई साल के मुख्यमंत्री (Chief minister) के लिए अपने वादे को याद दिलाना शुरु कर दिया, जिस पर बीजेपी राजी नहीं हुई और दोनों पार्टियों का गठबंधन एक बार फिर से टूट गया।   

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