Saturday, Apr 20, 2019

भारत में संतानों की उपेक्षा से लोग हो रहे समय से पहले बूढ़े व बीमार 

  • Updated on 4/5/2019

पुराने समय में माता-पिता के एक ही आदेश पर संतानें सब कुछ करने को तैयार रहती थीं परंतु आज के जमाने में संतानें अपनी शादी के बाद अपने माता-पिता की ओर से आंखें फेर लेती हैं।

उनका एकमात्र उद्देश्य किसी न किसी तरह उनकी सम्पत्ति पर कब्जा करना ही रह जाता है जिस कारण बुजुर्ग अनेक समस्याओं का शिकार हो रहे हैं। 

इसीलिए हम अपने लेखों में बार-बार लिखते रहते हैं कि माता-पिता अपनी सम्पत्ति की वसीयत तो अपने बच्चों के नाम अवश्य कर दें परंतु उनके नाम ट्रांसफर न करें। ऐसा करके वे अपने जीवन की संध्या में आने वाली अनेक परेशानियों से बच सकते हैं परंतु आमतौर पर वे यह भूल कर बैठते हैं जिसका खमियाजा उन्हें अपने शेष जीवन में भुगतना पड़ता है।

कुछ समय पूर्व दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा करवाए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार दिल्ली के 50 प्रतिशत से अधिक वरिष्ठï नागरिक अपनी संतानों द्वारा अनादर एवं उपेक्षा के शिकार हो रहे हैं।

सर्वेक्षण में शामिल 75 प्रतिशत बुजुर्गों ने कहा कि सामाजिक ताने-बाने में बदलाव, पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव और जीवन के प्रति व्यक्तिवादी व पदार्थवादी दृष्टिïकोण के चलते आजकल बच्चे अपने बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल नहीं करते जिससे वे अनेक मानसिक-शारीरिक बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। अन्य राज्य भी लगभग ऐसी ही स्थिति में हैं।

इसी बीच अमरीका के वाशिंगटन विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने कहा है कि भारत के लोग जापान व स्विट्जरलैंड में रहने वाले लोगों की तुलना में अधिक जल्दी बुढ़ापे या उम्र संबंधी स्वास्थ्य समस्याएं अनुभव करने लगते हैं। 

‘द लांसेट पब्लिक हैल्थ’ नामक पत्रिका में प्रकाशित अपनी तरह के इस पहले अध्ययन में रहस्योद्घाटन किया गया है कि जापान और स्विटजरलैंड जैसे देशों की तुलना में भारत में रहने वाले लोग जल्दी बूढ़े हो रहे हैं।
रिपोर्ट के अनुसार भारत में रहने वाले लोग 60 वर्ष की आयु में ही उम्र संबंधी उन समस्याओं का सामना करने लगते हैं जिनका अनुभव जापानी और स्विस लोगों को 76 वर्ष की आयु में होता है। 

यही नहीं, हाल ही में ‘जर्नल ऑफ द अमेरिकन सोसायटी ऑफ हाइपरटैंशन’ में प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा है कि गांवों में रहने वाले बुजुर्गों की तुलना में भारतीय शहरों में रहने वाले बुजुर्गों के उच्च रक्तचाप, हृदय रोग व अन्य स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों से पीड़ित होने की सम्भावना अधिक रहती है। 

अध्ययन में कहा गया है कि, ‘‘शहरों में रहने वाले बुजुर्गों को बेहतर आय, व्यवसाय तथा अन्य सुविधाएं उपलब्ध होने के बावजूद उच्च रक्तचाप पर इस शहरी प्रभाव के वास्तविक कारण शहरी जीवनशैली से जुड़े कुछ विशिष्ट तरह के तनाव हो सकते हैं।

इनमें पारिवारिक उपेक्षा और सामाजिक असुरक्षा की भावना, पर्यावरण प्रदूषण, शोर-शराबा आदि शामिल हैं।’’ 
अध्ययन दल के प्रमुख डा. अम्बरीश दत्ता कहते हैं, ‘‘लगभग 44 प्रतिशत भारतीय शहरी बुजुर्ग उच्च रक्तचाप से पीड़ित हैं जबकि उनकी ही उम्र के ग्रामीणों में यह 35 प्रतिशत है।’’

‘‘शहरी बुजुर्गों में इसका जोखिम बढ़ाने वाले कारणों में कई मामलों में संतानों की उपेक्षा के चलते शराब का बढ़ता सेवन, शारीरिक गतिविधियों की कमी व अतिरिक्त वजन भी शामिल हो गया है।’’ 

डा. अम्बरीश के अनुसार, ‘‘अध्ययन में पता लगा है कि ग्रामीणों की तुलना में शहरों में रहने वाले बुजुर्गों को उच्च रक्तचाप से ग्रस्त होने की सम्भावनाएं 60 प्रतिशत तक अधिक हैं।’’

‘‘शहरी बुजुर्ग भारतीयों में उच्च रक्तचाप की सम्भावनाएं व्यक्तिगत या अन्य कारणों से भी अधिक हो सकती हैं परंतु इस अध्ययन से यह बात साफ हो गई है कि शहर में रहना अपने आप में ही उनका रक्तचाप बढ़ाने का एक स्वतंत्र कारण हो सकता है।’’

उक्त दोनों रिपोर्टें माता-पिता के प्रति संतानों की संवेदनहीनता के दुष्परिणामों को दर्शाती हैं, अत: यदि संतानें अपने बुजुर्गों को उच्च रक्तचाप, हृदय रोग आदि से बचा कर स्वस्थ जीवन देना चाहती हैं ताकि वे अपने जीवन की संध्या अच्छी तरह बिता सकें, तो वे उन्हें यथोचित आदर-सत्कार दें और अपने बच्चों को भी इसके लिए प्रेरित करें ताकि बूढ़े होने पर उन्हें अपने उपेक्षित माता-पिता जैसी स्थिति का सामना न करना पड़े।                                                     —विजय कुमार 

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