Sunday, Jun 13, 2021
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bjp loses due to discord lack of issues and lack of leader

क से कलह, म से मुद्दे का अभाव और ल से लीडर की कमी से हारी बीजेपी ने जीती बाजी

  • Updated on 2/19/2020

नई दिल्ली/कुमार आलोक भास्कर।  बीजेपी (BJP) का एक बार फिर सपना टूट गया है। दिल्ली विधानसभा चुनाव (Delhi Assembly Election)) को जीतने की हसरत फिर पूरी नहीं हुई है। पार्टी को समझ में नहीं आ रहा है कि बार- बार चूक कहां होती है हालांकि खत्म तो निश्चित रुप से हार से ही होती है। जैसे ही पार्टी को लगता है कि सत्ता के करीब पहुंच गए है तभी जमीन खिसक चुकी होती है और पूरी प्लेट दूर किसी का शान बढ़ा रही होती है।

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सत्ता गंवाने का सिलसिला 1998 से हुआ शुरु 
दरअसल पार्टी के हारने का सिलसिला 1998 से शुरु हुई जब पार्टी दिल्ली की सत्ता में थी। लेकिन उस समय भी 'सत्ता जहर होता था' कम से कम यह सिद्ध हो चुका है। कारण साफ है कि पार्टी जब सत्ता में थी तो तीन-तीन सीएम को ऐसे बदला जैसे पूर्व गृह मंत्री शिवराज पाटिल ने मुंबई हमले दौरान दिन भर अपने ड्रेस बदलने को लेकर चर्चा में रहे। लेकिन इसी सत्ता से शुरु हुई पार्टी की अंदरुनी कलह आज तक थमने का नाम नहीं ले रहा है। मतलब साफ है कि सत्ता अपने साथ जो बीमारी लेकर आई उसे अब तक ऊबर नहीं सकी है। जबकि उस समय के तीनों सीएम अब इस दुनिया में नहीं है।  

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बीजेपी ने बदले 5 साल में 3 सीएम
बीजेपी यह सोचकर मुस्करा लेती है कि राहुल गांधी ने सत्ता को लेकर -'सत्ता जहर होता है' वाला बेतुका बयान दे दिया था। जब बीजेपी की दिल्ली में सरकार थी तो तीन-तीन सीएम ने मिलकर 5 साल की सत्ता संभाली ताकि कहीं से भी सत्ता हाथ से फिसल नहीं सके। लेकिन लक्ष्मी चंचला होती है तो यह बात सत्ता पर भी फिट बैठती है। फिर लगातार नॉन-स्टॉप 2003, 2008, 2013, 2015 और अब 2020 दिल्ली विधानसभा चुनाव पार्टी हार चुकी है। 

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पहले कांग्रेस फिर केजरीवाल का विकल्प नहीं बन सकी बीजेपी  
जबकि बहुत ही दिलचस्प बात है कि सभी विधानसभा चुनाव में बीजेपी सत्ता में वापसी बड़े अंतर से करने का दावा करती रही है। इसकी एक वजह यह भी है कि कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद बीजेपी ही एकमात्र विकल्प के तौर पर दिल्ली की जनता के सामने उपलब्ध रही। लेकिन पहले शीला दीक्षित के 15 साल के शासन के विकल्प के तौर पर बीजपी को जनता नकारती रही। तो अब अरविंद केजरीवाल के सत्ता में आने के बाद फिर से दिल्ली की जनता ने बीजेपी को नकार ही दिया है। पार्टी को गहरे मंथन की आवश्यकता है। अगर बीजेपी ने कामचलाऊ आत्ममुग्ध मंथन जारी रखा तो कोई आश्चर्य नहीं कि 2025 के विधानसभा में भी पार्टी को करारी शिकस्त मिले।

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पार्टी को करने होंगे सर्जिकल स्ट्राइक
6ठीं हार के बाद पार्टी को सर्जिकल स्ट्राइक जैसे कड़े फैसले लेने होंगे। इसमें अब कोई दो राय नहीं बचा है। सिर्फ राजनीति रस्मअदायगी और कामचलाऊ निर्णय से काम नहीं चल सकता। पार्टी को मंथन करना पड़ेगा कि कौन- से कारण हैं जिसकी वजह से दिल्ली की जनता उससे नाराज बैठी है।     

