Thursday, Nov 14, 2019
begum samru''''''''s court at the state of sardhana

जानें, फ्रांस के सिपाही के मोहब्बत में फरजाना कैसे बन गई बेगम समरू

  • Updated on 7/8/2019

नई दिल्ली/अदिती सिंह। बेगम समरु के नाम से तो सिर्फ उसके चाहने वाले बुलाया करते थे, दुश्मन उसे डायन कहकर पुकारते थे। झांसी की रानी से लेकर रजिया सुल्तान जैसी कई कहानियां तो आपने सुनी होंगी पर बेगम समरू इतिहास की एक ऐसी औरत थी जो चार हजार से ज्यादा लड़ाकों की सरदार थी और अपनी राजनीतिक समझबूझ के बूते सरधना की जागीरदार बन गई थी। उसे जेबुन्निसा और फरजाना के नाम से भी जाना जाता है।  

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पुरानी दिल्ली के केंद्रीय बाजार (Delhi’s central market) जिले में एक सफेद पत्थर की इमारत (WHITE STONE building) किसी भी अन्य उपेक्षित संरचनाओं से बहुत अलग नहीं है, जो कि तांबे के तार, एक्स-रे फिल्मों, इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम वाली इलेक्ट्रॉनिक्स की दुकानों के साथ सड़क पर घिरी हुई है। एक समय में भारत की सबसे शक्तिशाली महिलाओं में से एक बेगम समरू का निवास स्थान था। इस बेगम की जिंदगी एक दरबारी व्यापारी से शुरू हुई जो बाद में सरधना की ताकतवर जागीरदार बन गई।  Navodayatimes
वॉल्टर रेनहार्ड सौम्ब्रे पहली मोहब्बत 
दरसल उनके इस सफर की शुरुआत वॉल्टर रेनहार्ड (Walter Reinhardt) सौम्ब्रे नामक एक फ्रेंच सिपाही से मिलने पर हुई। वॉल्टर भारत में फ्रांस की तरफ से लड़ रहा था। जब बेगम समरु उर्फ 'फरज़ाना' (Farzana) उसके प्यार में पड़ी, तो उसने वॉल्टर का साथ देने की ठान ली। जहां भी वॉल्टर जाता था, फरजाना उसके साथ जाती थी। वॉल्टर लड़ाकों का एक समूह लीड करता था। ये लोग कमीशन के लिए औरों के लिए लड़ते थे।

मर्दों वाले कपड़े पहन कर फरजाना वॉल्टर के लड़ाकों के साथ जंग पर निकल जाती थी। उस समय के मुगल राजा शाह आलम द्वितीय ने वॉल्टर को उत्तर प्रदेश के सरधना का जागीरदार बना दिया। लेकिन ये ज्यादा समय तक नहीं चल पाया क्योंकि 1778 में वॉल्टर की मौत हो गई। वॉल्टर रेनहार्ड सौम्ब्रे को 'बुचर ऑफ पटना' (Butcher of Patna) यानी पटना का कसाई भी कहा जाता था। अंग्रेजों का कसाईयों की तरह कत्ल करने के लिए ये मशहूर था।

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इस तरह बनी जागीरदार 
सदमें से बैठे राजा के एक बार कुछ लोग मिलने आए। ये लोग वॉल्टर के सिपाही थी इन्होंने राजा को कागज पेश किया जिस पर 82 यूरोपियन अफसरों और 4000 सैनिकों ने साइन किया था। वो चाहते थे बेगम समरू उनका नेतृत्व करें। इस तरह से बेगम चार हजार से ज्यादा लड़ाकों को लीड करती हुई सरधना की जागीरदार बन गई।  

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दूसरी बार हुई मोहब्बत 
ये समरू की मुहब्बत ही थी जो पति के इंतकाल के तीन साल बाद फरजाना ने ईसाइयत कबूल कर, जोहाना नोबिलिस सोम्ब्रे बन गई। बेगम समरू को अपनी ही फौज के अफसर ली वसाउ से 1793 में निकाह करने के बाद सैनिकों की बगावत का सामना करना पड़ा। बागी सैनिकों से घिर जाने पर वसाउ ने अपने सिर में गोली मार ली।

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इस तरह मिली जागीर
चार साल बाद नजफ कुली खान की बगावत को नाकाम करने में भी बेगम समरू ने शाह आलम की मदद की। इसके बाद शाह आलम ने सरधना की जागीर पर रेनहार्ट की पहली बीवी के बेटे नवाब जफरयाब खान के दावे को खारिज कर  बेगम समरू को दिया ।

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 ब्रिटिश सरकार ने भी बेगम का लोहा माना
बेगम की बहादुरी के और भी किस्से मशहूर हैं। सन 1826 में 73 वर्ष की उम्र में उन्होंने अंग्रेजी फौज के साथ मिलकर भरतपुर के राजा पर चढ़ाई की थी। बेगम घमासान लड़ाई के बीच अंत तक अपनी फौज के साथ मौजूद रहीं। इसके लिए ब्रिटिश सरकार ने उनका शुक्र अदा किया। 73 वर्ष की वृद्ध महिला के लिए ऐसा काम कर दिखाना सचमुच कमाल की बात थी।

बेगम समरू यानी सरधना की रानी की लड़ाई के मैदान से कूटनीति के अखाड़े तक बेगम समरू की तूती बोलती थी और हालात खिलाफ होने के बावजूद वह 1837 में अपनी मौत होने तक सरधना की जागीर पर बनी रही।
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