Tuesday, Oct 26, 2021
-->
baolis-and-water-sources-create-several-cities-in-delhi

बावलियों और जल स्त्रोतों ने बनाए दिल्ली में कई शहर

  • Updated on 9/25/2021

नई दिल्ली। अनामिका सिंह। किसी ने सच ही कहा है ‘जल है तो जीवन है’ या फिर कि ‘अगला विश्वयुद्ध जल के लिए लडा जाएगा’। पानी का महत्व वर्तमान में ही नहीं बल्कि हमेशा से रहा है। यदि हम दिल्ली के इतिहास को खंगालें तो पाएंगे कि दिल्ली में कई शहरों के निर्माण की वजह जलस्त्रोतों का होना ही था। हिंदू राजा अनंगपाल तोमर हो या फिर अलाउद्दीन खिलजी, मुहम्मद बिन तुगलक या फिर शाहजहां सबने अपने शहर का विस्तार वहीं किया जहां जलस्त्रोत नजदीक मिला। यही वजह है कि दिल्ली के इतिहास की जब भी बात की जाती है तो जगह-जगह बनवाई गई बावलियों का जिक्र भी जरूर आता है। आइए जानते हैं दिल्ली की कुछ ऐतिहासिक बावलियों के बारे में, इनमें से कुछ ऐसी भी बावलियां हैं जो शहरीकरण के चलते जमीनदोज हो गईं हैं।
जो था कभी शहर फिरोजाबाद........अब दिखते हैं अवशेष

खारी बावली: एशिया की सबसे बडी थोक बाजार खारी बावली जोकि खारे पानी की बावली के नाम से मशहूर थी अब वहां सिर्फ बावली का नाम ही रह गया है। जबकि बावली वक्त के थपेडों के साथ कही गुम हो गई है। कहा जाता है कि शेरशाह सूरी के पुत्र इस्लाम शाह के शासनकाल में ख्वाजा अब्दुल्ला लाजर कुरैशी ने खारी बावली कुएं की नींव रखी थी जोकि साल 1551 में बनकर तैयार हुआ।

राजाओं की बावली: साल 1516 में सिकंदर लोदी के शासनकाल में दौलत खान ने महरौली में बावली का निर्माण करवाया, उस समय बावडी के करीब ही एक मस्जिद का भी निर्माण हो रहा था और इस मस्जिद में काम करने वालों के लिए इस बावली को बनवाया गया था, जिसे राजाओं की बावली कहा जाता है। दरअसल यमुना नदी से काफी दूर होने की वजह से लोगों को पानी की परेशानी ना हो इसलिए चार मंजिला बावली बनवाई गई।
अपनों ने छोडा अस्थियों को लावारिस, फोरम करेगी गयाजी जाकर पिंडदान

उग्रसेन की बावली: बाराखंभा मेट्रो स्टेशन से चंद दूरी पर ही बनी है उग्रसेन या अग्रसेन की बावली। हैली रोड पर बनी इस बावली को महाभारत काल में राजा अग्रसेन से जोडा जाता है जिसका जीर्णोद्धार उन्हीं के वंशजों ने 13वीं या 14वीं शताब्दी में करवाया था। तीन मंजिला बावली वास्तुकला की दृष्टि से काफी सुंदर है। हालांकि इसकी बनावट तुगलक या लोदी वंश से संबंधित है।

गंधक की बावली: इसका निर्माण गुलाम वंश के शासक इल्तुतमिश ने करवाया था। कहा जाता है कि यह उसने बख्तियार काकी के कहने पर किया था जो एक सूफी संत थीं। बताया जाता है कि उस समय यह पांच स्तरीय संरचना पर आधारित बावली महरौली के लोगों की प्यास बुझाया करती थी। गंधक की बावली को दिल्ली की सबसे पुरानी बावली इतिहासकार मानते हैं।
इस बावली के पानी से जल उठे थे चिराग

द्वारका बावली: द्वारका सेक्टर 12 में लोहारहेडी नामक गांव था जो अब इस उपनगरी में गुम हो गया है। वहां 16वीं शताब्दी में लोदी वंश के सुल्तानों द्वारा गांव के निवासियों के लिए बावली खुदवाई गई थी जिसे लोहारहेडी बावली के नाम से जाना जाता है। यह बावली तीन मंजिला बनी हुई है और हाल ही में इसका संरक्षण दिल्ली सरकार ने इंटेक से करवाया है।