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दिल्ली बीजेपी की आंतरिक लड़ाई है सबसे बड़ी चुनौती
बीजेपी की सबसे बड़ी लड़ाई अपने-आप से है। यानी पार्टी के भीतर ही परत दर परत लड़ाई घर कर चुकी है। सभी माननीय नेतागण अपनी-अपनी राजनीतिक दुकान को चलाने में जुटे हुए हैं। मतलब स्पष्ट है कि Face Saving Politics जारी है। जिस पर समय आ गया है कि नकेल कसी जानी चाहिये। अगर आज बीजेपी एकजुट होकर दिल्ली विधानसभा चुनाव लड़ती तो हवा का रुख बदला जा सकता था। लेकिन आप केजरीवाल से लड़ सकते है पार्टी के भीतर के भीतरघात से कैसे निपटेंगे। जो सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़ी है।

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चुनाव प्रचार के दौरान मुद्दों के अभाव से जूझती रही पार्टी
दूसरी तरफ पार्टी पूरे चुनाव प्रचार के दौरान अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली सरकार के खिलाफ एक जनहित मुद्दा के लिये तरसती रही। दिल्ली की जनता के नब्ज को टटोलने में पार्टी पूरी तरह हांफती ही नजर आई। तो सवाल उठता है कि विपक्षी पार्टी के तौर पर बीजेपी पूरे 5 साल क्या करती रही? सिर्फ खुद के सीएम बनने के सपने देखने से जनता आपके पाले में नहीं आएगी। बल्कि जनता के हित के मुद्दे को उठाने से ही बीजेपी के तरफ हवा बनती, जो मौका पार्टी ने खो दिया। वो तो भला अमित शाह का दिल्ली बीजेपी को शुक्रगुजार होनी चाहिये कि उन्होंने शाहीन बाग के मुद्दे को भुनाने की भरसक कोशिश की तो सीट भी रेंगते-रेंगते 8 तक पहुंची। लेकिन अमित शाह कहां चूके यह भी बात हम कभी करेंगे।   

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पार्टी के पास एक सवर्मान्य लीडर नहीं
तीसरी सबसे महत्वपूर्ण दुर्भाग्य जो पार्टी के साथ रही यानी दोनों पहले के कमजोरी (आपसी कलह और मुद्दे का अभाव) को एक तरह से जन्म ही दे दिया वो है दिल्ली बीजेपी के पास जनाधार वाले एक भी नेता होने का दावा नहीं कर सकते है। अगर किसी नेता के पास जनाधार और चेहरे के तौर पर स्वीकार्य भी है तो शीर्ष नेतृत्व का भरोसा उन पर नहीं है। अगर बीजेपी के शीर्ष नेताओं को ही अपने पार्टी के नेता पर भरोसा नहीं होगा तो नेता जनाधार कहां से बढ़ाएगा। यह पार्टी की सबसे कमजोर कड़ी है जिस पर पहले शीला दीक्षित ने प्रहार किया तो अब केजरीवाल के जबरदस्त कमबैक का रास्ता साफ किया। 

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पार्टी नेतृत्व को नहीं है भरोसा अपने नेताओं पर
ऐसा एकदम नहीं है कि केजरीवाल के खिलाफ दिल्ली बीजेपी के पास प्रभावी चेहरा ही नहीं है। बल्कि दो कदम आगे यह कहा जा सकता है कि प्रतिभाशाली नेताओं की एक लंबी फौज के चलते ही पार्टी केजरीवाल के खिलाफ एक नेता को आगे बढ़ाने में हिचकती है। लेकिन इस लंबी लिस्ट में भी जनाधार वाले नेता की तलाश पार्टी को हर हालत में करनी ही होगी। ताकि आगामी 2025 की लड़ाई में पार्टी सत्ता की घर वापसी कर सकें। सौ टके का सवाल है कि मोदी- शाह- नड्डा क्या एक कदम बढ़कर दिल्ली बीजेपी के लिये सर्जिकल स्ट्राईक करेंगे? जवाब के लिये इंतजार करें।     
 

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