Monday, Aug 08, 2022
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‘घर वाले-बाहर वाले’ राज्यसभा प्रत्याशी को लेकर BJP में उहापोह, हजम नहीं हो रहा केंद्र का फैसला

  • Updated on 3/7/2018

देहरादून/ब्यूरो। प्रचंड बहुमत और पक्की जीत की गारंटी के बावजूद राज्यसभा की एक सीट के लिए होने वाले चुनाव ने भाजपा को असहज कर दिया है। इसका कारण यह है कि केन्द्रीय नेतृत्व ने साफ कर दिया है कि दावेदार बाहर के भी हो सकते हैं।अब तक इसी मुद्दे पर कांग्रेस का विरोध करने वाली प्रदेश भाजपा पार्टी हाईकमान के फैसले को हजम नहीं कर पा रही है। हालांकि खुलेआम इसका विरोध भी नहीं किया जा रहा है।

23 मार्च को उत्तराखंड में राज्यसभा की एक सीट के लिए चुनाव होना है। इसके लिए अधिसूचना जारी हो चुकी है और नामांकन की अंतिम तारीख 12 मार्च रखी गई है। महज 11 विधायकों का संख्या बल होने के कारण कांग्रेस ने यह साफ कर दिया है कि वह इस चुनाव में कोई प्रत्याशी उतारेगी। भाजपा के पास इस बार विधानसभा में 56 सदस्यों का प्रचंड बहुमत है। इस तरह उसकी जीत भी पक्की है। परंतु प्रचंड बहुमत के बावजूद वह प्रत्याशी का चयन नहीं कर पा रही है। इसका कारण यह है कि यहां एक अनार सौ बीमार वाली हालत है।

पहले पूर्व सीएम विजय बहगुणा, राष्ट्रीय सचिव तीरथ सिंह रावत और प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट दावेदारों की सूची में शामिल थे। पार्टी के प्रति वफादारी दिखाने और पिछले चुनाव में अभूतपूर्व सफलता के लिए इन तीनों में किसी एक को राज्यसभा के लिए टिकट दिया जा सकता था। एक सप्ताह पूर्व तक अजय भट्ट इस रेस में सबसे आगे चल रहे थे। परंतु तीन मार्च को प्रदेश प्रभारी श्याम जाजू के देहरादून आगमन के बाद हालात अचानक बदल गए हैं।

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अब इस सूची में खुद श्याम जाजू भी शामिल हो गए हैं। इसके अतिरिक्त संगठन मंत्री रामलाल, केन्द्रीय मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान, जेपी नड्डा, अनिल बलूनी भी चाहते हैं कि उन्हें मौका मिले। धर्मेंन्द्र प्रधान और जेपी नड्डा का कार्यकाल अगले माह खत्म हो रहा है। मंत्री पद पर बने रहने के लिए उनका राज्यसभा के लिए फिर से चुना जाना आवश्यक है।

इसलिए जेपी नड्डा का नाम बहुत तेजी से उछला है। नड्डा पड़ोसी हिमाचल प्रदेश के हैं और उत्तराखंड में चुनाव प्रभारी भी रह चुके हैं। सूत्रों का कहना है कि यदि कोई नया समीकरण नहीं बनता है, तो केन्द्रीय नेतृत्व नड्डा का नाम फाइनल कर सकता है। दो-एक दिन में इसकी घोषणा भी की जा सकती है।

प्रदेश भाजपा को यही चिंता खाए जा रही है। स्थानीय स्तर पर दावेदारों की लंबी फौज के बावजूद यदि किसी बाहरी नेता को राज्यसभा के लिए भेजा जाता है, तो कांग्रेस को भाजपा की घेराबंदी करने का मौका मिल जाएगा। जब कांग्रेस ने राजबब्बर को राज्यसभा के लिए प्रत्याशी बनाया था, तो बाहरी प्रत्याशी होने के कारण भाजपा ने कांग्रेस का जबरदस्त विरोध किया था। भाजपा को उसी स्थिति का सामना करना पड़ सकता है।

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अत: कांग्रेस के संभावित हमलों की काट के लिए अभी से तर्क गढ़े जा रहे हैं। इसके लिए भाजपा ने यह प्रचारित करना शुरू किया है कि बाहरी होने के बावजूद जेपी नड्डा, श्याम जाजू और धर्मेन्द्र प्रधान जैसे उम्मीदवारों का उत्तराखंड से पुराना नाता रहा है।

प्रदेश प्रभारी के रूप में या चुनाव प्रभारी के रूप में इन नेताओं ने उत्तराखंड में अपनी सेवाएं दी हैं। ऐसे शख्स को बाहरी नहीं कहा जा सकता। वैसे प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट ने साफ कर दिया है कि वह इस पद के दावेदार नहीं हैं। इस संंबंध में केन्द्रीय नेतृत्व जो फैसला लेगा, वह सर्वमान्य होगा। बाहरी प्रत्याशी उतारने के सवाल पर अजय भट्ट ने कहा कि बहुत जल्द ही स्थिति साफ हो जाएगी।

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