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badrinath three locks are placed on the prisoners

बद्रीनाथ: कपाट बंदी पर लगाए जाते हैं तीन ताले, जानें

  • Updated on 11/30/2019

देहरादून/ ब्यूरो: चारधाम (Chardham) श्राइन बोर्ड के गठन के सरकार के फैसले बाद मंदिर से जुड़े हक-हकूकधारियों और तीर्थ पुरोहित समाज गुस्से में हैं। सरकार का फैसला विवाद में पड़ते ही चारधाम से जुड़े हक-हकूकों पर चर्चा शुरू हो गई है। इन चर्चाओं के बीच कई दिलचस्प परम्पराओं की जानकारी सामने आ रही हैं। इनमें से एक परम्परा मोक्षधाम बद्रीनाथ (Badrinath) से जुड़ी हुई है।

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कपाट पर एक नहीं तीन ताले लगाये जाते हैं

परम्परा के मुताबिक यात्राकाल समाप्त होने के बाद जब बद्रीनाथ धाम के कपाट बंद होते हैं तो उस दिन मंदिर के कपाट पर एक नहीं तीन ताले लगाये जाते हैं। ऐसा चोरी के डर से नहीं किया जाता बल्कि तीन ताले यह दर्शाने के लिये लगाये जाते हैं कि बद्रीविशाल के मंदिर से जुड़ी व्यवस्थाओं पर हक-हकूकधारियों का किस हद तक अधिकार है। दरअसल, बद्रीनाथ धाम से 21 किलोमीटर पहले राष्ट्रीय राजमार्ग पर पाण्डुकेश्वर गांव स्थित है। इस गांव में दो थोक हैं, भण्डारी थोक और मेहता थोक। इन दोनों थोक के परिवारों के बद्रीनाथ मंदिर से हक-हकूक जुड़े हुए हैं। बद्रीपुरी को बसाने के लिये पाण्डुकेश्वर गांव के मेहता और भण्डारी जाति के लोगों ने लगभग 226 नाली जमीन मंदिर प्रबंधन को समय-समय पर दान दी। मौजूदा समय में यह जमीन श्रीबद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति की सम्पत्ति है।

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मंदिर से जुड़ी व्यवस्थाएं चाक-चौबंद

कहा जाता है कि गांव के बुजुर्गों ने बद्रीनाथ धाम को अपनी सम्पत्ति इसलिये दान दी ताकि भविष्य में मंदिर से जुड़ी व्यवस्थाएं चाक-चौबंद रह सके और पीढ़ी दर पीढ़ी उनके हक-हकूक भी बरकरार रहें। एक तरह से मेहता और भण्डारी थोक का मंदिर प्रबंधन के बराबर ही मंदिर पर अधिकार माना जाता रहा है। यही वजह है कि कपाट बंद होने के दिन मंदिर के मुख्य द्वार पर तीन ताले लगाये जाते हैं, जिनमें से एक-एक ताले की चाबियां मेहता थोक, भण्डारी थोक और श्रीबद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति के पास होती है। कपाट खुलने के दिन तीनों के प्रतिनिधि मौजूद रहते हैं। तीनों चाबियों की विशेष पूजा होती है और फिर उनसे द्वार पर लगे ताले खोल दिये जाते हैं।

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‘कपाट बंद होने के दिन श्रीबद्रीनाथ मंदिर के मुख्य द्वार पर तीन ताले लगाये जाने का सम्बंध मंदिर से जुड़ी व्यवस्थाओं पर अधिकार से है। चारों धाम परम्परा, धार्मिक मान्यता और हक-हकूक से संचालित होते हैं। सरकार सैकड़ों वर्षों से चली आ रही इस व्यवस्था से छेड़छाड़ करेगी तो उसे बर्दाश्त नहीं किया जायेगा’।

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