Saturday, Nov 17, 2018

सबरीमाला मामले में भाजपा व कांग्रेस का ‘कट्टर रवैया’

  • Updated on 11/6/2018

सबरीमाला के मेरे खुद के अनुभव ने मुझे अविश्वास के साथ अपनी आंखें मलने को मजबूर कर दिया और मुझे कभी नियाज हैदर की बात याद आ गई जिन्होंने कहा था ‘बदसूरत सियासत’, जो गंदी राजनीति जैसी नहीं है। मैं 1982 में अपने सबरीमाला जाने का श्रेय पूरी तरह से बॉब मुरारी को देता हूं जो एक तमिलनाडु काडर के उत्कृष्ट आई.ए.एस. अधिकारी थे और प्रत्येक वर्ष अपने पापों को धोने के लिए अपने भाइयों के साथ तीर्थ यात्रा करते थे। 

क्या वह मत, जिसमें मैं जन्मा था, इसमें अवरोधक था? कतई नहीं, बॉब ने इसके बिल्कुल विपरीत कहा। सबरीमाला के देवता भगवान अयप्पा का पसंदीदा वावर स्वामी नामक एक मुस्लिम श्रद्धालु था, जिसके अयप्पा से पहले आते धर्मस्थल पर अधिकतर श्रद्धालु जाते हैं। मुरारी भाइयों तथा मैंने पवित्र भभूत का अपना हिस्सा एक मुस्लिम पुजारी से लिया जिसकी लम्बी दाढ़ी उसकी नाभि तक पहुंच रही थी। 

पहाड़ी के आधार से पाम्बा नदी के साथ-साथ रास्ता हरे-भरे जंगलों से होकर गुजरता है। लामबंदी के एक अत्यंत विशेष कौशल, जो केवल भाजपा का एकाधिकार है, के कारण इस धार्मिक यात्रा को श्रद्धालुओं, राज्य तथा सुप्रीम कोर्ट के बीच एक युद्ध के मैदान में बदल दिया गया है। 

सबरीमाला में समरसता के कई धागे पिरोए गए हैं मगर राजनीतिक उद्देश्य के लिए इस तीर्थ यात्रा को एक खौलते हुए कड़ाहे में बदल दिया गया है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का खेल बिल्कुल सीधा है। वह केरल में त्रिपुरा को दोहराना चाहते हैं। राजनीति कवर करते हुए अपने 50 सालों के अनुभव में त्रिपुरा के परिणाम मेरे लिए सबसे बड़ा झटका थे। मेरे शैल्फ में राज्य के पूर्व पुलिस महानिदेशक बी.एल, वोहरा की पुस्तक ‘त्रिपुरा’ज बे्रवहार्ट्स’  रखी है।

यह एक अविश्वसनीय दस्तावेज है। आपको एक सेवारत मुख्यमंत्री की  इतनी जोश से प्रशंसा करने वाला कोई अलंकृत पुलिस अधिकारी कभी नहीं मिलेगा। अगरतला में वोहरा के उत्तराधिकारी ने मेरी सांसें रोक दीं। उसने गत वर्ष राज्य की राजधानी में कानून-व्यवस्था के उल्लंघन के रूप में घरेलू ङ्क्षहसा का एकमात्र मामला रिपोर्ट किया। राज्य में साक्षरता दर सर्वोच्च है।

इसका सबसे कम सम्भावित समय में केन्द्रीय योजनाओं को लागू करने का रिकार्ड है। यह एक सपनों की सरकार थी। गत 30 वर्षों के दौरान माकपा सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि देश के सबसे भीषण आतंकवाद की समाप्ति थी। जनजातीय तथा गैर-जनजातीय समरसता एक अन्य बड़ी उपलब्धि थी। भाजपा ने इसमें खामियों का पूरा फायदा उठाया और इस प्रक्रिया के दौरान भारी धन उंडेला।

त्रिपुरा के बारे में बढ़ा-चढ़ाकर कही गई बात का एक उद्देश्य था, यह दिखाना कि भाजपा-संघ असम्भव परिस्थितियों में भी जीत हासिल कर सकता है। इसकी तुलना में जीतने के लिए केरल एक आसान गढ़ है क्योंकि सबरीमाला मुद्दे पर कांग्रेस तथा भाजपा मोटे तौर पर एक ही पक्ष में हैं।

अमित शाह ने युवा महिलाओं बारे निर्णय को लेकर सुप्रीम कोर्ट की आलोचना की है जिन पर प्राचीन रस्मों के तहत अभी तक सबरीमाला में प्रवेश पर प्रतिबंध था। राज्य कांग्रेस ने दरअसल और भी कड़ा रुख अपनाया। विधानसभा में कांग्रेस के नेता रमेश चेन्नीथला इस बात पर जोर दे रहे हैं कि केन्द्र की भाजपा सरकार सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को अप्रभावी बनाने के लिए एक अधिसूचना लाए।

