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अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से जस्टिस गांगुली हुए बेहद परेशान, जाहिर किए जज्बात

  • Updated on 11/11/2019

नई दिल्ली/ टीम डिजिटल। अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर शीर्ष अदालत के सेवानिवृत न्यायधीश अशोक कुमार गांगुली ने कई गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर संशय और अपनी परेशानी को जाहिर किया है। उन्होंने साफ कहा कि वह इस फैसले से “बेहद परेशान” हैं। 2012 में 2जी स्पेक्ट्रम मामले में फैसला सुनाने वाले 72 वर्षीय जस्टिस गांगुली ने कहा, “अल्पसंख्यकों ने कई पीढ़ियों से देखा है कि वहां एक मस्जिद थी। फिर इसे ढहा दिया गया। अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक उसके ऊपर मंदिर बनाया जा रहा है। इससे मेरे मन में शंका हुई है...संविधान के एक स्टूडेंट के रूप में मेरे लिए इसे मानना थोड़ा मुश्किल है।" 

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उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय में कहा गया है कि किसी जगह पर जब नमाज अता की जाती है तो नमाजी के इस भरोसे को चुनौती नहीं दी जा सकती है कि वहां मसजिद है। जस्टिस गांगुली ने आगे कहा, 'माना 1856-57 में नहीं तो, 1949 से वहां निश्चित रूप से नमाज पढ़ी जा रही थी, इसके सबूत भी हैं। इसलिए जब हमारा संविधान अस्तित्व में आया तब वहां नमाज पढ़ी जाती थी। एक जगह जहां नमाज पढ़ी जाती है, वह जगह अगर मस्जिद मानी जाती है तो अल्पसंख्यक समुदाय को उसके धर्म की स्वतंत्रता की रक्षा करने का राइट है। यह एक बुनियादी राइट है, जिसे संविधान की गारंटी है।' 

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रिटायर्ड जज ने कहा, 'इस हालात में आज एक मुस्लिम क्या देख रहा है? वहां कई सालों से एक मसजिद थी, जिसे गिरा दिया गया। अब अदालत वहां मंदिर बनाने की अनुमति दे रही है और यह इस निष्कर्ष है कि वह जगह राम लला की है। क्या सुप्रीम कोर्ट सदियों पहले के भूमि स्वामित्व के केस तय करेगी? क्या सुप्रीम कोर्ट इसे नजरअंदाज कर सकती है कि वहां लंबे समय तक मस्जिद थी और जब संविधान बना तो मस्जिद वहीं थी?”

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जस्टिस गांगुली ने आगे कहा, 'संविधान और उसके प्रावधानों में सुप्रीम कोर्ट का यह दायित्व है कि वो इसकी रक्षा करे।” पूर्व जस्टिस ने कहा, 'संविधान से पहले जो था, उसे अपनाया जाए यह संविधान का दायित्व नहीं है। उस वक्त भारत लोकतांत्रिक गणराज्य नहीं था। उस वक्त कहां मस्जिद थी, कहां मंदिर था, किधर बुद्ध स्तूप था, कहां चर्च था....अगर हम ऐसे निर्णय करने चलेंगे तो कई सारे मंदिर और मस्जिद और अन्य ढांचें को गिराना पड़ेगा। हम पौराणिक ‘तथ्यों’ में नहीं जा सकते हैं। राम कौन हैं? क्या ऐतिहासिक तौर पर साबित कोई हालात है? यह आस्था का मामला है।'

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उन्होंने कहा, 'शीर्ष अदालत ने कहा है कि आस्था के आधार पर किसा को कोई प्राथमिकता नहीं मिल सकती है। उनका कहना है कि मस्जिद के नीचे, वहां ढांचा था, लेकिन वह ढांचा मंदिर नहीं था। कोई नहीं कह सकता है कि मंदिर गिराकर मस्जिद बनाई गई थी। अब मस्जिद को गिराकर मंदिर बनाया जा रहा है।' 

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जस्टिस गांगुली ने सवाल उठाया, '500 वर्ष पहले भूमि का मालिक कौन था, क्या किसी को मालूम है? हम इतिहास को दोबारा नहीं लिख सकते। कोर्ट का दायित्व है कि जो भी है, उसका संरक्षण किया जाए। जो हैं उसके अधिकारों को संरक्षण मिले। इतिहास को फिर से बनाने की जिम्मेदारी कोर्ट की नहीं है। 5 सदी पहले वहां क्या था, उसे जानने की अपेक्षा कोर्ट से नहीं की जा सकती है। 

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जस्टिस गांगुली ने दलील दी कि कोर्ट को कहना चाहिए कि वहां मस्जिद थी - जो फैक्ट है। यह कोई ऐतिहासिक तथ्य नहीं है – एक फैक्ट है, जिसे हरेक ने देखा है। इसे गिराया जाना हरेक ने देखा है। उसे फिर से बनाया जाना जाना चाहिए। अगर उन्हें मस्जिद पाने का राइट नहीं है तो कैसे आप सरकार को निर्देश दे रहे हैं कि मस्जिद बनाने के लिए 5 एकड़ भूमि दी जाए? आखिर क्यों? आप मान रहे हैं कि मस्जिद गिराना ठीक नहीं था।'

यह पूछे जाने पर कि उनकी नजर में उचित निर्णय क्या होता? इस पर जस्टिस गांगुली ने कहा, 'दोनों में से कोई एक। मैंने या तो उस जगह पर मस्जिद बनाने का आदेश दिया होता या फिर यह विवादित जगह थी, तो मेरा निर्णय होता, 'उस जगह पर ना ही मस्जिद बने ना ना मंदिर’। वहां पर आप एक अस्पताल या स्कूल या कुछ और बना सकते हैं। मस्जिद और मंदिर अलग- अलग जगहों पर बनाइए।'

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जस्टिस गांगुली ने साफ कहा, 'उस विवादित स्थल को हिंदुओं को नहीं दिया जा सकता है। यह विश्व हिंदू परिषद या बजरंग दल का दावा है। वे आज अगर किसी भी मस्जिद, किसी भी चीज को ढहा दें, फिर। उन्हें सरकार का सपोर्ट मिल रहा था, अब उन्हें न्यायपालिका का सपोर्ट भी मिल रहा है। मैं बहुत ज्यादा परेशान हूं। लोग इन बातों को इतनी साफगोई से नहीं कहने वाले हैं।'

आलेख वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की फेसबुक से साभार। 
 

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