पालम की बावली: 13वीं शताब्दी में पालम गांव में एक सीढीदार बावली हुआ करती थी। यहां से एक अभिलेख मिला था जिसपर पहली बार ढिल्लाी यानि दिल्ली का उल्लेख मिला था। कहा जाता है कि ढिल्लाी के एक व्यक्ति उद्वार ने पालम में एक बावली बनवाई थी, इस अभिलेख की तिथि 1272 ईसवीं बताई गई है। उस समय गयासुद्दीन बलबन का दिल्ली पर राज था।
सतीश उपाध्याय ने दी हाइफा के वीर जवानों को श्रद्धांजलि

निजामुद्दीन की बावली: सुफी संत निजामुद्दीन औलिया ने गयासुद्दीन तुगलक के समयकाल यानि 14वीं शताब्दी में एक बावली का निर्माण करवाया था जोकि उनकी दरगाह के पास ही स्थित है। आज भी इस बावली का प्रयोग किया जा रहा है। यहा दरगाह पर माथा टेकने आए श्रद्धालुओं द्वारा बावली के पानी को इबादत के रूप में प्रयोग किया जाता है।

औरंगजेब की बावली: आदित्य अवस्थी की किताब ‘नीली दिल्ली, प्यासी दिल्ली’ में औरंगजेब की बावली का जिक्रा मिलता है। जिसे बहादुरशाह द्वितीय के महल के पश्चिम में करीब 36 फीट की दूरी पर बताया जाता है हालांकि अब इस 130 फीट लंबी और 36 फीट बावली का नामो-निशान नहीं है। इसका प्रयोग सिर्फ सरकारी जमीन के रूप में कागजों पर दर्ज किया गया है।
विशाखा ने लिया नई दिल्ली इलाके का जायजा

बाडा हिंदूराव की बावली: उत्तरी दिल्ली में सिविल लाइंस क्षेत्र में हिंदूराव मार्ग पर बावली बनी हुई है, जिसे 14वीं शताब्दी में फिरोजशाह तुगलक के शासनकाल में बनवाया गया था। इस बावली के चारों ओर कक्ष बने हुए हैं लेकिन इसकी स्थिति काफी खराब है। हाल ही में इस बावली का संरक्षण एएसआई ने करवाया है। इतिहासकार बताते हैं कि इस बावली का प्रयोग 1857 में ब्रिटिश सेना के जवान पानी पीने के लिए किया करते थे।

अनंगताल बावली: अनंगताल बावली कुतुबमीनार के पास बनी हुई है जिसे 10वीं शताब्दी में तोमर वंश के राजपूत राजा अनंगपाल द्वितीय ने बनवाया था। बताते हैं कि अलाउद्दीन खिलजी ने अलाई मीनार बनाने के दिर मोर्टार के लिए इस बावली के पानी का प्रयोग किया था।
अपने भीतर ऐतिहासिक धरोहरों को समेटे है दिल्ली की उत्तरी रिज

फिरोजशाह कोटला की बावली: फिरोजशाह तुगलक ने फिरोजाबाद के निर्माण के दौरान एक बावली का निर्माण करवाया था जोकि गोलाकार आकार की दिल्ली में एकमात्र बावली है। इसका व्यास में नाप 33 मीटर और भीतर से 9 मीटर है। क्षेत्रफल के हिसाब से यह दिल्ली की सबसे बडी बावली है। इसमें कई कमरें भी हैं जिसका उपयोग सुलतान गर्मी के दोरान किया करते थे। अब इस बावली को एएसआई ने बंद कर दिया है।

लालकिले की बावली: लालकिले में शाहजहां द्वारा बनवाई गई दो बावलियां हैं। जिनका उपयोग मुगलकाल के दौरान पानी पीने के लिए किया जाता था। काफी समय तक बंद रहने के बाद एएसआई ने इनका दोबारा जीर्णोद्धार करवाया और अब इन बावलियों का इस्तेमाल एएसआई के उद्यान विभाग द्वारा लालकिले को हरा-भरा बनाने के लिए किया जा रहा है।
 

Hindi News से जुड़े अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक पर ज्वॉइन करें, ट्विटर पर फॉलो करें।हर पल अपडेट रहने के लिए NT APP डाउनलोड करें। ANDROID लिंक और iOS लिंक।
comments

.
.
.
.
.