भाजपा के राज्याध्यक्ष पी.एस. श्रीधरन पिल्लई ने अपने हाथ खड़े कर दिए हैं। उन्होंने माकपा नीत मोर्चे पर अफसोस जताते हुए कहा कि यह राज्य का मामला है, जब तक राज्य विधानसभा इसकी मांग नहीं करती तब तक केन्द्र असहाय है

चेन्नीथला ने इसे ‘बकवास’ बताते हुए कहा कि यह सांझी सूची में है और इसके लिए राज्य विधानसभा के प्रमाण पत्र की जरूरत नहीं। बाध्यता यह है कि केन्द्र में भाजपा सरकार ऐसे मामलों में अधिसूचना का मार्ग नहीं खोलना चाहती क्योंकि तब पार्टी राम मंदिर जैसे अन्य मामलों पर भी अधिसूचना लाने के दबाव में आ जाएगी। 

सबरीमाला पर खुद को श्रेष्ठ साबित करने का यह मामला दोनों पाॢटयों को कट्टर साबित करता है, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ। दरअसल कांग्रेस एक लोकोक्ति के अनुसार चल रही है, जैसी कि कहावत है ‘तुम डाल-डाल तो हम पात-पात’। कांग्रेस के चेन्नीथला का कहना है कि अयप्पा के श्रद्धालुओं को धारा 26 के अंतर्गत एक धार्मिक 

सम्प्रदाय का दर्जा मिलना चाहिए, किसी भी कानूनी दखलअंदाजी से छूट। वह जोर देकर कहते हैं, ‘मेरी पार्टी विश्वास रखने वालों के साथ है।’ दिवंगत के. करुणाकरण के मुख्यमंत्रित्व काल में ही कांग्रेस हमेशा भाजपा के प्रति तटस्थ रही है, इसका बड़ा कारण यह है कि इसका सबसे बड़ा राजनीतिक विरोधी साम्यवादी वाम मोर्चा है। भाजपा ने कभी भी विधानसभा में प्रवेश नहीं किया है लेकिन इसने राज्यभर में अपनी वोटों को 0.5 से 1 प्रतिशत तक मजबूत कर लिया है।

जब कभी भी इस एक प्रतिशत वोट को चुनावी प्रक्रिया में डाला गया, आमतौर पर कांग्रेस नीत संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चे की विजय हुई। केरल में विजय का अंतर बहुत कम होता है।

सबरीमाला के बाद यह खुशमिजाजी एक अलग संदर्भ में है। पैमाने भिन्न हैं। केन्द्र में आक्रामक भाजपा ने सत्ता के लिए दृढ़ इच्छा शक्ति से त्रिपुरा में लगभग असम्भव को हासिल कर लिया था। यह केरल में कारगुजारी दोहराने को बेताब है। यदि भाजपा 2019 में सबको पछाड़ कर चुनावी कमाल दिखाती है तो भी केरल अपने आप में एक बड़ी ट्राफी होगा।

यह विश्व इतिहास में पहला राज्य था जो 1957  में मतपेटी के माध्यम से साम्यवादियों को सत्ता में लाया। आलेंडे काफी देर बाद 1972 में लोकतांत्रिक तरीके से चिली में सत्ता में आए। जहां केरल में कांग्रेस कूटनीतिक तौर पर भाजपा के लिए नरम रुख अपनाए हुए है वहीं इसे मध्य प्रदेश तथा राजस्थान में भाजपा के साथ कड़ी लड़ाई लडऩी पड़ेगी।  

करुणाकरण की एक बड़ी आकांक्षा राजीव गांधी की जाति को लेकर संदेहों को दूर करने की थी क्योंकि उनके पिता फिरोज गांधी एक पारसी थे। नंगे बदन राजीव गांधी के साथ वह कई बार गुरुवयूर मंदिर में गए थे। इसी संदर्भ में कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुर्जेवाला ने गुजरात में प्रचार अभियान के दौरान इस बात पर जोर दिया था कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी एक जनेऊधारी ङ्क्षहदू हैं, जिसका अर्थ ब्राह्मण है।

अब ऐसी अफवाहें हैं कि राहुल गांधी को सबरीमाला के अयप्पा मंदिर की तीर्थयात्रा करवाने पर कार्य चल रहा है जब मंदिर नवम्बर में खुलेगा। कौन जानता है कि भाजपा प्रतिस्पर्धी धर्मनिष्ठा की भावना से मोदी को मैदान में उतार दे।

                                                                                                                                            ---सईद नकवी

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा नवोदय टाइम्स (पंजाब केसरी समूह) उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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